<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><rss xmlns:atom='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' version='2.0'><channel><atom:id>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450</atom:id><lastBuildDate>Sun, 08 Nov 2009 15:51:24 +0000</lastBuildDate><title>शिवरीनारायण देवालय एवं परंपराएं</title><description>प्रो. अश्विनी केशरवानी</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/</link><managingEditor>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</managingEditor><generator>Blogger</generator><openSearch:totalResults>27</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-2915845424493698549</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:24:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:45:05.346-08:00</atom:updated><title>शिवरीनारायण  देवालय और परम्पराएं</title><description>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_qZgknZ7Iz-4/R0_KdbTaDII/AAAAAAAAABw/ziHY_6AYIAg/s1600-R/Shivrinarayan.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5138548306747198594" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_qZgknZ7Iz-4/R0_KdbTaDII/AAAAAAAAABw/2t2iY0iqac4/s400/Shivrinarayan.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;लेखक : प्रो. अश्विनी केशरवानी&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="mailto:ashwinikesharwani@gmail.com"&gt;ashwinikesharwani@gmail.com&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;प्रथम संस्‍करण : फरवरी 2007&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मूल्‍य : 120 रूपये &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;प्रिंट प्रकाशक : बिलासा प्रकाशन, बिलासपुर&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;वेब ब्‍लाग प्रकाशन : संजीव तिवारी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुक्रमणिका&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_4583.html"&gt;भूमिका&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_6923.html"&gt;शिवरीनारायण : एक नजर&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अ. देवालय&lt;br /&gt;१. &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_265.html"&gt;गुप्तधाम&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;२ &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_5958.html"&gt;शबरीनारायण और सहयोगी देवालय&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;३ &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_341.html"&gt;अन्नपूर्णा मंदिर&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;४ &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_5170.html"&gt;महेश्‍वरनाथ&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;५ &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_5308.html"&gt;शबरी मंदिर &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;६ &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_418.html"&gt;जनकपुर के हनुमान&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;७ &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_3221.html"&gt;खरौद के लखनेश्‍वर &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब. परम्पराएं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१. &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_1002.html"&gt;मोक्षदायी चित्रोत्पलागंगा&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;२. &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_5225.html"&gt;महानदी में अस्थि विसर्जन &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;३. &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_7948.html"&gt;महानदी के घाट&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;४. &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_451.html"&gt;महानदी के हीरे &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;५. &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_4249.html"&gt;शिवरीनारायण की कहानी और उसी की जुबानी&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;६. &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_830.html"&gt;मठ और महंत परंपरा &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;७. &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_5856.html"&gt;गादी चौरा पूजा&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;८. &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_7927.html"&gt;रोहिणी कुंड&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;९. &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_712.html"&gt;मेला&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;१०.&lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_5905.html"&gt; रथयात्रा&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;११. &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_1650.html"&gt;नाट्य परंपरा&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;१२. &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_3905.html"&gt;तांत्रिक परंपरा&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;१३. &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_3363.html"&gt;साहित्यिक तीर्थ &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;१४. &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_9962.html"&gt;शिवरीनारायण के भोगहा&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;१५. &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_9393.html"&gt;गुरू घासी बाबा&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;१६. &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_7855.html"&gt;रमरमिहा&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;१७. &lt;a href="http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_30.html"&gt;माखन वंशनुक्रम&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-2915845424493698549?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_9804.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_qZgknZ7Iz-4/R0_KdbTaDII/AAAAAAAAABw/2t2iY0iqac4/s72-c/Shivrinarayan.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-3103874471714293872</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:23:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-02-21T03:59:37.931-08:00</atom:updated><title>भूमिका</title><description>पंडित विद्यानिवास मिश्र लिखते हैं :- ''नदी हमारे जीवन का प्रवाह है। वह एक साथ निरन्तरता, अखंडता, अनन्त से एकाकारता के दुर्निवार संकल्प, आगे आने वाली की चिंता और अविराम गति में जीवन के साथ एकाकार है। नदी का पथ सीधा नहीं होता। कभी कभी नदी भी मुड़कर पीछे देखती है। अपने पिछले मोड़ को देखने से आगे के लिए भाक्ति मिलती है। जीवन भी पीछे देखता है-पीछे लौटने के लिए नहीं बल्कि और अधिक दृढ़ता के साथ आगे बढ़ने के लिए। नदी अपने किनारे बराबर तोड़ती है, जल्दी कोई किनारा स्वीकार ही नहीं करती। जीवन भी कोई कूल नहीं सहता, वह नये कूल स्वीकार करते चलता है। वह नई मर्यादाएं स्थापित करते चलता है। वह केवल अपने वेग से संचालित होता है। आगे बढ़ने में, लक्ष्य तक पहुंचने में जो दि शा अनुकूल जान पड़ती है, उसी का वरण करता है। कुलक शा नदी तोड़ती है तो जोड़ना भी जानती है, जुड़ना भी जानती है, जो उमंग से उसमें मिलना चाहता है उसे अंगीकार करती है। जीवन भी कितने रि ते जोड़ता है, कितनों से जुड़ता है, पर सबको जोड़कर एक ही लक्ष्य तक पहुंचना और पहंुचाना चाहता है। नदी निम्नगा होती है। जीवन में नीचे की ओर जाने का बड़ा प्रलोभन होता है, पर साथ ही, जैसे नदी में बाढ़ आती है तो नदी अपने को उलीचकर धरती को उर्वर बना देती है। बाढ़ के बाद नदी उतरती है तो निर्मल हो जाती है। जीवन भी लुटाकर पवित्र हो जाता है। हमारी विश्वदृष्टि जीवन और नदी के तादात्म्य से ऐसी जुड़ी हुई है कि हमने जल को 'नार' नाम दे दिया है। नार का अर्थ है 'नरमय' उसी नार में वास करने के कारण भगवान 'नारायण' कहे गये हैं हमारे हर संकल्प में नदी है। नदी में अस्थि प्रवाह का अर्थ भी स्थूल जीवन के अव ोश को पूर्ण जीवन में रूपांतरित करना है। नदियों को हमने विराट पुरूश की नाड़ी प्रणाली के रूप में देखा है। नदी के द्वारा ही दे श की संवेदना की परख होती है। आज जब दे श की संवेदना से बहुत कुछ विजड़ित होता जा रहा है, तभी नदी केवल भाक्ति का साधन मात्र बनती जा रही है। उसके साथ जुड़ी हुई अनन्तता, अजस्र प्रवाहिता और सुचिता का बोध लुप्त होता जा रहा है। उसी का परिणाम है कि हम अ शुचिता नदी में पाटते जा रहे हैं। नदी को हम अपना जीवन मानते तो ऐसा कदापि न करते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंडित विद्यानिवास मिश्र जी के विचार से भला मैं असहमत कैसे हो सकता हूं। हिन्दुस्तान में गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम प्रयागराज इलाहाबाद में हुआ है। ऐसा वि वास किया जाता है कि यहां अस्थि प्रवाहित करने और पिंडदान करने से 'मोक्ष' मिलता है। ऐसा दूसरा कोई तीर्थ नहीं है, ऐसा भी माना जाता है। लेकिन मोक्षदायी सहोदर के रूप में छत्‍तीसगढ़के शिवरीनारायण और राजिम को माना जा सकता है। दोनों सांस्कृतिक तीर्थ चित्रोत्पला गंगा के तट पर क्रम श: महानदी, शिवनाथ और जोंकनदी तथा महानदी, सोढुल और पैरी नदी के साथ त्रिधारा संगम बनाते हैं। यहां भी अस्थि विसर्जन किया जाता है, और ऐसा वि वास किया जाता है कि यहां पिंडदान करने से मोक्ष मिलता है। शिवरीनारायण में तो माखन साव घाट और रामघाट में अस्थि कुंड है जिसमें अस्थि प्रवाहित किया जाता है। श्री बटुकसिंह चौहान ने 'श्री शिवरीनारायण सुन्दरगिरि महात्म्य' के आठवें अध्याय में अस्थि विसर्जन की महत्‍ता का बहुत सुंदर वर्णन किया है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोहा      &lt;br /&gt;शिव गंगा के संगम में, कीन्ह अस पर वाह।&lt;br /&gt;पिण्ड दान वहां जो करे, तरो-बैकुण्ठ जाय।।&lt;br /&gt;चौपाई     &lt;br /&gt;वहां स्नान कर यह फल होई। विद्या वान गुणी नर सोई।।&lt;br /&gt;एक सौ पितरन वहां पर तारे। पितरन पिण्ड तहां नर पारै।।&lt;br /&gt;गया समान ताही फल जानो। पितरन पिण्ड तहां तुम मानो।।&lt;br /&gt;मानो पितर गया करि आवे। पितरन भूरि सबै फल पाये।।&lt;br /&gt;जो कोई जायके पिण्ड ढरकावहीं। ताकर पितर बैकुण्ठ सिधावहीं।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोहा      &lt;br /&gt;क्वांर कृश्णो सुदि नौमि के, होत तहां स्नान।&lt;br /&gt;कोढ़िन को काया मिले, निर्धन को धनवान।।&lt;br /&gt;महानदी गंग के संगम में, जो किन्हे पिण्ड कर दान।&lt;br /&gt;सो जैहैं बैकुण्ठ को, कहीं बुटु सिंह चौहान।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंडित मालिकराम भोगहा श्री शिवरीनारायण माहात्म्य में लिखते हैं :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आठों गण सुर मुनि सदा आश्रय करत सधीर।&lt;br /&gt;जानि नारायण क्षेत्र शुभ चित्रोत्पल नदि तीर।।&lt;br /&gt;देश कलिंगहि आइके धर्म रूप थिर पाई।&lt;br /&gt;दरसन परसन वास अरू सुमिरन ते दुख जाई।। १/४०-४१&lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;अर्थात् आठों गण, देवता और मुनि धीरयुत हो नारायण क्षेत्र के चित्रोत्पला नदी के तट पर निरंतर वास किया करते हैं। कलिंग दे श का यह फाटक होने से यह धर्ममय पावन भूमि है। इहां को स्थिरता पाकर निवास करे वा दरसन परसन करे तो उसका दुख का अवश्‍य नाश हो जाता है।&lt;br /&gt;ऐसा पवित्र, पुण्य और मोक्षदायी श्री नारायण क्षेत्र छत्‍तीसगढ़ में पुण्यदायी नदी चित्रोत्पला गंगा (महानदी) के तट पर स्थित है। स्कंद पुराण में इसे 'श्री पुरूशोत्‍तम क्षेत्र' भी कहा गया है। आज भी यहां चतुर्भुजी विश्णु के अन्यान्य रूप जैसे भाबरीनारायण, के शिवनारायण और लक्ष्मीनारायण की भव्य, आकर्शक और द र्शनीय मूर्तियों के अलावा वैश्णव मठ, श्रीरामजानकीमंदिर, श्रीराधाकृश्ण मंदिर और जगन्नाथ मंदिर हैं।&lt;br /&gt;प्राचीन काल से शिवरीनारायण को श्री नारायण क्षेत्र माना जाता है। युगानुयुग से इस क्षेत्र की महिमा पुण्यदायी है। श्री शिवरीनारायण माहात्म्य में इसका वर्णन है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवद्धाम जानीहि नारायण कलाश्रितम्&lt;br /&gt;आदौ विश्णु पुरी नाम ततो रामपुरं सप्तम्&lt;br /&gt;बैकुंठपुर नामा सी ततो नारायण पुरम्&lt;br /&gt;चित्रोत्पला नदी तीरे पुण्य कानन मंडिते&lt;br /&gt;सिंदूर पर्वताभ्यासे तत्र नारायणे व्यय:&lt;br /&gt;रोहिणी कुंड मासाद्य भक्तया भीश्ट फल प्रद:।। २/९-१०-११&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात् इस पुण्य भगवद्धाम को नारायण के कलाश्रित जानिये। पहिले इसका नाम वि नुपुरी, रामपुर, नारायणपुर और भाबरीनारायण के नाम से प्रख्यात् है। चित्रोत्पला नदी के किनारे सुंदर अमराई से अच्छादित सिंदूरगिरि सु शोभित है, तहां अव्यय श्रीनारायण विराजमान हैं। उनके चरण के नीचे 'रोहिणी कुंड' जो भक्तों को अभीश्ट फल देने वाला है।&lt;br /&gt;प्राचीन कवि श्री बटुकसिंह चौहान ने रोहिणी कुंड की महिमा गायी है :-&lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;रोहिणी कुंड एक धाम है, है अमृत का नीर।&lt;br /&gt;बंदरी से रानी भई,  कंचन होत भारीर।।&lt;br /&gt;जो कोई नर जाइके, दरस करे वही धाम।&lt;br /&gt;बुटु सिंह जो दरस करि, पाये पद निर्वाण।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री नारायण क्षेत्र में पुण्यदायी चित्रोत्पला गंगा का अवतरण, उसके तट पर भगवान नारायण का गुप्त वास और उसके चरण कमल को धो रही रोहिणी कुंड का दर्शन, स्पर्श और आचमन मोक्षदायी है। इस कुंड की महिमा अनुपम है। इस कुंड के जल को स्प र्श करने और आचमन करने से मोक्ष मिलता है। इसी अध्याय के १३६-१३७ वें भलोक के अनुवाद में भोगहा जी ने लिखा है :-&lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;रोहिणि कुंडहि स्पर्श करि न्हाइ उत्पला नीर&lt;br /&gt;योग भ्रश्ट योगी मुकति पावत धोइ शरीर।।&lt;br /&gt;उत्पलेश आरंभ हो चित्रेश्वरी प्रयंत&lt;br /&gt;चित्रोत्पला सुजानिये नासै पाप अनंत।।२/१३६-१३७।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात् रोहिणी कुंड के जल को जो कोई स्पर्श कर चित्रोत्पला नदी के जल में स्नान करेगा, योग भ्रश्ट योगी भी मुक्ति पावेंगे। अब यह बताते हैं कि चित्रोत्पला गंगा कहां से कहां तक माननी चाहिये। उत्पलेश महादेव राजीव लोचन में महानदी और पैरी के संगम में है जो अब कुलेश्वर नाम से प्रख्यात् है, वहां से चित्रा महेश्वरी अर्थात् चंद्रसेनी चंद्रपुर तक मानना चाहिये। जो अनंत पाप का ना श करने वाली है।&lt;br /&gt;रोहिणी कुंड की महिमा अनंत है। कहा भी गया है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोहिणी कुण्ड मासाद्य स्थित: सेव्य: सदा सुरै:&lt;br /&gt;तस्य दर्शनं मात्रेण मुच्यते पातकैर्नरा:। २/१४४।&lt;br /&gt;अनुवाद&lt;br /&gt;रोहणि कुंडहि आइ करि सेवत सुर गण नित&lt;br /&gt;तासु दरस ही मात्र से नासत पाप अमित।।&lt;br /&gt;भावार्थ&lt;br /&gt;...और रोहिणी कुंड में देवतागण आकर चरणामृत सदा सेवन किया करते हैं। तुम्हारे हमारे अनंत पाप उसके दर्शन ही से क्यों न छूट जावेगा, इसलिये हम सबको चाहिये कि जब तक जियें, रोहिणी कुंड के द र्शन करें, उसके जल का चरणामृत ग्रहण करें और चित्रोत्पला नदी में नित्य स्नान किया करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिवरीनारायण की जगन्नाथ पुरी से बहुत समानता है। पहली बात तो जगन्नाथ पुरी के भगवान जगन्नाथ की विग्रह मूर्ति को शिवरीनारायण से ही ले जाया गया है और जिस प्रकार पुरी का जगन्नाथ मंदिर तांत्रिकों के बब्जे में था और आदि गुरू भांकराचार्य ने उनसे भाशस्त्रार्थ करके उसके प्रभाव से मंदिर को मुक्त कराया था उसी प्रकार शिवरीनारायण का मंदिर नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों के कब्जे में था और आदि गुरू दयाराम दास ने उनसे मंदिर को मुक्त कराकर यहां वैश्णव मठ की स्थापना की थी। जिस प्रकार पुरी क्षेत्र में कुश्ठ रोगियों की अधिकता है उसी प्रकार शिवरीनारायण क्षेत्र में भी कुश्ठ रोगियों की अधिकता है। शिवरीनारायण का कुश्ठ अस्पताल हांलाकि आज ध्वस्त हो गया है और यहां एक भी कुश्ठ रोगी नहीं है लेकिन यहां डॉ. एम. एम. गौर कुश्ठ विषेशज्ञ थे और उन्हीं की पहल, श्री देवालाल के शरवानी और श्री बल्दाऊ प्रसाद के शरवानी के सहयोग से यहां एक चिकित्सालय की स्थापना हो सकी जिसका उद्घाटन मध्यप्रदे शासन के तत्कालीन स्वास्थ्य एवं सहकारिता मंत्री श्री चित्रकांत जायसवाल ने  ०९.१०.१९६९ को किया था। पुरी और शिवरीनारायण में रोहिणी कुंड है और दोनों जगह रथयात्रा बड़ी धूमधाम से मनायी जाती है। रीवा के महाराजा को कुष्‍ठ रोग से मुक्ति शिवरीनारायण के भगवान भाबरीनारायण के द र्शन और पूजन से हुई थी। कदाचित यही कारण है कि रींवा क्षेत्र के तीर्थ यात्री जगन्नाथ पुरी जाने के पहले शिवरीनारायण की यात्रा करते हैं और शिवरीनारायण को छत्तीसगढ़ की जगन्नाथ पुरी कहा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तत्कालीन साहित्य के अध्ययन से मैं इस निश्कर्श में पहुंचा हूं कि इंद्रभूति नाम का व्यक्ति जिस नीलमाधव की मूर्ति को संबलपुर की पहाड़ी में रखकर तांत्रिक सिद्धि किया करता था उसे वह शिवरीनारायण से उठाकर ले गया था और उसकी तीसरी पीढ़ी के लोग पुरी में स्थापित कर तांत्रिक सिद्धियां करने लगे। इंद्रभूति बौद्ध धर्म के वज्रयान भाखा के प्रवर्तक थे। वे पद्मवज्र के शिश्य अनंगवज्र के शिश्य थे। उन्होंने तंत्र मंत्र की अनेक सिद्धियां प्राप्त करके कई ग्रंथ लिखा जिसमें 'ज्ञानसिद्धि' सर्वाधिक प्रसिद्ध ग्रंथ है। कविराज गोपीनाथ महापात्र ने इंद्रभूति को 'उड्डयन सिद्ध अवधूत' कहा है। इनके पुत्र पद्मसंभव ने तिब्बत जाकर लामा सम्प्रदाय की स्थापना की थी। आसाम के कालिका पुराण के अनुसार तंत्र विद्या का उदय उड़ीसा में हुआ और भगवान जगन्नाथ उनके इश्टदेव थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रस्तुत ग्रंथ- ''शिवरीनारायण : देवालय और परंपराएं'' इन्हीं सब भावों को लेकर लिखा गया है। इस ग्रंथ में दो खंड है। पहले खंड में यहां के मंदिरों के उपर सात आलेख क्रम श: गुप्तधाम, भाबरीनारायण और सहयोगी देवालय, अन्नपूर्णा मंदिर, महे वरनाथ मंदिर, भाबरी मंदिर, जनकपुर के हनुमान और खरौद के लखने वर मंदिर। इन आलेखों के माध्यम से मैंने यहां के सभी मंदिरों के निर्माण से लेकर उसकी महत्ता तक विस्तृत वर्णन करने का प्रयास किया है। प्रमुख मंदिर भगवान भाबरीनारायण का है भोश सहायक मंदिर हैं जिसके निर्माण के बारे में अनेक किंवदंतियां प्रचलित है। बदरीनारायण में जहां भगवान नर नारायण की तपस्थली है वही शिवरीनारायण में भगवान नर नारायण भाबरीनारायण के रूप में गुप्त रूप से विराजमान हैं। कदाचित् इसीकारण सतयुग में यहां मतंग ऋशि का गुरूकुल आश्रम था। भारतेन्दु कालीन साहित्यकार पंडित मालिकराम भोगहा ने जो 'भाबरीनारायण माहात्म्य' लिखी है उसका शीर्शक उन्होंने 'श्री शबदरीनारायण माहात्म्य' दिया है। उन्होंने ऐसा भाशयद स्कंद पुराण में इस क्षेत्र को 'श्रीनारायण क्षेत्र' के रूप में उल्लेख किये जाने के कारण किया है। यहां रामायण कालीन भाबरी उद्धार और लंका विजय के निमित्त भ्राता लक्ष्मण की विनती पर श्रीराम ने खर और दूशण की मुक्ति के प चात् 'लक्ष्मणे वर महादेव' की स्थापना की थी। इसीप्रकार औघड़दानी शिवजी की महिमा आज महे वरनाथ के रूप में माखन वं श और कटगी-बिलाईगढ़ जमींदार की वं शबेल को बढ़ाकर उनके कुलदेव के रूप में पूजित हो रहे हैं। मां अन्नपूर्णा की ही कृपा से समूचा छत्तीसगढ़ 'धान का कटोरा' कहलाने का गौरव प्राप्त कर सका है। इस खंड के सभी देवालय लोगों की श्रद्धा और भक्ति का प्रमाण है। तभी तो पंडित हीराराम त्रिपाठी गाते अघाते नहीं   हैं :-&lt;br /&gt;होत सदा हरिनाम उच्चारण रामायण नित गान करैं।&lt;br /&gt;अति निर्मल गंगतरंग लखै उर आनंद के अनुराग भरैं।&lt;br /&gt;शबरी वरदायक नाथ विलोकत जन्म अपार के पाप हरैं।&lt;br /&gt;जहां जीव चारू बखान बसैं सहजे भवसिंधु अपार तरैं।। १ ।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रंथ के दूसरे खंड में यहां प्रचलित परंपराओं को द र्शाने वाले १७ आलेख है। गंगा, यमुना और सरस्वती नदी की तरह चित्रोत्पलागंगा (महानदी) को भी मोक्षदायी माना गया है। 'मोक्षदायी चित्रोत्पलागंगा' में इन्हीं सब तथ्यों का वर्णन है। इस नदी में अस्थि विसर्जन, बनारस के समान महानदी के घाट, भगवान भाबरीनारायण के चरण को स्प र्श करती मोक्षदायी रोहिणी कुंड, वैश्णव मठ और महंत परंपरा, महंतों के द्वारा गादी चौरा पूजा, जगन्नाथ पुरी के समान प्रचलित रथयात्रा, तांत्रिक परंपरा, नाट्य परंपरा, साहित्यिक परंपरा, प्रसिद्ध मेला के साथ शिवरीनारायण के भोगहा, गुरू घासी बाबा, रमरमिहा और माखन वं शानुक्रम, शिवरीनारायण की कहानी उसी की जुबानी और महानदी के हीरे आलेख यहां की परंपराओं को रेखांकित करता है।&lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;जिस तरह यहां का प्रसिद्ध भाबरीनारायण मंदिर अति प्राचीन है उसी प्रकार मंदिर के भोगराग लगाने वाले 'भोगहा'' का वं श भी प्राचीन है। उपलब्ध तथ्यों के अनुसार ५८ पुस्‍तों से भोगहा परिवार के वं शज भाबरीनारायण मंदिर में भोगराग लगाते आ रहे हैं। भोगहा परिवार आधा शिवरीनारायण के मालगुजार थे कदाचित् भोगहापारा नाम उनकी मालगुजारी का प्रतीक है। इसी प्रकार यहां का मठ अति प्राचीन है। पहले यह मठ नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों के कब्जे में था जिसे आदिगुरू दयारामदास ने उनसे मुक्त कराया और यहां वैश्णव मठ की स्थापना की। वे इस मठ के प्रथम महंत हुए। तब से लेकर आज तक १४ महंत हो चुके हैं और १५ वें महंत राजेश्री रामसुंदरदास जी हैं। महंतों ने तांत्रिकों के प्रभाव को समाप्त करने के लिए 'गादी चौरा पूजा'' शुरू की थी जो आज भी प्रचलित है। शिवरीनारायण की आधी भूमि महंतों की जागीर थी। दोनों को मिलाकर पहले ग्राम पंचायत बनाया गया जो आज नगर पंचायत है। तीसरा महत्वपूर्ण वंश यहां का 'माखन वंश' है जो आज बटवृक्ष की भांति फैल गया है। इस वं श के पितृ पुरूश श्री धीरसाव और उनके पुत्र मयाराम, मनसाराम तथा सरधाराम के परिवार को भागीरथ भोगहा ने सन् १८०० में यहां बसाया था। इस परिवार के कुलोद्धारक माखन साव हुए। वे इस वंश के ज्येश्ठ होने के कारण 'लंबरदार' बने। उन्होंने अपने प्रथम मालगुजारी गांव हसुवा के बाद छह गांव क्रमश: टाटा, सीतलपुर, बछौडीह, झुमका, लखुर्री और कमरीद म. नं. १ को खरीदकर सात गांव के मालगुजार रहे हैं। वे धीर, गंभीर, धर्मप्रिय और न्यायप्रिय थे। सन् १८६१ में शिवरीनारायण को बिलासपुर जिले का तहसील बनाया गया। तब यहां के अनरेरी बेंच मजिस्ट्रेट के रूप में पंडित यदुनाथ भोगहा, महंत अर्जुनदास और माखन साव की नियुक्ति की गयी। उन्हें हथियार रखने का माफी लाइसेंस मिला था। वे दोनों धाम की पदयात्रा कर सकु शल लौट आये थे। उन्होंने महानदी के तट पर अपने कुलदेव महे वरनाथ और कुलदेवी शीतला माता का एक भव्य मंदिर और एक घाट का निर्माण संवत् १८९० में कराया था। सुप्रसिद्ध साहित्यकार और शिवरीनारायण के तहसीलदार ठाकुर जगमोहनसिंह ने सन् १८८४ में यहां के आठ सज्जन व्यक्तियों का परिचय 'सज्जनाष्‍टक'' में लिखकर प्रकाशित कराया है। माखन साव भी अष्‍टक में से एक हैं। उनके बारे में उन्होंने लिखा है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माखन साहु राहु दारिद कहं अहै महाजन भारी।&lt;br /&gt;दीन्हो घर माखन अरू रोटी बहुविधि तिनहो मुरारी।।&lt;br /&gt;लच्छपती मुइ भारन जनन को टारत सकल कले शा।&lt;br /&gt;द्रव्यहीन कहं है कुबेर सम रहत न दुख को ले शा।&lt;br /&gt;दुओधाम प्रथमहि करि निज पग कांवर आप चढ़ाई।&lt;br /&gt;चार बीस भारदहु के बीते रीते गोलक नैना।&lt;br /&gt;लखि अंसार संसार पार कहं मुंदे दृग तजि नैना।।&lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;'चार बीस भारदहु के बीते' अर्थात् ८० वर्श तक जीवन का सुख भोगकर फाल्गुन सुदी २, संवत् १९४९ ( शनिवार, ०६ मार्च सन् १८९२) को स्वर्गारोहण किया। उनके ज्येश्ठ पुत्र श्री खेदूराम साव ने परिवार की लंबरदारी सम्हाली। उन्हें भी शिवरीनारायण तहसील के आनरेरी बेंच मजिस्ट्रेट और दरबारी नियुक्त कर हथियार रखने का माफी लाइसेंस मिला। श्री खेदूराम साव की मृत्यु कार्तिक शुक्ल १३, संवत् १९६९      (२२.११.१९१२) को हुई तब उनके ज्येश्ठ पुत्र श्री आत्माराम साव परिवार के लंबरदार बने। सन् १८९१ में तहसील मुख्यालय शिवरीनारायण से जांजगीर स्थानान्तरित हो गया। ३१. ०५. १९२० को श्री आत्माराम साव को जांजगीर तहसील के शिवरीनारायण बेंच के आनरेरी मजिस्ट्रेट नियुक्त किया गया था। 'श्री आत्माराम सूरजदीन साव' नाम से लंबरदारी चली। इस लंबरदारी में ०७ गांवों की मालगुजारी बढ़कर ८४ गांव हो गयी। उन्होंने अनेक तीर्थे में धर्म शाला बनवायी, अपने सभी मालगुजारी गांवों में तालाब और कुंआ खुदवाया, स्कूल खुलवाया और तीर्थ यात्राएं की। महानदी के तट पर माखन साव के द्वारा निर्मित घाट में पचरी निर्माण कराया। इसके लिए उन्होंने अंग्रेज सरकार से अनुमति भी ली थी। ऐसे माखन वं श का मैं बहुत छोटा पौध होकर गौरवान्वित हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस ग्रंथ के दूसरे परंपरा खंड में मैंने गुरू घासी बाबा और रमरमिहा को इसलिए सम्मिलित किया है क्योंकि शिवरीनारायण उनका सांस्कृतिक तीर्थ है। सुपसिद्ध साहित्यकार ठाकुर जगमोहनसिंह यहां के सन् १८८२ से १८८७ तक तहसीलदार रहे। वे भारतेन्दु हरि चंद्र के सहपाठी और मित्र थे। उन्होंने काशी के 'भारतेन्दु मंडल' की तर्ज में यहां 'जगन्मोहन मंडल' की स्थापना कर छत्तीसगढ़ के बिखरे साहित्यकारों को एक सूत्र में बांधा ही नहीं बल्कि उन्हें लेखन की दि शा भी दी थी। भारतेन्दु हरि चंद्र का आगमन शिवरीनारायण की पवित्र भूमि पर हुआ था। कदाचित् इसी कारण मैंने शिवरीनारायण को 'साहित्यिक तीर्थ' की संज्ञा दी है। 'नाट्य परंपरा' यहां प्रचलित थी। पंडित मालिकराम भोगहा ने यहां एक नाटक मंडली बनायी थी। आगे चलकर यहां और नाटक मंडली बनी और नाटकों का सफलता पूर्वक मंचन भी किया गया।&lt;br /&gt;इस ग्रंथ के लेखन में भगवान भाबरीनारायण, हमारे कुलदेव महे वर महादेव और कुलदेवी शीतला माता का आ शीर्वाद और चित्रोत्पला गंगा का संस्कार प्रमुख है। मैं उन्हें हृदय से नमन करता हूं। भारतेन्दु युगीन साहित्यकार श्री गोविंदसाव जिनका मैं बहुत छोटा वं शज हूं ,जानकर मैं गौरवान्वित हूं। उन्हें मैं प्रणाम करता हूं। मेरे दादा स्व. श्री राघवप्रसाद जिन्होंने मुझे रामायण और महाभारत के प्रसंगों को सुनाकर जागृत किया, मेरे माता-पिता श्रीमती मिथले श-देवालाल का दुलार और मेरी अर्द्धांगनी कल्याणी का सहयोग स्मरणीय है। उनका आभार मानना उनके सहयोग को झुठलाना होगा। सुपुत्र प्रांजल ने तो कम्प्यूटर में कम्पोजिंग सेटिंग कर इसे पुस्तक रूप प्रदान किया है। बिटिया तृप्ति और बेटा अंजल का अप्रत्यक्ष सहयोग भूलने योग्य नहीं है। उन्हें मेरा असीम प्यार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे अभिन्न मित्र डॉ. आि वनी कुमार दुबे, स्व. श्री मदनलाल गुप्त, श्री पूर्णेन्द्र तिवारी के प्रेरणादायी सहयोग के लिए उनका मैं आभारी हूं। शिवरीनारायण-दूधाधारी मठ के महंत राजेश्री रामसुन्दरदास जी का वि ोश स्नेह, सहयोग और प्रोत्साहन मुझे मिला है जिसके लिए उनका आभार प्रकट करना मेरा नैतिक दायित्व है। भाई श्री राहुल कुमार सिंह ने न केवल शिलालेखों का अनुवाद उपलब्ध कराया बल्कि उसकी बारीकियों को समझने में मद्द की, यह उनका बड़प्पन है। मैं उनका ऋणी हूं। श्री महे श कुमार राठौर ने मेरी रचनाओं को धीरज के साथ पढ़कर आव यक सं शोधन कर सुरूचिपूर्ण बनाया है। जीवन के संघर्शपूर्ण मोड़ में मुझे डॉ. व्ही. एस. श्रीवास्तव और डॉ. एम. एल. सोनार जी का स्नेह पूर्वक पथ प्रद र्शन और सहयोग मिला। मैं उनके प्रति आभार प्रदि र्शत करना अपना दायित्व समझता हूं। सुप्रसिद्ध साहित्यकार, भारतीय संस्कृति के प्रकाण्ड विद्वान और सांसद (राज्य सभा) पं. विद्यानिवास जी मिश्र के पास आ शीर्वचन लिखने के लिए मैंने इस ग्रंथ की पांडुलिपि भेजी थी। उन्होंने जहां एक ओर इस ग्रंथ को 'परिवे श का एक वि वकोश' माना है वहां दूसरी ओर इसे एकान्विति (सूत्रबद्धता) प्रदान करने का सुझाव दिया है। तद्नुसार मैंने इस ग्रंथ में आव यक सं शोधन और एकान्विति कर सुव्यवस्थित करने का पूर्ण प्रयास किया है। मुझे पूरा वि वास है कि इस परिमार्जन के प चात् इस ग्रंथ के पाठकों, अध्येताओं को इसके पठन में किसी प्रकार के क्रमदोश की प्रतीति नहीं होगी। मेरा मानना है कि ग्रंथ के दोनों खंड अपने आप में पूर्ण तथा अपनी निजी महत्ता सिद्ध करने के साथ साथ अपने आगत और विगत खंडों के तथ्यों को समुचित रूप में समझने के लिए अन्योन्याश्रित साबित होंगे। इस आ शीर्वचन और मार्गद र्शन के लिए मैं उनका सदा ऋणी रहूंगा। इस ग्रंथ को पढ़कर आदरणीय डॉ. पाले वर भार्मा ने आव यक सं शोधन करने का सुझाव दिया जिसे पूरा करने के बाद यह ग्रंथ पूर्णता को प्राप्त हुआ। उनके प्रति आभार। पुस्तक के प्रिंटिग में &lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;बिलासा प्रकाशन, बिलासपुर&lt;/span&gt; ने सहयोग देकर मेरे लेखन को सफल बनाया है। उनका आभार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जन्म स्थल के ऋण से उऋण होने का मेरा यह छोटा सा प्रयास है। इस प्रयास में कहीं कोई त्रुटि रह गयी हो तो पाठक उसे अवगत कराने की कृपा करेंगे। जगन्मोहन मंडल के प्रभृति साहित्यकारों को नमन करते हुए उन्हें मेरी श्रद्धांजलि। आशा है पाठकों को मेरा यह प्रयास अच्छा लगेगा। मेरे इस प्रयास में कुछ त्रुटि हुई हो तो मुझे अवगत कराने का कष्ट करेंगे ताकि अगले अंक में त्रुटि को सुधारा जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रो. अश्विनी केशरवानी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-3103874471714293872?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_4583.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-2262911377035962238</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:23:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:23:44.356-08:00</atom:updated><title>शिवरीनारायण : एक नजर</title><description>विभिन्न नगरों से दूरी :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दक्षिण पूर्वी मध्य रेल्वे के बिलासपुर जंक् शन से ६४ कि. मी., चांपा जंक् शन से ७० कि. मी., जांजगीर जिला मुख्यालय से ६० कि. मी., कोरबा से ११० कि. मी., रायगढ़ से सारंगढ़ होकर ११० कि. मी., रायपुर से बलौदाबाजार होकर १२० कि. मी. की दूरी पर शिवरीनारायण स्थित है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैसे जाएं :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यात्रा स्वयं के अथवा किराये के वाहन से करना सुविधाजनक ही नहीं बल्कि श्रेयस्कर भी होता है। दक्षिण पूर्वी मध्य रेल्वे के प्राय: सभी स्टे शनों से शिवरीनारायण के लिए नियमित बस सेवा है। आसपास के नगरों को घूमने के लिए रायपुर, बिलासपुर, चांपा, जांजगीर और शिवरीनारायण को मुख्यालय बनाया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कब जाएं :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूं तो शिवरीनारायण किसी भी मौसम में जा सकते हैं। लेकिन धार्मिक नगरों में पर्व में जाने का वि ोश महत्व होता है। यहां रथयात्रा, सावन झूला, श्रीकृश्ण जन्माश्टमी, माघी पूर्णिमा (मेला), चंद्र ग्रहण, सूर्य ग्रहण, मकर संक्रांति, द शहरा, नवरात्रि रामनवमीं और महाशिवरात्रि में जाना उचित होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहां रूकें :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिवरीनारायण में रूकने के लिए होटल अमन पैलेस, लोक निर्माण का विश्रामगृह, के शरवानी कल्याण भवन, मारवाड़ी समाज की धर्म शाला, शिवरीनारायण का मठ-मंदिर न्यास का विश्रामगृह, संत निवास और खरौद जल संसाधन विभाग का निरीक्षण गृह और गिधौरी में भार्मा लॉज प्रमुख है। इसके अलावा विभिन्न समाजों की धर्म शालाओं में भी रूकने की व्यवस्था है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या देखें :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां देखने के लिए महानदी, शिवनाथ नदी और जोंक नदी के संगम का मनोरम दृ य, भगवान भाबरीनारायण, उनके चरण को स्प र्श करता मोक्षदायी रोहिणी कुंड, चंद्रचूड़ महादेव, के शवनारायण,       श्री रामजानकी मंदिर, मठ और मठ परिसर में स्थित महंतों की समाधि, जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा, श्रीराम लक्ष्मण जानकी मंदिर, भाबरी के बेर खाते श्रीराम और लक्ष्मण मंदिर, श्रीकृश्ण वट वृक्ष, गादी चौरा, माखन साव घाट स्थित महे वरनाथ और शीतला देवी मंदिर, मां अन्नपूर्णा और लक्ष्मीनारायण मंदिर और उसके परिसर में स्थित विभिन्न देवी देवताओं के मंदिर, जोगीडीपा के बजरंगबली के मदिर, ०२ कि. मी. की दूरी पर स्थित खरौद में लक्ष्मणे वर महादेव, इंदलदेव और भाबरी (सौराइन दाई) मंदिर, गिरि गोस्वामियों का भौव मठ, ११ कि. मी. की देरी पर स्थित केरा में चण्डी दाई का मंदिर, १७ कि. मी. की दूरी पर स्थित नवागढ़ में लिंगे वर महादेव, बिलासपुर मार्ग में ११ कि. मी. की दूरी पर स्थित मेंहदी में सिद्ध हनुमान मंदिर, १२ कि. मी. की दूरी पर स्थित गिरौदपुरी में गुरू घासीदास का मंदिर, जोंक नदी और पहाड़ी का मनोरम दृ य द र्शनीय है। कसडोल और बलौदाबाजार से नारायणपुर और तुरतुरिया जाया जा सकता है। नारायणपुर में स्थित शिव मंदिर के बाहरी दीवार में मिथुन मूर्तियां द र्शनीय है। इसी प्रकार तुरतुरिया में बौद्ध विहार है यहां प्रतिवर्श पौश-पूर्णिमा (छेरछेरा) के दिन एक दिवसीय मेला लगता है। शिवरीनारायण जब भी जाएं चित्रोत्पलागंगा-महानदी में स्नान कर भगवान भाबरीनारायण और उसके चरण को स्प र्श करता हुआ रोहिणी कुंड का द र्शन और उसके जल का आचमन अवश्‍य करें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-2262911377035962238?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_6923.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-8763302898668500213</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:22:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:23:09.768-08:00</atom:updated><title>गुप्तधाम</title><description>महानदी के तट पर स्थित प्राचीन, प्राकृतिक छटा से भरपूर और छत्तीसगढ़ की संस्कारधानी के नाम से विख्यात् शिवरीनारायण जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत जांजगीर से ६० कि. मी., बिलासपुर से ६४ कि. मी., कोरबा से ११० कि. मी., रायगढ़ से व्हाया सारंगढ़ ११० कि. मी. और राजधानी रायपुर से व्हाया बलौदाबाजार १२० कि. मी. की दूरी पर स्थित है। यह नगर कलचुरि कालीन मूर्तिकला से सुसज्जित है। यहां महानदी, शिवनाथ और जोंक नदी का त्रिधारा संगम प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा नमूना है। इसीलिए इसे ''प्रयाग'' जैसी मान्यता है। मैकल पर्वत श्रृंखला की तलहटी में अपने अप्रतिम सौंदर्य के कारण और चतुर्भुजी विश्णु मूर्तियों की अधिकता के कारण स्कंद पुराण में इसे ''श्री नारायण क्षेत्र'' और ''श्री पुरूशोत्तम क्षेत्र'' कहा गया है। प्रतिवर्श माघ पूर्णिमा से यहां एक बृहद मेला का आयोजन होता है, जो महाशिवरात्रि तक लगता है। इस मेले में हजारों-लाखों द र्शनार्थी भगवान नारायण के द र्शन करने जमीन में ''लोट मारते'' आते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान जगन्नाथ यहां विराजते हैं और पुरी के भगवान जगन्नाथ के मंदिर का पट बंद रहता है। इस दिन उनका द र्शन मोक्षदायी होता है। तत्कालीन साहित्य में जिस नीलमाधव को पुरी ले जाकर भगवान जगन्नाथ के रूप में स्थापित किया गया है, उसे इसी भाबरीनारायण-सिंदूरगिरि क्षेत्र से पुरी ले जाने का उल्लेख १४ वीं भाताब्दी के उड़िया कवि सरलादास ने किया है। इसी कारण शिवरीनारायण को छत्तीसगढ़ का जगन्नाथ धाम कहा जाता है और शिवरीनारायण द र्शन के बाद राजिम का द र्शन करना आव यक माना गया है क्योंकि राजिम में ``साक्षी गोपाल'' विराजमान हैं। कदाचित् इसीकारण यहां के मेले को ''छत्तीसगढ़ का कुंभ'' कहा जाता है जो प्रतिवर्श लगता है।&lt;br /&gt;गुप्तधाम :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चारों दि शाओं में अर्थात् उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामे वरम् पूर्व में जगन्नाथपुरी और पि चम में द्वारिकाधाम स्थित है लेकिन मध्य में ''गुप्तधाम'' के रूप में शिवरीनारायण स्थित है। इसका वर्णन रामावतार चरित्र और याज्ञवल्क्य संहिता में मिलता है। यह नगर सतयुग में बैकुंठपुर, त्रेतायुग में रामपुर, द्वापरयुग में विश्णुपुरी और नारायणपुर के नाम से विख्यात् था जो आज शिवरीनारायण के नाम से चित्रोत्पला-गंगा (महानदी) के तट पर कलिंग भूमि के निकट देदीप्यमान है। यहां सकल मनोरथ पूरा करने वाली मां अन्नपूर्णा, मोक्षदायी भगवान भाबरीनारायण, लक्ष्मीनारायण, के शवनारायण, चंद्रचूढ़ और महे वर महादेव, श्रीराम लक्ष्मण जानकी, जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा से युक्त श्री जगदी श मंदिर, राधाकृ ण, काली और मां गायत्री का भव्य और आकर्शक मंदिर है। यहां की महत्‍ताका वर्णन पंडित हीराराम त्रिपाठी द्वारा अनुवादित भाबरीनारायण माहात्म्य में किया गया है:-&lt;br /&gt;                 &lt;br /&gt;भाबरीनारायण पुरी क्षेत्र शिरोमणि जान&lt;br /&gt;याज्ञवलक्य व्यासादि ऋशि निज मुख करत बखान।&lt;br /&gt;कियो संहिता संस्कृत, याज्ञवल्क्य मति धीर&lt;br /&gt;भरद्वाज मुनिसो कह्यो देव सरित के तीर।&lt;br /&gt;सुयश सुखद श्रीराम के सनत होत आनंद&lt;br /&gt;उदाहरण भाशा रच्यो द्विज हीरा मतिमंद।&lt;br /&gt;बुद्धिहीन विद्या रहित लहत न कौड़ी धाम&lt;br /&gt;सत्संग से सो भयो हीरा हीराराम।&lt;br /&gt;श्रीगुरू राम उपासना भक्ति रसिक अनुयाम&lt;br /&gt;गौतमदास महंत मठ नारायणपुर धाम।&lt;br /&gt;महाभारत कालीन विश्णुपुर :-&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;छत्‍तीसगढ़ में महाभारत कालीन अवषेश मिलते हैं। सिरपुर को जहां प्राचीन छत्‍तीसगढ़की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है, वहीं उसे महाभारत कालीन मणिपुर भी कहा जाता है। आरंग और रत्नपुर में भी इस काल के अव ोश मिले हैं। महानदी घाटी तो चतुर्भुजी विश्णु मूर्तियों से सजा है जिसके कारण इस क्षेत्र को स्कंदपुराण में श्रीनारायण और श्रीपुरूशोत्‍तम क्षेत्र कहा गया है। उल्लेखित तथ्यों के अनुसार श्रीकृष्‍ण की मृत्यु जरा नाम के एक बहेलिया के तीर से हो जाती है। जरा पूर्व जन्म में महाबली बाली था और जिसे श्रीराम ने सुग्रीव से मित्रता करने के पूर्व मारा था। मरते समय बाली ने श्रीराम को श्राप दिया कि ''जिस तरह मुझे आपने छल पूर्वक मारा है उसी प्रकार आप भी छल पूर्वक मारे जायेंगे।'' इसी प्रकार महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद गांधारी ने श्रीकृ ण को इसी प्रकार यादव वं श के नश्ट होने का श्राप दिया था। एक अन्य घटना में यदुवं शी कुमारों ने एक यदु कुमार को स्त्री बनाकर ऋशियों से अभद्रता पूर्वक प्र न करने लगे-''हे ऋशिगण ! आप तो सर्वज्ञ हैं, बताइये इसके गर्भ से लड़का जन्म लेगा अथवा लड़की ?'' उनके इस प्रकार के प्र नों से त्रस्त होकर ऋशियों ने श्राप दिया-''इसके गर्भ से जो जन्म लेगा वही तुम्हारे वं श के ना श का कारण बनेगा।'' यदु कुमार ऋशियों के इस श्राप से बहुत घबराये और उसके कपड़े उतारकर देखने लगे। उसके पेट से एक लोहे का मूसल निकला जिसे उन लोगों ने समुद्र के किनारे जाकर घिसा। घिसते समय लोहे का जो बुरादा निकला वह समुद्र की लहरों के साथ किनारे आकर जमा हो गया और जो 'बिना गांठ की घास' के रूप में उगा जो यदुवंशियों के हाथ में आते ही मजबूत होकर लड़ने का साधन बना। लोहे के टुकड़े को अंत में समुद्र में फेंक दिया गया जिसे एक मछली निगल जाती है। यह मछली उसी जरा नाम के बहेलिया को मिलती है। लोहे के उस टुकड़े को वह अपने तीर में लगा लेता है। इसी तीर से श्रीकृष्‍ण की मृत्यु होती है। हिन्दू वैदिक रीति से उनका दाह संस्कार किया गया जिससे उनका भारीर नहीं जला। तब उस मांस पिंड को समुद्र में प्रवाहित कर दिया गया जिसे बाद में बहेलिया सिंदूरगिरि में लाकर एक जलस्रोत के किनारे रखकर उसकी पूजा-अर्चना करने लगा। इससे उन्हें कई प्रकार की सिद्धियां मिली। आज भी अन्यान्य स्थानों में मृत भारीर को जलाने के बजाय नदियों में प्रवाहित करने का रिवाज है।&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;इधर उड़ीसा के पुरी में मंदिर निर्माण के बाद मूर्ति की स्थापना के लिये चिंतित राजा को स्वप्नादे श हुआ कि दक्षिण पि चम दि शा में चित्रोत्पला गंगा के तट पर सिंदूरगिरि में स्थित मूर्ति को लाकर इस मंदिर में स्थापित करो। राज पुरोहित विद्यापति के अथक प्रयास से मूर्ति को लाया गया। इधर बहेलिया निर्दिश्ट स्थान पर मूर्ति को न पाकर बहुत विलाप करने लगा। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें वरदान दिया कि मैं यहां गुप्त रूप से नारायण रूप में विराजमान रहूंगा। यह ''गुप्तधाम'' के रूप में जग प्रसिद्ध होगा। माघ पूर्णिमा को जो कोई मेरा द र्शन करेगा वह मोक्ष का अधिकारी होगा। बंगाल दे शाधिपति राजा धर्म्मवान ने इस स्थान की महिमा से प्रभावित होकर यहां एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया जिसका जीर्णोद्धार रत्नपुर के राजा जाजल्वदेव प्रथम द्वारा कराये जाने का उल्लेख तत्कालीन शिलालेख और साहित्य में मिलता है।&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;बिलासपुर जिला गजेटियर में इसी प्रकार की एक घटना का उल्लेख है। इस घटना के बाद में बताया गया है कि भाबरों को वरदान मिला कि उसके नाम के साथ भगवान नारायण का नाम भी जुड़ जायेगा और पहले '' शबर-नारायण'' फिर भाबरीनारायण और आज शिवरीनारायण यह नगर कहलाने लगा।  प्यारेलाल गुप्त ने अपनी पुस्तक ''प्राचीन छ&gt;शीसगढ़'' और ''बिलासपुर वैभव'' में लिखा है:-''जिस स्थान में शिवरीनारायण बसा है, वहां प्राचीन काल में एक घना जंगल था। वहां एक भाबर रहता था। उस स्थान में भगवान जगन्नाथ की मूर्ति थी जिसकी वह नित्य पूजा-अर्चना किया करता था। एक बार एक ब्राह्मण ने उस मूर्ति को देख लिया और उसे ले जाकर जगन्नाथ पुरी में स्थापित कर दी।''  तथ्य चाहे जो भी हो, ऐसी मान्यता है कि भगवान नारायण का यहां गुप्तवास है और चूंकि चित्रोत्पलागंगा में स्नान करने, उसमें अस्थि विसर्जन करने तथा रोहिणी कुंड का द र्शन और जल का आचमन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए शिवरीनारायण को 'गुप्त प्रयाग' कहा जाता है। शिवरीनारायण की मान्यता इलाहाबाद से किसी मायने में कम नहीं है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-8763302898668500213?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_265.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-7594339160105392816</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:21:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:22:35.265-08:00</atom:updated><title>शबरीनारायण और सहयोगी देवालय</title><description>शिवरीनारायण में अन्यान्य मंदिर हैं जो विभिन्न कालों में निर्मित हुए हैं। चूंकि यह नगर विभिन्न समाज के लोगों का सांस्कृतिक तीर्थ है अत: उन समाजों द्वारा यहां मंदिर निर्माण कराया गया है। यहां अधिकां श मंदिर भगवान विश्णु के अवतारों के हैं। कदाचित् इसी कारण इस नगर को वैश्णव पीठ माना गया है। इसके अलावा यहां भौव और भाशक्त परम्परा के प्राचीन मंदिर भी हैं। इन मंदिरों में निम्नलिखित प्रमुख  हैं :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शबरीनारायण मंदिर :-&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;यहां के प्राचीन मंदिरों और मूर्तियों की भव्यता और अलौकिक गाथा अपनी मूलभूत संस्कृति का भाश वत रूप प्रकट कर रही है, जो प्राचीनता की दृश्टि से अद्वितीय है। ८-९ वीं भाताब्दी की  मूर्तियों को समेटे मंदिर एक कलात्मक नमूना है, जिसमें उस काल की शिल्पकला आज भी देखी जा सकती है। १७२ फीट ऊंचा, १३६ फीट परिधि और शिखर में १० फीट का स्वर्णिम कल श के कारण कदाचित् इसे ''बड़ा मंदिर'' कहा जाता है। वास्तव में यह नारायण मंदिर है, और प्राचीन काल से श्री भाबरीनारायण भगवान के नाम से प्रसिद्ध है। यह उ&gt;शर भारतीय आर्य शिखर भौली का उ&gt;शम उदाहरण है। इसका प्रवे श द्वार सामान्य कलचुरि कालीन मंदिरों से भिन्न है। इस प्रवे श द्वार की भौलीगत समानता नागवं शी मंदिरों से अधिक है। वर्तमान मंदिर जीर्णोद्धार के कारण नव कलेवर में दृश्टिगत होता है। इस मंदिर के गर्भगृह में दीवारों पर चित्र भौली में कुछ संकेत भी दृश्टिगत होता है। कारीगरों की यह सांकेतिक भाब्दावली भी हो सकती है ? प्राचीन काल में यहां पर एक बहुत बड़ा जलस्रोत था और इसे बांधा गया है। जलस्रोत को बांधने के कारण मंदिर का चबूतरा १०० घ्घ्१०० मीटर का है। जलस्रोत भगवान नारायण के चरणों में सिमट गया है। इसे ''रोहिणी कुंड'' कहा जाता है। इस कुंड की महत्‍ताकवि बटुकसिंह चौहान के भाब्दों में :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोहिणी कुंड एक धाम है, है अमृत का नीर&lt;br /&gt;बंदरी से नारी भई, कंचन भयो भारीर।&lt;br /&gt;जो कोई नर जाइके, दर शन करे वही धाम&lt;br /&gt;बटुक सिंह दरशन करी, पाये परम पद निर्वाण।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इसी प्रकार सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित मालिकराम भोगहा ने इसे मोक्षदायी बताया है :-&lt;br /&gt;                 &lt;br /&gt;रोहिणि कुंडहि स्पर्श करि चित्रोत्पल जल न्हाय।&lt;br /&gt;योग भ्रश्ट योगी मुकति पावत पाप बहाय।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इस मंदिर के गर्भ द्वार के पा र्व में वैश्णव द्वारपालों भांख पुरूश और चक्र पुरूश की आदमकद प्रतिमा है। इसी आकार प्रकार की मूर्तियां खरौद के भाबरी मंदिर के गर्भगृह में भी है। द्वार भाशखा पर बारीक कारीगरी और भौलीगत लक्षण की भिन्नता दर्शनीय है। गर्भगृह में चांदी के दरवाजा को ''के शरवानी महिला समाज'' द्वारा बनवाया गया है। इसे श्री देवालाल के शरवानी ने जीवन मिस्त्री के सहयोग से कलकत्ता से सन् १९५९ में बनवाया था। गर्भगृह में भगवान नारायण पीताम्बर वस्त्र धारण किये भांख, चक्र, पद्म और गदा से सुसज्जित स्थित हैं। साथ ही दरवाजे के पास परवर्ती कालीन गरूड़ासीन लक्ष्मीनारायण की बहुत ही आकर्शक प्रतिमा है, जिसे जीर्णोद्धार के समय भग्न मंदिर से लाकर रखा गया है। मंदिर के बाहर गरूड़ जी और मां अम्बे की प्रतिमा है। मां अम्बे की प्रतिमा के पीछे भगवान कल्कि अवतार की मूर्ति है जो शिवरीनारायण के अलावा जगन्नाथ पुरी में है। श्री प्रयागप्रसाद और श्री जगन्नाथप्रसाद के शरवानी ने मंदिर में संगमरमर लगवाकर सद्कार्य किया है। मंदिर में सोने का कल श क्षेत्रीय कोश्टा समाज के द्वारा सन् १९५२ में लगवाया गया है।&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;शिवरीनारायण के बड़े मंदिर में स्थित मूर्तियों के बारे में लोगों में भेद है। कुछ लोग इसे श्रीराम और लक्ष्मण की मूर्ति मानते हैं, जो सीता जी की खोज करते यहां आये थे और यहां उनकी भाबरी से भेंट हुई और उनके जूठे बेर खाये। भाबरी के इच्छानुरूप इस स्थान को '' शबरी-नारायण'' के रूप में प्रख्यात् किया। यहां से मात्र २ कि.मी. पर स्थित खरौद के दक्षिण द्वार पर भाबरी मंदिर है, इसे ''सौराइन दाई'' भी कहा जाता है। प्राचीन साहित्य में यहां का नाम '' शौरिनारायण'' मिलता है। श्री प्यारेलाल गुप्त ने प्राचीन छत्‍तीसगढ़में लिखा है :-''शिवरीनारायण का प्राचीन नाम भाौरिपुर होना चाहिये। भाौरि भगवान विश्णु का एक नाम है और भाौरि मंडप के निर्माण कराये जाने का उल्लेख एक तत्कालीन शिलालेख में हुआ है।'' इस मंदिर के निर्माण के सम्बंध में भी अनेक किंवदंतियां प्रचलित है। इतिहासकार इस मंदिर का निर्माण किसी भाबर राजा द्वारा कराया गया मानते हैं। सुप्रसिद्ध साहित्यकार और भोगहापारा (शिवरीनारायण) के मालगुजार पंडित मालिकराम भोगहा ने भी इस मंदिर का निर्माण किसी भाबर के द्वारा कराया गया मानते हैं। छत्‍तीसगढ़के प्राचीन इतिहास में ५वीं भाताब्दी के अंतिम चरण और ६वीं भाताब्दी के प्रारंभ में दक्षिण कोसल में भारभवं श का उदय हुआ था जिसकी राजधानी भारभपुर में थी। लेकिन भारभपुर की वास्तविक स्थिति का पता अभी तक नहीं चल सका है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार इस वं श के आदि पुरूश  शरभराज थे, जिनकी राजधानी सारंगपुर में थी। भारभराज के पुत्र नरेन्द्र के भाशसनकाल में दो ताम्र पत्र क्रम श: पिपरदुला (सारंगढ़) और कुरूद (जिला रायपुर) में मिला है। लेकिन भारभवं शी राजाओं के द्वारा किये गये कार्यो की स्पश्ट जानकारी नहीं मिलती। डॉ. हीरालाल ने सिरपुर को भारभपुर माना है। उनके अनुसार भारभपुरियों ने सिरपुर में पांडुवंशियों के बाद भाशसन किया और सिरपुर का नाम बदलकर भारभपुर रखा। पंडित लोचनप्रसाद पांडेय ने उड़ीसा के राजगांगपुर के प्रमुख नगर भार्पपुर अथवा भारभगढ़ को भारभपुर बताया है। डॉ. व्ही. व्ही. मिरा शी के अनुसार १२ वीं भाताब्दी में रत्नपुर के कलचुरि राजा बहुत ही भाक्ति शाली थे और उन्होंने ही महानदी और शिवनाथ नदी के संगम के पास स्थित शिवरीनारायण में भगवान विश्णु का एक भव्य मंदिर बनवाया है। कुछ विद्वान इस मंदिर का निर्माण छहमासी रात में हुआ मानते हैं। एक किंवदंती के अनुसार शिवरीनारायण के इस मंदिर और जांजगीर के विश्णु मंदिर में छहमासी रात में बनने की प्रतियोगिता थी। सूर्योदय के पहले शिवरीनारायण का मंदिर बनकर तैयार हो गया, इसलिये भगवान नारायण उस मंदिर में विराजे और जांजगीर का मंदिर को अधूरा ही छोड़ दिया गया जो आज उसी रूप में स्थित है। शिवरीनारायण का यह मुख्य मंदिर उत्तर भारतीय आर्य शिखर भौली का उदाहरण है और उसका प्रवे श द्वार सामान्य कलचुरि प्रकार के मंदिरों से भिन्न है। इस प्रवे श द्वार की भौलीगत समानता नागवं शी मंदिरों के प्रवे शद्वार से की जा सकती है।&lt;br /&gt;शिवनारायण मंदिर :-&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;नारायण मंदिर की पूर्व दि शा में पि चमाभिमुख सर्व भाक्तियों से परिपूर्ण के शवनारायण की ११-१२ वीं सदी का मंदिर है। ईंट और पत्थर बना ताराकृत संरचना है जिसके प्रवे श द्वार पर विश्णु के चौबीस रूपों का अंकन बड़ी सफाई के साथ किया गया है। जबकि द्वार के ऊपर शिव की मूर्ति है। अन्य परम्परागत स्थापत्य लक्षणों के साथ गर्भगृह में द शावतार विश्णु की मानवाकार प्रतिमा है। यह मंदिर कलचुरि कालीन वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है। यहां एक छोटा अंतराल है, इसके बाद गर्भगृह। मंदिर पंचरथ है और मंदिर की द्वार भाशखा पर गंगाऱ्यमुना की मूर्ति है, साथ ही द शावतारों का चित्रण हैं। इस मंदिर में भौव और वैश्णव परंपरा की मिश्रित संरचना देखने को मिलती है।&lt;br /&gt;चंद्रचूड़ महादेव :-&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;के शवनारायण मंदिर की वायव्य दि शा में चेदि संवत् ९१९ में निर्मित और छत्तीसगढ़ के ज्योर्तिलिंग के रूप में विख्यात् ''चंद्रचूड़ महादेव'' का एक प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर के द्वार पर एक वि शाल नंदी की मूर्ति है। शिवलिंग की पूजा-अर्चना करते राज पुरूश और रानी की हाथ जोड़े पद्मासन मुद्रा में प्रतिमा है। नंदी की मूर्ति के बगल में किसी संन्यासी की मूर्ति है। मंदिर की बाहरी दीवार पर एक कलचुरि कालीन चेदि संवत् ९१९ का एक शिलालेख है। इस शिलालेख का निर्माण कुमारपाल नामक किसी कवि ने कराया है और भोग राग आदि की व्यवस्था के लिए चिचोली नामक गांव दान में दिया है। पाली भाशा में लिखे इस शिलालेख में रतनपुर के राजाओं की वं शावली दी गयी है। इसमें राजा पृथ्वीदेव के भाई सहदेव, उनके पुत्र राजदेव, पौत्र गोपालदेव और प्रपौत्र अमानदेव के पुण्य कर्मो का उल्लेख किया गया है। इस मंदिर की प्राचीन संरचना नश्ट हो चुकी है और नवीन संरचना में बिखरी मूर्तियों को दीवारों में खचित करके दृश्टब्य है। बहुत संभव है कि इस मंदिर में खचित शिलालेख भी कहीं से लाकर दीवार में खचित कर दिया गया हो ?&lt;br /&gt;राम लक्ष्मण जानकी मंदिर :-&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;चंद्रचूड़ महादेव मंदिर की ठीक उत्तर दि शा में श्रीराम लक्ष्मण जानकी का एक भव्य मंदिर है जिसका निर्माण महंत अर्जुनदास की प्रेरणा से पुत्र प्राप्ति के प चात् अकलतरा के जमींदार श्री सिदारसिंह ने कराया था। इसी प्रकार केंवट समाज द्वारा श्रीराम लक्ष्मण जानकी मंदिर का निर्माण रामघाट के पास लक्ष्मीनारायण मंदिर के पास कराया गया है।&lt;br /&gt;मठ के मंदिर :-&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;नारायण मंदिर की वायव्य दि शा में एक अति प्राचीन वैश्णव मठ है जिसका निर्माण स्वामी दयारामदास ने नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों से इस नगर को मुक्त कराने के बाद की थी। रामानंदी वैश्णव सम्प्रदाय के इस मठ के वे प्रथम महंत थे। तब से आज तक १४ महंत हो चुके हैं और वर्तमान में इस मठ के राजेश्री रामसुन्दरदास जी महंत हैं। खरौद के लक्ष्मणे वर मंदिर के चेदि संवत् ९३३ के शिलालेख में मंदिर की दक्षिण दि शा में संतों के निवासार्थ एक मठ के निर्माण कराये जाने का उल्लेख है। यहां संवत् १९२७ में महंत अर्जुनदास की प्रेरणा से भटगांव के जमींदार राजसिंह ने एक जगदी श मंदिर बनवाया जिसे उनके पुत्र चंदनसिंह ने पूरा कराया। इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के अलावा श्रीराम लक्षमण और जानकी जी की मनमोहक मूर्ति है। परिसर में हनुमान जी और सूर्यदेव की मूर्ति है। सूर्यदेव के मंदिर को संवत् १९४४ में रायपुर के श्री छोगमल मोतीचंद्र ने बनवाया। इसी प्रकार हनुमानजी के मंदिर को लवन के श्री सुधाराम ब्राह्मण ने संवत् १९२७ में स्वामी जी की प्रेरणा से पुत्र प्राप्ति के बाद बनवाया। इसके अलावा महंतों की समाधि है जिसे संवत् १९२९ में बनवाया गया है।&lt;br /&gt;महे वर महादेव और शीतला माता मंदिर :-&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;महानदी के तट पर छत्‍तीसगढ़के सुप्रसिद्ध मालगुजार श्री माखनसाव के कुलदेव महे वर महादेव और कुलदेवी शीतला माता का भव्य मंदिर, बरमबाबा की मूर्ति और सुन्दर घाट है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित मालिकराम भोगहा द्वारा लिखित श्री शबरीनारायण माहात्म्य के अनुसार इस मंदिर का निर्माण संवत् १८९० में माखन साव के पिता श्री मयाराम साव और चाचा श्री मनसाराम और सरधाराम साव ने कराया है। माखन साव भी धार्मिक, सामाजिक और साधु व्यक्ति थे। ठाकुर जगमोहनसिंह ने 'सज्जनाश्टक' में उनके बारे में लिखा है। उनके अनुसार माखनसाव क्षेत्र के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बद्रीनाथ और रामे वरम् की यात्रा की और ८० वर्श तक सुख भोगा। उन्होंने महे वर महादेव और शीतला माता मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। उनके पौत्र श्री आत्माराम साव ने मंदिर परिसर में संस्कृत पाठ शाला का निर्माण कराया और सुन्दर घाट और बाढ़ से भूमि का कटाव रोकने के लिए मजबूत दीवार का निर्माण कराया। इस घाट में अस्थि विसर्जन के लिए एक कुंड बना है। इस घाट में अन्यान्य मूर्तियां जिसमें शिवलिंग और हनुमान जी प्रमुख है, के अलावा सती चौरा बने हुये हैं।&lt;br /&gt;लक्ष्मीनारायण-अन्नपूर्णा मंदिर :-&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;नगर के पश्चिम में मैदानी भाग जहां मेला लगता है, से लगा हुआ लक्ष्मीनारायण मंदिर है। मंदिर के बाहर जय विजय की मूर्ति माला लिए जप करने की मुद्रा में है। सामने गरूड़ जी हाथ जोड़े विराजमान हैं। गणे श जी भी हाथ में माला लिए जप की मुद्रा में हैं। मंदिर के पूर्वी द्वार पर माता शीतला, काल भैरव विराजमान हैं। वहीं दक्षिण द्वार पर भोर बने हैं। भीतर मां अन्नपूर्णा की ममतामयी मूर्ति है जो पूरे छत्तीसगढ़ में अकेली है। उन्हीं की कृपा से समूचा छत्तीसगढ़ ''धान का कटोरा'' कहलाता है। नवरात्र में यहां ज्योति कल श प्रज्वलित किये जाते हैं। बिलाईगढ़ के जमींदार ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार खरौद के गिरि गोस्वामी मठ के महंत हजारगिरि की प्रेरणा से कराया था। जीर्णोद्धार में लक्ष्मीनारायण और अन्नपूर्णा मंदिर एक ही अहाता के भीतर आ गया जबकि दोनों मंदिर का दरवाजा आज भी अलग अलग है। लक्ष्मीनारायण मंदिर का दरवाजा पूर्वाभिमुख है जबकि अन्नपूर्णा मंदिर का दरवाजा दक्षिणाभिमुख है। मंदिर परिसर में दक्षिणमुखी हनुमान जी का मंदिर भी है। इस मंदिर के सर्वराकार पंडित वि वे वरनारायण द्विवेदी हैं।&lt;br /&gt;श्रीरामजानकी मंदिर :-&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;केवट समाज द्वारा निर्मित श्रीराम, लक्ष्मण और जानकी मंदिर है। इस मंदिर परिसर में भगवान विश्णु के चौबीस अवतारों की सुंदर दर्शनीय मूर्तियां हैं। इस मंदिर के बगल में संवत् १९९७ में निर्मित श्रीरामजानकी-गुरू नानकदेव मंदिर का मंदिर है। इस मंदिर के सर्वराकार पंडित विश्‍वेश्‍वरनारायण द्विवेदी हैं।&lt;br /&gt;राधाकृष्‍ण मंदिर :-&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;मां अन्नपूर्णा मंदिर के पास कु शवाहा मरार-पटेल समाज के द्वारा राधाकृ ण मंदिर और उससे लगे समाज की धर्म शाला है। मंदिर के ऊपरी भाग में शिवलिंग स्थापित है। इसी प्रकार लोक निर्माण विभाग के विश्राम गृह के सामने मथुआ मरार समाज द्वारा राधा-कृ ण का पूर्वाभिमुख मंदिर बनवाया गया है।&lt;br /&gt;काली और हनुमान मंदिर :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शबरी सेतु के पास काली और हनुमान जी का भव्य और आकर्शक मंदिर द र्शनीय है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गायत्री मंदिर :- बिलासपुर रोड में गायत्री देवी का भव्य मंदिर दर्शनीय है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-7594339160105392816?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_5958.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-7966331576079888510</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:21:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:21:41.114-08:00</atom:updated><title>अन्नपूर्णा मंदिर</title><description>छत्तीसगढ़ की जीवनदायिनी चित्रोत्पला गंगा (महानदी) के तट पर स्थित शिवरीनारायण आदिकाल से ऋशि-मुनियों और देवी-देवताओं की सिद्धि स्थली रही है। सतयुग में भगवान श्रीराम और लक्ष्मण यहां भाबरी के मीठे बेर खाये थे और भाबरी को मोक्ष प्रदान कर भाबरीनारायण की आधार शिला रखी। वे यहां भाबरी की प्रार्थना को स्वीकार करके नारायण रूप में विराजमान हुए। खरौद के दक्षिण द्वार में सौराइन दाई का अति प्राचीन पूर्वाभिमुख मंदिर है। इसके गर्भगृह में श्रीराम और लक्ष्मण के धनुर्धारी मूर्ति है। खरौद के लक्ष्मणे वर महादेव की स्थापना भी श्रीराम ने भाई लक्ष्मण के अनुरोध पर लंका विजय के निमित्त की थी। भगवान जगन्नाथ को शिवरीनारायण से ही पुरी ले जाया गया है। माघपूर्णिमा को प्रतिवर्श भगवान जगन्नाथ यहां विराजते हैं और उनका द र्शन मोक्षदायी होता है। उनके यहां गुप्त रूप में विराजमान होने के कारण भाबरीनारायण को ''गुप्त तीर्थ`` के रूप में पांचवां धाम माना गया है। ऋशि मुनि इसकी महिमा गाते हैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाबरीनारायण पुरी क्षेत्र शिरोमणि जान&lt;br /&gt;याज्ञवल्क्य व्यासादि ऋशि निज मुख करत बखान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिवरीनारायण में वैश्णव परम्परा के भगवान नारायण, के शवनारायण, लक्ष्मीनारायण और भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी के भव्य मंदिर हैं। एक वैश्णव मठ भी यहां हैं। श्रीराम जानकी मंदिर को अकलतरा के जमींदार श्री सिदारसिंह ने महंत अर्जुनदास की प्रेरणा से पुत्ररत्न प्राप्ति के बाद संवत् १९२७ में बनवाया। इसी प्रकार एक अन्य श्रीराम लक्ष्मण जानकी मंदिर का निर्माण क्षेेत्रीय केवट समाज के द्वारा बनवाया गया है। इस मंदिर में भगवान विश्णु के २४ अवतारों की मूर्तियां हैं। इस मंदिर के बगल मंें बंजारा नायक समाज के द्वारा निर्मित श्रीरामजानकी गुरू नानकदेव मंदिर है। महानदी के तट पर लक्ष्मीनारायण का अति प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर पूर्वाभिमुख है। बिलाईगढ़ के जमींदार ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार खरौद के गिरि गोस्वामी मठ के महंत हजारगिरि की प्रेरणा से कराया था। इस मंदिर प्रांगण में मां अन्नपूर्णा का दक्षिणाभिमुख सौम्य मूर्ति से युक्त भव्य मंदिर है। इस मंदिर के परिसर में समस्त सोलह भाक्तियां मेदनीय, भद्रा, गंगा, बहुरूपा, तितिक्षा, माया, हेतिरक्षा, अर्पदा, रिपुहंत्री, नंदा, त्रिनेती, स्वामी सिद्धि और हासिनी मां अन्नपूर्णा के साथ विराजित हैं। ''माता वि शालाक्षि भगवान सुन्दरी त्वां अन्नपूर्णे भारण प्रपद्ये`` ऋतुओं के संधिकाल में पड़ने वाले नवरात्र में किये जाने वाले आध्यात्मिक जप तप अनुश्ठान और समस्त धार्मिक कार्य फलदायी होते हैं। भाशरदीय वसंत पर्व में मां अन्नपूर्णा प्रत्येक दिन अलग अलग रूपों में सु शोभित होती हैं। पहले दिन मां अन्नपूर्णा महागौरी, दूसरे दिन ज्येश्ठा गौरी, तीसरे दिन सौभाग्य गौरी, चौथे दिन श्रृंगार गौरी, पांचवे दिन वि शालाक्षी गौरी, छठे दिन ललिता गौरी, सातवें दिन भवानी और आठवें दिन मंगलागौरी के रूप में विराजित होेती हैं। छत्तीसगढ़ के महिला समाज द्वारा यहां मंगलागौरी की पूजा और उसका उद्यापन किया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त्रेतायुग में श्रीरामचंद्रजी जब लंका पर चढ़ाई करने जाने लगे तब उन्होंने मां अन्नपूर्णा की आराधना करके अपनी बानर सेना की भूख को भाशंत करने की प्रार्थना की थी। तब मां अन्नपूर्णा ने सबकी भूख को भाशंत ही नहीं किया बल्कि उन्हें लंका विजय का आ शीर्वाद भी दिया। इसी प्रकार द्वापरयुग में पांडवों ने कौरवों से युद्ध शुरू करने के पूर्व मां अन्नपूर्णा से सबकी भूख भाशंत करने और अपनी विजय का वरदान मांगा था। मां अन्नपूर्णा ने उनकी मनोकामना पूरी करते हुए उन्हें विजय का आ शीर्वाद दिया था। सृश्टि के आरंभ में जब पृथ्वी का निचला भाग जलमग्न था तब हिमालय क्षेत्र में भगवान नारायण बद्रीनारायण के रूप में विराजमान थे। कालांतर में जल स्तर कम होने और हिमालय क्षेत्र बर्फ से ढक जाने के कारण भगवान नारायण सिंदूरगिरि क्षेत्र के भाबरीनारायण में विराजमान हुए। यहां उनका गुप्त वास होने के कारण भाबरीनारायण ''गुप्त तीर्थ`` के रूप में जगत् विख्यात् हुआ। कदाचित इसी कारण देवी-देवता और ऋशि-मुनि आदि तपस्या करने और सिद्धि प्राप्त करने के लिए इस क्षेत्र में आते थे। उनकी क्षुधा को भाशंत करने के लिए मां अन्नपूर्णा यहां सतयुग से विराजित हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाक्ति से शिव अलग नहीं हैं। अधिश्ठान से अध्यस्त की सत्ता भिन्न नहीं होती, वह तो अधिश्ठान रूप ही है। शिव एकरस अपरिणामी है और भाक्ति परिणामी हैं। यह जगत परिणामी भाक्ति का ही विलास है। शिव से भाक्ति का आविर्भाव होते ही तीनों लोक और चौदह भुवन उत्पन्न होते हैं और भाक्ति का तिरोभाव होते ही जगत अभावग्रस्त हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाक्ति जातं हि संसारं तस्मिन सति जगत्व्रयम्।&lt;br /&gt;तस्मिन् क्षीणे जगत क्षीणं तच्चिकित्स्य प्रयत्नेत:।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आनंद स्वरूपा भक्त वत्सला मां भवानी भक्तों के भावनानुसार अनेक रूपों को धारण करती है-दुर्गा, महाकाली, राधा, ललिता, त्रिपुरा, महालक्ष्मी, महा सरस्वती और अन्नपूर्णा। चूंकि शिव से इनकी सत्ता अलग नहीं है अत: इनको ''शिव- शक्ति`` कहते हैं। भगवान भांकराचार्य के अनुसार ''परमात्मा की अश्टाक्त नामावली भाक्ति जिसने समस्त संसार को उत्पन्न किया है, अनादि, अविद्या, त्रिगुणात्मिका और जगत रूपी कार्य से परे है।`` कार्यरूप जगत को देखकर ही भाक्तिरूपी माया की सिद्धि होती है। जिस प्रकार बालक माता के गर्भ में नौ माह तक रहकर जन्म लेता है, उसी प्रकार तीनों लोक और चौदह भुवन भाक्ति रूपी माता के गर्भ में स्थित है। मां अन्नपूर्णा हमारा पालन और पोशण करती है। गीता में श्रीकृश्ण जी कहते हैं-'हे अर्जुन ! मेरी भाक्ति रूपी योनि गर्भाधान का स्थान है और मैं उस योनि में चेतनरूप बीज स्थापित करता हूं। इन दोनों के संयोग से संसार की उत्पत्ति होती है। अनेक प्रकार की योनि में जितने भारीरादि आकार वाले पदार्थ उत्पन्न होते हैं, उनमें त्रिगुणमयी भाक्ति तो गर्भ धारण करने वाली माता है और मैं बीज का स्थापन करने वाला पिता हूं।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''धान का कटोरा`` कहलाने वाला छत्तीसगढ़ का सम्पूर्ण भूभाग मां अन्नपूर्णा की कृपा से प्रतिफलित है। जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत जांजगीर से ६० कि.मी., बिलासपुर से ६४ कि.मी. और रायपुर से १२० कि.मी. व्हाया बलौदाबाजार की दूरी पर पवित्र महानदी के पावन तट पर स्थित शिवरीनारायण की पि चम छोर में रामघाट से लगा लक्ष्मीनारायण मंदिर परिसर में दक्षिण मुखी मां अन्नपूर्णा विराजित हैं। काले ग्रेनाइट पत्थर की ११-१२ वीं भाताब्दी की अन्यान्य मूर्तियों से सुसज्जित इस मंदिर का जीर्णोद्धार महंत हजारगिरि की प्रेरणा से बिलाईगढ़ के जमींदार ने १७वीं भाताब्दी में कराया था। मंदिर परिसर में भगवान लक्ष्मीनारायण के द्वारपाल जय-विजय और सामने गरूड़ जी के अलावा दाहिनी ओर चतुर्भुजी गणे श जी जप करने की मुद्रा में स्थित हैं। दक्षिण द्वार से लगे चतुर्भुजी दुर्गा जी अपने वाहन से सटकर खड़ी हैं। मंदिर की बायीं ओर आदि शक्ति महागौरी मां अन्नपूर्णा विराजित हैं। इस मंदिर का पृथक् अस्तित्व है। मंदिर के जीर्णोद्धार के समय घेराबंदी होने के कारण मां अन्नपूर्णा और लक्ष्मीनारायण मंदिर एक मंदिर जैसा प्रतीत होता है और लोगों को इस मंदिर के पृथक् अस्तित्व का अहसास नहीं होता। अन्नपूर्णा जी की बायीं ओर दक्षिणाभिमुख पवनसुत हनुमान जी विराजमान हैं। पूर्वी प्रवे श द्वार पर एक ओर कालभैरव और दूसरी ओर शीतला माता स्थित है। मां अन्नपूर्णा और भगवान लक्ष्मीनारायण के वि ोश कृपापात्र मंदिर के पुजारी और सुप्रसिद्ध ज्योतिशाचार्य पंडित वि वे वर नारायण द्विवेदी के कु शल संरक्षण में यहां प्रतिवर्श भाशरदीय और वासंतिक नवरात्र में सर्वसिद्धि और मनोकामना ज्योति कल श प्रज्वलित किया जाता है। मां अन्नपूर्णा की कृपा हम सबके ऊपर सदा बनी रहे, यही कामना है। उन्हें हमारा भात् भात् नमन पंडित लोचनप्रसाद पांडेय के भाब्दों में :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महामाया रूपे परमवि शदे भाक्ति ! अमले !&lt;br /&gt;रमा रम्ये भाशन्ते सरल हृदये देवि ! कमले !&lt;br /&gt;जगन्मूले आद्ये कवि विवुधवन्द्ये श्रुतिनुते !&lt;br /&gt;बिना तेरी दया कब अमरता लोग लहते !!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-7966331576079888510?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_341.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-770721196012364780</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:20:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:21:00.003-08:00</atom:updated><title>महेश्‍वरनाथ</title><description>छत्तीसगढ़ के अधिकां श शिव मंदिर सृजन और कल्याण के प्रतीक स्वरूप निर्मित हुए हैं। लिंग रहस्य और लिंगोपासना के बारे में स्कंद पुराण में वर्णन मिलता है, उसके अनुसार भगवान महे वर अलिंग हैं, प्रकृति प्रधान लिंग है -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आकाशं लिंगमित्याहु पृथिवी तस्य पीठिका।&lt;br /&gt;आलय: सर्व देवानां लयनाल्लिंग मुच्यते।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात् आका श लिंग और पृथ्वी उसकी पीठिका है। सब देवताओं का आलय में लय होता है, इसीलिये इसे लिंग कहते हैं। हिन्दू धर्म में शिव का स्वरूप अत्यंत उदात्त रहा है। पल में रूश्ट और पल में प्रसन्न होने वाले और मनोवंशछित वर देने वाले औघड़दानी महादेव ही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ में राजा-महाराजा, जमींदार और मालगुजारों द्वारा निर्मित अनेक गढ़, हवेली, किला और मंदिर आज भी उस काल के मूक साक्षी है। कई लोगों के वं श खत्म हो गये और कुछ राजनीति, व्यापार आदि में संलग्न होकर अपनी वं श परम्परा को बनाये हुए हैं। वं श परम्परा को जीवित रखने के लिए क्या कुछ नहीं करना पड़ता ? राजा हो या रंक, सभी वं श वृद्धि के लिए मनौती मानने, तीर्थयात्रा और पूजाऱ्यज्ञादि करने का उल्लेख तात्कालीन साहित्य में मिलता हैं। देव संयोग से उनकी मनौतियां पूरी होती रहीं और देवी-देवताओं के मंदिर इन्ही मनौतियों की पूर्णता पर बनाये जाते रहे हैं, जो कालान्तर में उनके ''कुलदेव`` के रूप में पूजित होते हैं। छत्तीसगढ़ में औघड़दानी महादेव को वं शधर के रूप में पूजा जाता है। खरौद के लक्ष्मणे वर महादेव को वं शधर के रूप में पूजा जाता है। यहां लखेसर चढ़ाया जाता है। हसदो नदी के तट पर प्रतिश्ठित काले वरनाथ महादेव वं शवृद्धि के लिए सुविख्यात् है। खरियार के राजा वीर विक्रम सिंहदेव ने काले वर महादेव की पूजा अर्चना कर वं श वृद्धि का लाभ प्राप्त किया था। खरियार के युवराज डॉ. जे. पी. सिंहदेव ने मुझे सूचित किया है-''मेरे दादा स्व. राजा वीर विक्रम सिंहदेव ने वास्तव में वं श वृद्धि के लिए पीथमपुर जाकर काले वर महादेव की पूजा और मनौती की थी। उनके आ शीर्वाद से दो पुत्र क्रम श: आरतातनदेव, विजयभैरवदेव और दो पुत्री कनक मंजरी देवी और भाोभज्ञा मंजरी देवी हुई और हमारा वं श बढ़ गया।'' इसी प्रकार माखन साव के वं श को महे वर महादेव ने बढ़ाया। इन्ही के पुण्य प्रताप से बिलाईगढ़-कटगी के जमींदार की वं शबेल बढ़ी और जमींदार श्री प्रानसिंह बहादुर ने नवापारा गांव माघ सुदी ०१ संवत् १८९४ में महे वर महादेव के भोग-रागादि के लिए चढ़ाकर पुण्य कार्य किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; महानदी के तट पर छत्‍तीसगढ़के सुप्रसिद्ध मालगुजार श्री माखनसाव के कुलदेव महे वर महादेव और कुलदेवी शीतला माता का भव्य मंदिर, बरमबाबा की मूर्ति और सुन्दर घाट है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित मालिकराम भोगहा द्वारा लिखित श्री शबरीनारायण माहात्म्य के अनुसार इस मंदिर का निर्माण संवत् १८९० में माखन साव के पिता श्री मयाराम साव और चाचा श्री मनसाराम और सरधाराम साव ने कराया है। माखन साव भी धार्मिक, सामाजिक और साधु व्यक्ति थे। ठाकुर जगमोहनसिंह ने 'सज्जनाश्टक' में उनके बारे में लिखा है। उनके अनुसार माखनसाव क्षेत्र के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बद्रीनाथ और रामे वरम् की यात्रा की और ८० वर्श तक जीवित रहे। उन्होंने महे वर महादेव और शीतला माता मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। उनके पौत्र श्री आत्माराम साव ने मंदिर परिसर में संस्कृत पाठ शाला का निर्माण कराया और सुन्दर घाट और बाढ़ से भूमि का कटाव रोकने के लिए मजबूत दीवार का निर्माण कराया। इस घाट में अस्थि विसर्जन के लिए एक कुंड बना है। इस घाट में अन्यान्य मूर्तियां जिसमें शिवलिंग और हनुमान जी प्रमुख हैं, के अलावा सती चौरा बने हुए हैं। महे वरनाथ की महिमा अपरम्पार है, तभी तो कवि स्व. श्री तुलाराम गोपाल उनकी महिमा गाते हैं -&lt;br /&gt;सदा आज की तिथि में आकर यहां जो मुझे गाये&lt;br /&gt;लाख बेल के पत्र, लाख चावल जो मुझे चढ़ाये&lt;br /&gt;एवमस्तु ! तेरे कृतित्व के क्रम को रखने जारी&lt;br /&gt;दूर करूंगा उनके दुख, भय, क्ले श, भाोक संसारी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महानदी में बाढ़ आने पर नदी का जल महे वरनाथ को स्प र्श कर उतरने लगता है। ठाकुर जगमोहनसिंह ने प्रलय में इसका उल्लेख किया है -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाढ़त सरित बारि छिन-छिन में। चढ़ि सोपान घाट वट दिन मे।&lt;br /&gt;शिवमंदिर जो घाटहिं सौहै। माखन साहु रचित मन मोहै।।८४।।&lt;br /&gt;चट शाला जल भीतर आयो। गैल चक्रधर गेह बहायो।&lt;br /&gt;पुनि सो माखन साहु निकेता।। पावन करि सो पान समेता।।८७।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिवरीनारायण के अलावा हसुवा, टाटा और लखुर्री में महेश्वर महादेव का और झुमका में बजरंगबली का भव्य मंदिर है। हसुवा के महे वर महादेव के मंदिर को माखन साव के भतीजा और गोपाल साव के पुत्र बैजनाथ साव, लखुर्री के महे वरनाथ मंदिर को सरधाराम साव के प्रपौत्र प्रयाग साव ने और झुमका के बजरंगबली के मदिर को बहोरन साव ने बनवाया। इसी प्रकार टाटा के घर में अंडोल साव ने शिवलिंग स्थापित करायी थी। माखन वं श द्वारा निर्मित सभी मंदिरों के भोगराग की व्यवस्था के लिए कृशि भूमि निकाली गयी थी। इससे प्राप्त अनाज से मंदिरों में भोगराग की व्यवस्था होती थी। आज भी ये सभी मंदिर बहुत अच्छी स्थिति में है और उनके वं शजों के द्वारा सावन मास में श्रावणी पूजा और महाशिवरात्रि में अभिशेक किया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिवरीनारायण के इस महे वरनाथ मंदिर के प्रथम पुजारी के रूप में श्री माखन साव ने पंडित रमानाथ को नियुक्त किया था। पंडित रमानाथ ठाकुर जगमोहनसिंह द्वारा सन् १८८४ में लिखित तथा प्रकाशित पुस्तक ''सज्जनाश्टक'' के एक सज्जन थे। उनके मृत्यूपरांत उनके पुत्र श्री शिवगुलाम इस मंदिर के पुजारी हुए। फिर यह परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी इस मंदिर का पुजारी हुआ। इस परिवार के अंतिम पुजारी पंडित देवी महाराज थे जिन्होंने जीवित रहते इस मंदिर में पूजा-अर्चना की, बाद में उनके पुत्रों ने इस मंदिर का पुजारी बनना अस्वीकार कर दिया। सम्प्रति इस मंदिर में पंडित कार्तिक महाराज के पुत्र श्री सु शील दुबे पुजारी के रूप में कार्यरत हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सम्प्रति माखन साव के वं शजों ने मंदिर का जीर्णोद्धार करके मंदिर को आकर्शक बनवा लिया है। महाशिवरात्रि को इस मंदिर में पूजा-अर्चन और अभिशेक कराया जाता है। इसी प्रकार दोनों नवरात्र में शीतला माता के मंदिर में ज्योति कल श प्रज्वलित कराया जाता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-770721196012364780?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_5170.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-3759287546871174389</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:19:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:20:20.602-08:00</atom:updated><title>शबरी मंदिर</title><description>नगर की दक्षिण दिशा में शबरी देवी (सौराइन दाई) का मंदिर स्थित है। ईंट से बना यह मंदिर पूर्वाभिमुख है। लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर के शिलालेख में इसके निर्माण के काल का उल्लेख है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कारितं विस्तृतं शौरि मंडपं पुण्कारिणा।&lt;br /&gt;गंगाधरेण धरणे ललामेवाति सुन्दरम्।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात् गंगाधर नामक अमात्य ने एक शौरि मंडप का निर्माण कराकर पुण्य का कार्य किया है। शौरि वास्तव में विष्णु का एक नाम है और यह क्षेत्र भी विष्णु प्रतिमाओं के कारण श्री नारायण क्षेत्र या   श्री पुरूषोत्तम क्षेत्र कहलाता है, जिसका उल्लेख स्कंद पुराण में मिलता है। इस मंदिर के गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर गरूड़ जी की मूर्ति है। अत: इसके विष्णु मंदिर होने की कल्पना की जा सकती है। सम्प्रति यहां देवी की मूर्ति है। इस मंदिर में देवी की मूर्ति कब और किसने स्थापित की, यह पता नहीं चलता। संभवत: विष्णु और शक्ति में सामंजस्य स्थापित करने के लिए इस मंदिर में देवी की स्थापना की गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंदिर के सभा मंडप की दीवारों में खड़ी मूर्तियां है जिनमें अधिकांश भैरव जी की मूर्ति है। कंधे में धनुष लटकाये श्रीराम और लक्ष्मण की भी मूर्तियां यहां है। सिंदूर और चूने से पुताई कर देने से इसकी मौलिकता छिप गई है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक खंडित अर्द्धनारीश्वर की प्रतिमा उपेक्षित हैं। हालांकि नागरिकों की मांग पर केन्द्रीय पुरातत्व विभाग द्वारा दीवार से मंदिर को घेर दिया गया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-3759287546871174389?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_5308.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-5679988644453842294</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:19:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:19:46.499-08:00</atom:updated><title>जनकपुर के हनुमान</title><description>मेला मैदान के अंतिम छोर पर साधु-संतों के निवासार्थ एक मंदिर है। रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी यहीं आकर नौ दिन विश्राम करते हैं। इसीलिए इसे जनकपुर कहा जाता है। प्राचीन साहित्य में जिस सिंदूरगिरि का वर्णन मिलता है, वह यही है। इसे ''जोगीडिपा'' भी कहते हैं। क्योंकि यहां ''योगियों'' का वास था। महंत अर्जुनदास की प्रेरणा से भटगांव के जमींदार ने यहां पर योगियों के निवासार्थ भवन का निर्माण संवत् १९२७ में कराया। स्वामी अर्जुनदास की प्रेरणा से संवत् १९२८ में श्री बैजनाथ साव, चक्रधर, बोधराम और अभयराम ने यहां एक हनुमान जी की भव्य मूर्ति का निर्माण कराया। द्वार पर एक शिलालेख है जिसमें हनुमान मंदिर के निर्माण कराने का उल्लेख है। जनकपुर में एक बहुत सुंदर उपवन था जिसके निर्माण और देखरेख का कार्य महंत अर्जुनदास द्वारा कराया जाता था। बाद के महंतों ने भी इस परंपरा का निर्वहन किया। आज देखरेख के अभाव में यहां का भवन जर्जर हो गया है, बाउंड्री की दीवार धसक गयी है और बागीचा नश्ट हो गया है। साल में दो बार क्रम श: रथयात्रा और द शहरा में लोग यहां आते हैं, भोश दिनों में यहां कोई नहीं आता। लेकिन हनुमान जी का मंदिर अच्छी हालत में है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महंत अर्जुनदास को सिंदूरगिरि से बहुत लगाव था। वहां प्रतिदिन जाना उनकी दिनचर्या बन गया था। पंडित मालिकराम भोगहा उनके बारे में लिखते हैं-आपको हनुमान जी का बड़ा इश्ट (इष्ट) था और रामायण की कथा में सतत् अपनी अभिरूचि दिखाया करते थे। आपकी दिन और रात्रिचर्या इस प्रकार थी। चार बजे प्रात:काल प्रत्येक ऋतु में स्नानकर हनुमान जी की पूजा करना, अनन्तर आठ बजे दिन तक रामस्तवराज का पाठ विश्णु (विष्णु) महामंत्र के अनुष्ठान में पगे रहकर शुभकामना और वासना का संस्कार किया करते थे। अनन्तर शबरीनारायण के दर्शन को आते और अपने हाथ से सुन्दर सामयिक पत्र, पुष्प और फल-फूल आदि अर्पण कर चरणामृत ले श्रीरामचन्द्र जी के मंदिर आते थे। उसी तरह वहां भी दर्शन कर और साधुओं को दण्डवत प्रणाम कर जगन्नाथ जी के मंदिर की शोभा बढ़ाते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब इधर उनको मठ का काम यह देखना पडता था कि शबरीनारायण के मंदिर, रामचन्द्र जी के मंदिर और मठ के भंडार में क्या क्या सामान गया। जब-२ जिस-२ ऋतु में नई वस्तु कहीं से आती, बिना भगवान के भोग लगाये अपने मुख में डालना उन्हें वर्जित था। अनन्तर १० बजे के भीतर जोगीडीपा जिसे ``जनकपुर`` और सिंदूरगिरि भी कहते हैं जाया करते; वहां हनुमान जी का दर्श्शन (दर्शन) और वहां का उद्यान निरीक्षण कर १२ बजे लौटकर पंगति में शामिल हुवा करते थे। २ घंटा आराम कर फिर राम राम कहते रामायण की कथा सुनाते और चार बजे फिर वही जोगीडीपा और शौच स्नान कर संध्या के पहिले मठ में आ जाया करते थे। लंबी तुलसी की माला हाथ में लिये वासुदेव मंत्र को स्मरण करते शबरीनारायण की परिदक्षिणा कर भीतर दर्शन करने आते और ``जय राम रमा रमन शमन भवताप भयाकुल पाहि जनम्`` यह स्तोत्र पढ़ते-२ चंवर डुलाते और चरणामृत पानकर रामचन्द्र जी के मंदिर में आते। उसी तरह प्रणाम अभिवादन के अनंतर मठ में आ जगन्नाथ जी के तथा अन्य मूर्तियों के दर्शन कर अपने नित्य कर्म में प्रवृ&gt;श होते थे। यह चरित्र प्राय: उनके जीवनभर मैं देखता ही रहा। अब इन्हें सिद्ध कहें या देवता ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-5679988644453842294?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_418.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-4411659438842768006</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:18:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:19:02.147-08:00</atom:updated><title>खरौद के लखने वर</title><description>खरौद, चित्रोत्पला-गंगा महानदी के किनारे जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत जांजगीर जिला मुख्यालय से ५८ कि. मी., बिलासपुर जिला मुख्यालय से ६२ कि. मी. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से १२२ कि. मी.(व्हाया बलौदाबाजार) तथा संस्कारधानी शिवरीनारायण से मात्र २ कि. मी. की दूरी पर बसा एक धार्मिक नगर है। शैव परम्परा का मंदिर लक्ष्मणेश्वर शिवलिंग से स्पष्ट परिलक्षित होता है। यहां स्थित गिर गोस्वामियों का शैव मठ भी इसी का द्योतक है। जबकि शिवरीनारायण भगवान विष्णु की चतुर्भुजी प्रतिमा की अधिकता और रामानंदी वैष्णव मठ के कारण वैष्णव परम्परा का उदाहरण माना जाता है। शायद यही कारण है कि शिवरीनारायण और खरौद को क्रमश: विष्णुकांक्षी और शिवाकांक्षी कहा जाता है। इसकी तुलना उड़ीसा के जगन्नाथ पुरी के भगवान जगन्नाथ और भुवनेश्वर के लिंगराज से की जाती है। प्राचीन काल में जगन्नाथ पुरी जाने का रास्ता भी खरौद और शिवरीनारायण से होकर जाता था। यह भी मान्यता है कि प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा में एक दिन के लिए भगवान जगन्नाथ पुरी को छोड़कर शिवरीनारायण में विराजते हैं। यहां माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक बृहद मेला भरता है। दर्शनार्थियों की भीड़ इतनी अधिक होती है, कि कुंभ जैसा दृश्य उपस्थित हो जाता है। इसीलिए यहां के मेला को छत्तीसगढ़ का महाकुंभ भी कहा जाता है। यहां के इस मेले में छत्तीसगढ़ और उड़ीसा की सांस्कृतिक परम्पराओं का स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तम किस्म के फर्शी पत्थर को अपने गर्भ में समेटे खरौद का प्राचीन इतिहास शैव धर्म के वैशिष्ट्य को प्रदर्शित करता है। सामान्यत: छत्तीसगढ़ में शैव धर्म की प्राचीनता उसे प्रागैतिहासिक काल में ले जाती है। आज भी यहां शिव के पुरूष विग्रह की पूजा दूल्हादेव के  रूप में करते हैं। प्रदेश के कई क्षेत्रों में उसे बाबा या बड़ादेव भी कहते हैं। शिव के साथ शक्ति या ग्राम देवी के रूप में छत्तीसगढ़ के गांवों में इसके संहारक रूप की पूजा कंकालिन देवी, बंजारी देवी आदि के नाम से आज भी की जाती है। विद्वानों ने प्रागैतिहासिक काल के जो तथ्य प्रस्तुत किये हैं उसमें शिवलिंग की पूजा का विशेष महत्व बतलाया गया है। इसके लिए प्राय: पर्वतादिक स्थलों को चुना गया। ऐसे स्थलों में पाषाण खंड या चमत्कारपूर्ण दृश्य दिखाई दिये, जिसके कारण उनमें ईश्वर की सत्ता मानकर उनकी पूजा की जाने लगी। भगवान लक्ष्मणेश्वर महादेव के मंदिर में स्थित लक्ष्यलिंग इसी प्रकार के उन्नत भू भाग में स्थित एक स्वयंभू लिंग है। श्रद्धा का प्रतीक यह लिंग छत्तीसगढ़ वासियों के लिए काशी के समान फलदायी है। कल्याण के तीर्थांक में खरौद को एक तीर्थ के रूप में उल्लेखित किया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नगर के सभी प्रवेश मार्गों पर तालाब एवं भव्य मंदिरों का दर्शन सुलभ है। इसके चारों ओर प्राचीन दुर्ग और खाइयों के अवशेष आज भी दृष्टिगोचर होते हैं। वास्तव में यह ''मृि&gt;शऎशउश गढ़'' का अवशेष है, जो छत्तीसगढ़ में बहुतायत मात्रा में देखने को मिलता है। पश्चिम दिशा में भगवान लक्ष्मणेश्वर के डमरू का निनाद, पूर्व दिशा में शीतला माता का आधिपत्य, उत्तर दिशा में राम सागर, डघेरा (देवधरा) तालाब एवं राम भक्त हनुमान की कीर्ति पताका, दक्षिण दिशा में हरशंकर तालाब और शबरी देवी का कलात्मक मंदिर आगन्तुकों का स्वागत करता है। नगर के मध्य में इंदलदेव का कलात्मक मंदिर, शुकुलपारा में साधु-संतों का मठ और तिवारीपारा में कंकालिन देवी स्थित है।&lt;br /&gt;रामायण कालीन खरदूषण का नगर&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;प्राचीन काल में यह क्षेत्र दंडकारण्य कहलाता था। दंडकारण्य में श्रीराम लक्ष्मण और जानकी ने कई वर्श व्यतीत किये। इसी क्षेत्र से सीता का हरण हुआ था। श्रीराम और लक्ष्मण ने सीता की खोज के दौरान शबरी भीलनी के आश्रम में आकर उसके जूठे बेर खाये थे इसी प्रसंग को लेकर इस स्थान को शबरी-नारायण कहा गया। कालान्तर में यह बिगड़कर शिवरीनारायण कहलाने लगा। खरौद नगर के दक्षिण प्रवेश द्वार पर स्थित शौरि मंडप शबरी का ही मंदिर है। इस मंदिर में श्रीराम और लक्ष्मण की मूर्ति है। प्राचीन काल में इस क्षेत्र में खरदूषण का राज था, जो श्रीराम के हाथों वीरगति को प्राप्त हुआ था। कदाचित् उन्हीं के नाम पर यह नगर खरौद कहलाया। यहां के लक्ष्मणेश्वर लिंग को भी लक्ष्मण के द्वारा स्थापित माना जाता है। इस सम्बंध में एक किंवदंती प्रचलित है, जिसके अनुसार रावण वध के पश्चात् राम और लक्ष्मण के उपर ब्रह्म हत्या का आरोप लगाया गया था। ऋषियों द्वारा श्रीराम को रावण वध के पूर्व रामेश्वर लिंग की स्थापना कर पूजा-अर्चना करने के कारण ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त रखा गया। इसी के बाद लक्ष्मण शिवाभिषेक के लिए चारों दिशाओं में स्थित तीर्थ स्थलों-उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम्, पूर्व में जगन्नाथपुरी, पश्चिम में द्वारिकाधाम और मध्य में गुप्ततीर्थ शिवरीनारायण से पवित्र जल एकत्रित करके अयोध्या को लौट रहे थे, तभी खरौद क्षेत्र में उन्हें क्षय रोग हो गया और उनकी नाक से रक्त बहने लगा। इससे मुक्ति पाने के लिए उन्हें यहां पर महादेव जी की तपस्या करनी पड़ी। तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव जी उन्हें लक्ष्यलिंग के रूप में दर्शन देकर पार्थिव पूजन का आदेश दिया। इस पूजन से उन्हें इस क्षय रोग से मुक्ति मिली वहीं वे ब्रह्म हत्या के पाप से भी मुक्त हो गये। आज भी लक्ष्मणेश्वर दर्शन के सम्बंध में ''क्षय रोग निवारणाय लक्ष्मणेश्वर दर्शनम्'' की उक्ति प्रसिद्ध है। इस प्रकार यहां का लक्ष्यलिंग लक्ष्मण के नाम पर लक्ष्मणेश्वर प्रसिद्ध हुआ। आंचलिक कवि स्व. श्री तुलाराम गोपाल के शब्दों में-&lt;br /&gt;लाख लिंगधर लखलेश्वर शंकर शिव औघड़ दानी।&lt;br /&gt;निकले भू से शंभू हर हर महादेव वरदानी।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खरौद नामकरण के सम्बंध में लक्ष्मणेश्वर मंदिर के शिलालेख में ३० वें श्लोक में वर्णित है&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;आलोक्यानेन विद्यु-ललित रलत रासार तारूण्य लक्ष्मी।&lt;br /&gt;लक्ष्मीमप्येवमेवं चकितभगदृशां प्रीतिभप्यगंनानाम्।&lt;br /&gt;.... कामाय.....पुनरिह सुकृतै: दृष्ट संसुप्तबोधात् ।&lt;br /&gt;एतच्चक्रेनवीनं सहजशुभमति: मंडपं भूतभर्तु: ।।&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;इसके अनुसार महाराज खड्गदेव ने भूतभर्ता शिव के इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया, जो पहले केवल मंडप मात्र था। खड्गदेव शब्द में ''खड्ग'' का अपभ्रंश ''खरग'' तथा ''देव'' शब्द का अपभ्रंश 'औद' या ओद बना प्रतीत होता है। 'ग' वर्ण के लोप हो जाने तथा 'खर' और 'औद' के मिलने से ''खरौद'' शब्द बन जाता है। इस प्रकार इस ग्राम (अब नगर) का खरौद नाम खड्गदेव शब्द का बिगड़ा रूप हो सकता है।&lt;br /&gt;खरौद : एक सफर&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;शासकीय अभिलेखों के अनुसार खरौद नगर पांच ग्रामों का एक संघ हैं। खरौद नाम से कोई पृथक् ग्राम नहीं है। इस संघ में शुकुल ब्राह्मणों के नाम पर शुकुलपारा, तिवारी ब्राह्मणों के नाम पर तिवारीपारा, भदौरिया ब्राह्मणों के नाम पर भड़ेरिया पारा, मध्य में स्थित माझापारा और किसी अग्नि दुर्घटना के नाम पर जरहापारा स्थित है। चार मुहल्लों (ग्रामों) में मालगुजारी प्रथा रही है। यहां शुकुल परिवार ही पहले पूर्णाधिकारी था। बाद में उन्होंने तिवार परिवार को वैवाहिक सम्बंध के लिए और दुबे परिवार को पुरोहिती करने के लिए ससम्मान यहां बसाया था। आज खरौद नगर में जितने मुहल्ले हैं, वह पहले गांव बना, उनकी अपनी ग्राम पंचायतें थीं...बाद में सभी ग्राम पंचायतों को मिलाकर नगरपालिका बनाया गया।&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;प्राचीन काल में यह क्षेत्र दक्षिण कोसल कहलाता था। तब यहां कलचुरि हैहहवंशी राजा रत्नदेव प्रथम ने अपने राज्य की नींव डाली और रत्नपुर को अपनी राजधानी बनाया। उनके शासन काल में राज्य का खूब विस्तार हुआ। सुप्रसिद्ध साहित्यकार और पुरातत्वविद पंडित लोचनप्रसाद पाण्डेय के अनुसार दक्षिण कोसल की सीमा उत्तर में गंगा, दक्षिण में गोदावरी, पश्चिम में उज्जैन और पूर्व में पूर्वी समुद्री तट पाली (जिला-बालसौर, उड़ीसा) तक थी। महाभारत के वन पर्व में उज्जैन को दक्षिण कोसल की पश्चिमी सीमा बताया गया है।&lt;br /&gt;गोसहस्त्रं फलं विन्द्यात् कुलं चैव समुद्धरेत।&lt;br /&gt;कोसलां तुमसासाद्य, कालतीर्थ भुप स्पृशेत्।।&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;अपने विस्तृत राज्य की सुव्यवस्था के लिए कलचुरि राजाओं ने ८४-८४ गांवों का समूह बनाया जिसे ''चौरासी'' कहा गया। इसे ''गढ़'' और ''मंडल'' भी कहा जाता था। इसके प्रमुख को ''मंडलाधीश'' और ''दीवान'' कहा जाता था। इस प्रकार कलचुरि राजाओं ने ४८ गढ़ बनाये। जिनमें से शिवनाथ नदी के उत्तर में १८ गढ़ और दक्षिण में १८ गढ़ में राज परिवार के लोग मंडलाधीश थे, शेष में विश्वसनीय व्यक्ति को मंडलाधीश बनाया गया था। इस प्रकार यह क्षेत्र `'रतनपुर-छत्तीसगढ़'' कहलाने लगा। खरौद भी इन्ही में से एक गढ़ था। कदाचित् इसी कारण इसे ''खरौदराज'' कहा जाता था। खरौदगढ़ के मंडलाधीश के रूप में पंडित ज्वालाप्रसाद मिश्र का उल्लेख मिलता है। वे ''कोटगढ़'' के भी मंडलाधीश थे। यहां उनके परिवार के गोविंदराम मिश्र अपने दोनों पुत्र देवनाथ और शोभनाथ मिश्र के साथ रहते थे। सन १८३५ में सोनाखान के जमींदार नारायणसिंह ने इनके परिवार को समूल नष्ट करने का प्रयास किया। मगर अपने गर्भ में इस वंश के बीज को अपने गर्भ में लिए एक महिला किसी प्रकार बचकर कोटगढ़ आ गईं यहां इस परिवार के वंशज पले-बढ़े। जब नारायणसिंह को फांसी हो गई तो मिश्र परिवार सन १८६० में कसडोल में स्थायी रूप में रहने लगा। आज भी इनके वंशज कसडोल में निवास करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खरौद में आज भी लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर के उत्तर में प्राचीन गढ़ का अवशेष देखा जा सकता है। गढ़ का विस्तार इंदलदेव मंदिर तक था। यह क्षेत्र पहले न्याय क्षेत्र के रूप में विख्यात था। आज भी यहां ''कचहरी कुआं'' के नाम से एक स्थान है। उस समय की भाषा में कचहरी जाने को कमासदारी कहा जाता था। सन् १८६१ में जब बिलासपुर को जिला बनाया गया उस समय इस जिलान्तर्गत शिवरीनारायण, बिलासपुर और मुंगेली तहसीलें बनायी गयीं। इस प्रकार खरौद का न्यायालीन अधिकार स्वमेव शिवरीनारायण में स्थानान्तरित हो गया। इसी प्रकार नवागढ़ का न्यायालीन अधिकार मुंगेली आ गया। शिवरीनारायण में ठाकुर जगमोहनसिंह जैसे साहित्यकार तहसीलदार थे। उन्होंने यहां साहित्यिक साधना की और इसे साहित्यिक तीर्थ बना दिया। मेरा सौभाग्य है कि यह मेरी जन्म स्थली है। बाद में तहसील मुख्यालय सन १८९१ में जांजगीर स्थानान्तरित कर दिया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खरौद में आज भी रतनपुर की अनेक परम्पराएं देखने को मिलती हैं। जिस प्रकार रतनपुर में तालाबों की अधिकता थी उसी प्रकार खरौद में भी १२० तालाबों के अवशेष मिलते हैं। रतनपुर में महामाया देवी, भैरव बाबा और बूढ़ेश्वर महादेव का महात्म्य है, उसी प्रकार यहां भैरवनंद तालाब के तट पर भैरव बाबा, महिमामयी महामाया देवी, मणिकर्णिका देवी (मनिका देवी), शबरी देवी और लक्ष्मणेश्वर महादेव का महात्म्य समान रूप से पाया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन् १५४६ ई. के आस पास जब दिल्ली में जहांगीर का शासन था, उस काल में कल्याणसाय रतनपुर का शासक था। उस काल में लिखे गये ''जहांगीरनामा'' में उसका उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार ''जमाबंदी'' पुस्तक में उस काल की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। उसके अनुसार प्रत्येक गढ़ या चौरासी का प्रमुख ''दीवान'' कहलाता था। दीवान किसी भी जाति के हो सकते थे जिसे आगे चलकर लोग अपने नाम के साथ लिखने लगे। १२ गांवों के समूह को ''बारहों'' कहा जाता था और इसके मुखिया को ''दाऊ'' कहा जाता था। गांव के मुखिया को ''गौंटिया'' कहा जाता था। ये प्रशासनिक प्रमुख लगान वसूल करके राजकोष में जमा करते थे। इस दृष्टि से यहां का पूर्णाधिकारी गौंटिया श्री देवनारायण शुक्ल के पूर्वज थे। आज भी इनके वंशज श्री सुबोध शुक्ल अपनी व्यवहार कुशलता और समर्पण भावना के कारण यहां लोकप्रिय हैं। सन १७३२ में कलचुरि राजाओं का पतन हो गया और रतनपुर की राजगद्दी में मराठा शासकों का कब्जा हो गया। मराठा शासकों ने पूर्व नरेशों द्वारा स्थापित गढ़ों को ''परगना'' बना दिया और दीवान को कमाविसदार। इस प्रकार खरौद भी एक ''परगना'' बन गया। यह व्यवस्था सन् १८१८ तक बनी रही। बाद में केवल तीन परगना क्रमश: रत्नपुर, खरौद और नवागढ़ बनाकर शेष परगनों को इसमें मिला दिया गया। तब खरौद के अंतर्गत अकलतरा, खोखरा, नवागढ़, जांजगीर और किकिरदा के ४५९ गांव सम्मिलित थे। ब्रिटिश काल में  इसका श्रेय तहसील के रूप में जांजगीर को मिला और खरौद क्रमश: उपेक्षित होता चला गया।&lt;br /&gt;लक्ष्मणेश्वर महादेव&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह मंदिर नगर के प्रमुख देव के रूप में पश्चिम दिशा में पूर्वाभिमुख स्थित है। मंदिर में चारों ओर पत्थर की मजबूत दीवार है। इस दीवार के अंदर ११० फीट लंबा और ४८ फीट चौड़ा चबूतरा है जिसके ऊपर ४८ फीट ऊंचा और ३० फीट गोलाई लिए मंदिर स्थित है। मंदिर के अवलोकन से पता चलता है कि पहले इस चबूतरे में बृहदाकार मंदिर के निर्माण की योजना थी, क्योंकि इसके अधोभाग स्पष्टत: मंदिर की आकृति में निर्मित है। चबूतरे के ऊपरी भाग को परिक्रमा कहते हैं। पहले मंदिर का सभा मंडप के सामने के भाग में एक गड्ढा था जिसे पुजारियों ने मिट्टी डलवाकर उसमें सत्यनारायण मंडप, नंदी मंडप और भोगशाला का निर्माण करवा दिया था। इसी के एक भाग में मिश्र परिवार द्वारा श्रीकृष्ण मंदिर का निर्माण कराया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंदिर के मुख्य द्वार में प्रवेश करते ही सभा मंडप मिलता है। इसके दक्षिण तथा वाम भाग में एक-एक शिलालेख दीवार में लगा है। दक्षिण भाग का शिलालेख की भाषा अस्पष्ट है अत: इसे पढ़ा नहीं जा सकता। इस लेख का अनुवाद पूर्व में किया जा चुका है उसके अनुसार इस लेख में आठवीे शताब्दी के इंद्रबल तथा ईशानदेव नामक शासकों का उल्लेख हुआ है। डॉ. सुधाकर पाण्डेय ने इस शिलालेख को छठवीें शताब्दी का माना है। इसी प्रकार मंदिर के वाम भाग का शिलालेख संस्कृत भाषा में है। इसमें ४४ श्लोक है। चंद्रवंशी हैहयवंश में रत्नपुर के राजाओं का जन्म हुआ। इपके द्वारा अनेक मंदिर, मठ और तालाब आदि निर्मित कराने का उल्लेख इस शिलालेख में है। तद्नुसार रत्नदेव तृतीय की राल्हा और पद्मा नाम की दो रानियां थी। राल्हा से सम्प्रद और जीजाक नामक हुआ। पद्मा से सिंह तुल्य पराक्रमी पुत्र खड्गदेव हुए जो रत्नपुर के राजा भी हुए जिसने लक्ष्मणेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मूल मंदिर के प्रवेश द्वार के उभय पार्श्व में कलाकृति से सुसज्जित दो पाषाण स्तम्भ है। इनमें से एक स्तम्भ में रावण द्वारा कैलासोत्तालन तथा अर्द्धनारीश्वर के दृश्य खुदे हैं। इसी प्रकार दृसरे स्तम्भ में राम चरित्र से सम्बंधित दृश्य जैसे राम-सुग्रीव मित्रता, बाली का वध, शिव तांडव और सामान्य जीवन से सम्बंधित एक बालक के साथ स्त्री-पुरूष और दंडधरी पुरूष खुदे हैं। प्रवेश द्वार पर गंगाऱ्यमुना की मूर्ति स्थित है। मुर्तियों में मकर और कच्छप वाहन स्पष्ट दिखाई देता है। उनके पार्श्व में दो नारी प्रतिमा है। इसके नीचे प्रत्येक पार्श्व में द्वारपाल जय और विजय की मूर्ति है। महामहोपाध्याय गोपीनाथ राव द्वारा लिखित ''आक्नोग्राफी ऑफ इंडिया'' तथा आर. आर. मजुमदार की ''प्राचीन भारत'' में इस दृश्य का चित्रण मिलता है। किंवदंति है कि मंदिर के गर्भगृह में श्रीराम के अनुज लक्ष्मण के द्वारा स्थापित लक्ष्यलिंग स्थित है। इसे लखेश्वर और लखने वर महादेव भी कहा जाता है क्योंकि इसमें एक लाख लिंग है। इसमें एक पातालगामी लक्ष्य छिद्र है जिसमें जितना भी जल डाला जाय वह उसमें समाहित हो जाता है। इस लक्ष्य छिद्र के बारे में कहा जाता है कि मंदिर के बाहर स्थित कुंड से इसका सम्बंध है। इन छिद्रों में एक ऐसा छिद्र भी है जिसमें सदैव जल भरा रहता है। इसे ''अक्षय कुंड'' कहते हैं। स्वयंभू लक्ष्यलिंग के आस पास वर्तुल योन्याकार जलहरी बनी है। मंदिर के बाहर परिक्रमा में राजा खड्गदेव और उनकी रानी हाथ जोड़े स्थित हैं। प्रति वर्ष यहां महाशिवरात्रि में मेला लगता है। कदाचित् इसी कारण इस नगर को ''काशी'' के समान मान्यता है। कवि बटुसिंह चौहान इसकी महिमा का बखान करते हुये कहते हैं :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो जाये स्नान करि, महानदी गंग के तीर।&lt;br /&gt;लखनेश्वर दर्शन करि,कंचन होत शरीर।।&lt;br /&gt;सिंदूरगिरि के बीच में, लखनेश्वर भगवान।&lt;br /&gt;दर्शन तिनको जो करे, पावे परम पद धाम।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंडित मालिकराम भोगहा कृत ''श्री शबरीनारायण माहात्म्य'' के पांचवें अध्याय के ९५-९६ श्लोक में लक्ष्मण जी श्रीरामचंद्रजी से कहते हैं :- हे नाथ ! मेरी एक इच्छा है उसे आप पूरी करें तो बड़ी कृपा होगी। रावण को मारने के लिये हम अनेक प्रयोग किये। यह एक शेष है कि यहां ''लक्ष्मणेश्वर महादेव'' की स्थापना आप अपने हाथ कर देते तो उ&gt;शम होता :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रावण के वध हेतु करि चहे चलन रघुनाथ&lt;br /&gt;वीर लखन बोले भई मैं चलिहौं तुव साथ।।&lt;br /&gt;वह रावण के मारन कारन किये प्रयोग यथाविधि हम।&lt;br /&gt;सो अब इहां थापि लखनेश्वर करे जाइ वध दुश्ट अधम।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सुन श्रीरामचंद्रजी ने बड़े २ मुनियों को बुलवाकर शबरीनारायण के ईशान कोण में वेद विहित संस्कार कर लक्ष्मणेश्वर महादेव की स्थापना की :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सुनि रामचंद्रजी बड़े २ मुनि लिये बुलाय।&lt;br /&gt;लखनेश्वर ईशान कोण में वेद विहित थापे तहां जाय।। ९७ ।।&lt;br /&gt;....और अनंतर अपर लिंग रघुनाथ। थापना किये अपने हाथ।&lt;br /&gt;पाइके मुनिगण के आदेश। चले लक्ष्मण ले दूसर देश।।&lt;br /&gt;अर्थात् एक दूसरा लिंग श्रीरामचंद्रजी ने अपने नाम से अपने ही हाथ स्थापित किया, जो अब तक गर्भगृह के बाहर पूजित हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आंचलिक कवि श्री तुलाराम गोपाल ने अपनी पुस्तक ''शिवरीनारायण और सात देवालय'' में इस मंदिर की महिमा का बखान किया है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सदा आज की तिथि में आकर यहां जो मुझे गाये।&lt;br /&gt;लाख बेल के पत्र, लाख चावल जो मुझे चढ़ाये।।&lt;br /&gt;एवमस्तु! तेरे कृतित्वके क्रम को रखे जारी।&lt;br /&gt;दूर करूंगा उनके दुख, भय, क्लेश, शोक संसारी।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंदलदेव मंदिर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नगर के मध्य माझापारा में प्राचीन गढ़ी से लगा अत्यंत प्राचीन ईंट से बना पश्चिमाभिमुख मूर्ति विहीन लेकिन मूर्तिकला से सुसज्जित इंदलदेव का मंदिर है। इंदल शब्द इंद्र का अपभ्रंश हैं अत: इसे इंद्रदेव कहना अधिक उपयुक्त है। इंद्रदेव शब्द का उल्लेख एक राजा के रूप में लक्ष्मणेश्वर मंदिर के सभा मंडप की दक्षिण दीवार  पर लगे शिलालेख में मिलता है। इस मंदिर का पश्चिमाभिमुख होना आश्चर्य की बात है। २ कि. मी. की दूरी पर स्थित शिवरीनारायण में भी चंद्रचूड़ महादेव और केशवनारायण का मंदिर पश्चिमाभिमुख है। इस मंदिर के द्वार पर लक्ष्मणेश्वर मंदिर के प्रवेश द्वार की तरह गंगाऱ्यमुना की मूर्ति स्थित है। द्वार के उपरी भाग में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की प्रतिमा स्थित है। यह मंदिर केंद्रीय पुरातत्व संस्थान के अंतर्गत है। सुरक्षा की दृष्टि से विभाग द्वारा प्राचीर का निर्माण कराया गया है। यदि लक्ष्मणेश्वर मंदिर के  अपठ्य शिलालेख का अनुवाद हो जाये तो यहां की प्राचीनता की सही जानकारी मिल सकती है। यहां खुदाई में अनेक मूर्तियां मिली है। इसके अलावा भी यहां अनेक मंदिर है। शिवशक्ति मंदिर दुर्लभ पंचमुखी हनुमान और अष्टमुखी शिव से युक्त है। अत्यंत प्राचीन पुरातात्विक महत्व के मंदिरों और मूर्तियों के बावजूद यह नगर उपेक्षित हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-4411659438842768006?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_3221.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-5164889735763223204</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:17:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:18:11.917-08:00</atom:updated><title>मोक्षदायी चित्रोत्पलागंगा</title><description>मानव सभ्यता का उद्भव और संस्कृति का प्रारंभिक विकास नदी के किनारे ही हुआ है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में नदियों का विशेष महत्व है। भारतीय संस्कृति में ये जीवनदायिनी मां की तरह पूजनीय हैं। यहां सदियों से स्नान के समय पांच नदियों के नामों का उच्चारण तथा जल की महिमा का बखान स्वस्थ भारतीय परम्परा है। सभी नदियां भले ही अलग अलग नामों से प्रसिद्ध हैं लेकिन उन्हें गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, महानदी, ताप्ती, क्षिप्रानदी के समान पवित्र और मोक्षदायी मानी गयी है। कदाचित् इन्हीं नदियों के तट पर स्थित धार्मिक स्थल तीर्थ बन गये..। सूरदास भी गाते हैं :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हरि-हरि-हरि सुमिरन करौं।&lt;br /&gt;हरि चरनार विंद उर धरौं।&lt;br /&gt;हरि की कथा होई जब जहां,&lt;br /&gt;गंगा हू चलि आवै तहां।।&lt;br /&gt;जमुना सिंधु सरस्वति आवै,&lt;br /&gt;गोदावरी  विलंबन लावै।&lt;br /&gt;सब तीरथ की बासा तहां,&lt;br /&gt;सूर हरि कथा होवै जहां।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत की प्रमुख नदियों में महानदी भी एक है। इसे ''चित्रोत्पला-गंगा'' भी कहा जाता है। इसका उद्गम सिहावा की पहाड़ी में उत्पलेश्वर महादेव और अंतिम छोर में चित्रा-माहेश्वरी देवी स्थित हैं। कदाचित् इसी कारण महाभारत के भीष्म पर्व में चित्रोत्पला नदी को पुण्यदायिनी और पाप विनाशिनी कहकर स्तुति की गयी है :-&lt;br /&gt;उत्पलेशं सभासाद्या यीवच्चित्रा महेश्वरी।&lt;br /&gt;चित्रोत्पलेति कथिता सर्वपाप प्रणाशिनी।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोमेश्वरदेव के महुदा ताम्रपत्र में महानदी को चित्रोत्पला-गंगा कहा गया है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यस्पाधरोधस्तन चन्दनानां&lt;br /&gt;प्रक्षालनादवारि कवहार काले।&lt;br /&gt;चित्रोत्पला स्वर्णावती गता पि&lt;br /&gt;गंगोर्भि संसक्तभिवाविमाति।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महानदी के उद्गम स्थल को ''विंध्यपाद'' कहा जाता है। पुरूषोत्तम तत्व में चित्रोत्पला के अवतरण स्थल की ओर संकेत करते हुए उसे महापुण्या तथा सर्वपापहरा, शुभा आदि कहा गया है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नदीतम महापुण्या विन्ध्यपाद विनिर्गता:।&lt;br /&gt;चित्रोत्पलेति विख्यानां सर्व पापहरा शुभा।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महानदी को ''गंगा'' कहने के बारे में मान्यता है कि त्रेतायुग में श्रृंगी ऋषि का आश्रम सिहावा की पहाड़ी में था। वे अयोध्या में महाराजा दशरथ के निवेदन पर पुत्रेष्ठि यज्ञ कराकर लौटे थे। उनके कमंडल में यज्ञ में प्रयुक्त गंगा का पवित्र जल भरा था। समाधि से उठते समय कमंडल का अभिमंत्रित जल गिर पड़ा और बहकर महानदी के उद्गम में मिल गया। गंगाजल के मिलने से महानदी गंगा के समान पवित्र हो गयी। कौशलेन्द्र महाशिवगुप्त ययाति ने एक ताम्रपत्र में महानदी को चित्रोत्पला के नाम से संबोधित किया है :-&lt;br /&gt;चित्रोत्पला चरण चुम्बित चारूभूमो&lt;br /&gt;श्रीमान कलिंग विषयेतु ययातिषुर्याम्।&lt;br /&gt;ताम्रेचकार रचनां नृपतिर्ययाति&lt;br /&gt;श्री कौशलेन्द्र नामयूत प्रसिद्ध।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१७ वीं शताब्दी के महाकवि गोपाल ने भी महानदी को ''अति पुण्या चित्रोत्पला'' माना है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाप हरन नरसिंह कहि बेलपान गबरीस,&lt;br /&gt;अतिपुण्या चित्रोत्पला तट राजे सबरीस।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी प्रकार स्कंद पुराण में ''पुरूषोत्तम क्षेत्र'' की स्थिति को स्पष्ट करने के लिए महानदी को माध्यम बनाया गया है :-&lt;br /&gt;ऋषिकुल्या समासाद्या दक्षिणोदधिगामिनीम्।&lt;br /&gt;स्वर्णरेखा महानद्यो मध्ये देश: प्रतिष्ठित: ।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात् पुरूषोत्तम क्षेत्र स्वर्णरेखा से महानदी तक विस्तृत रूप से फैला है, उसके दक्षिण में ऋषिकुल्या नदी स्थित है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महानदी के सम्बंध में भीष्म पर्व में वर्णन है जिसमें कहा गया है कि भारतीय प्रजा चित्रोत्पला का जल पीती थी। अर्थात् महाभारत काल में महानदी के तट पर आर्यो का निवास था। रामायण काल में भी पूर्व इक्ष्वाकु वंश के नरेशों ने महानदी के तट पर अपना राज्य स्थापित किया था। मुचकुंद, दंडक, कल्माषपाद, भानुमंत आदि का शासन प्राचीन दक्षिण कोसल में था। डॉ. विष्णुसिंह ठाकुर लिखते हैं :- ''चित्रोत्पला शब्द में दो युग्म शब्द है-चित्रा और उत्पल। उत्पल का शाब्दिक अर्थ है- नीलकमल, और चित्रा गायत्री स्वरूपा महाशक्ति का नाम है। चित्रा को ऐश्वर्य की महादेवी भी कहा जाता है। राजिम क्षेत्र कमल या पदम क्षेत्र के रूप में विख्यात् है। राजिम को ''श्री संगम'' कहा जाता है। ''श्री'' का अर्थ ऐश्वर्य या महालक्ष्मी जिसका कमल आसन है। महानदी के तट पर ''श्रीसंगम'' राजिम में स्थित विष्णु भगवान का प्रतिरूप ''राजीवलोचन'' या राजीवनयन विराजमान हैं। राजीव का अर्थ भी कमल या उत्पल होता है। यहां स्थित ''कुलेश्वर महादेव'' उत्पलेश्वर कहलाते हैं। शब्द कल्पदुम के अनुसार महानदी के उद्गम को ''पद्मा'' कहा गया है- ''सा पद्मया विनिसृता राम पुराख्याग्रामात पश्चिम उत्तर दिग्गता।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मार्कण्डेय और वायु पुराण में महानदी को ''मंदवाहिनी'' कहा गया है और उसे शुक्तिमत पर्वत से निकली बताया गया है। लेकिन महानदी धमतरी जिलान्तर्गत सिहावा (नगरी) से निकलकर ९६५ कि. मी. की दूरी तय करके बंगाल की खाड़ी में गिरती है। यह नदी छत्तीसगढ़ और उड़ीसा की सबसे बड़ी नदी है। इस नदी के उपर गंगरेल और हीराकुंड बांध बनाया गया है। इन बांधों के पानी से लाखों हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है, साथ ही बुरला-संबलपुर में बिजली का उत्पादन भी होता है। महानदी के रेत में सोना मिलने का भी उल्लेख मिलता है। इस नदी में अस्थि विसर्जन भी होता है। गंगा के समान पवित्र होने के कारण महानदी के तट पर अनेक धार्मिक, सांस्कृतिक और ललित कला के केंद्र स्थित हैं। सिरपुर, राजिम, मल्हार, खरौद, शिवरीनारायण, चंद्रपुर और संबलपुर प्रमुख नगर हैं। सिरपुर में गंधेश्वर, रूद्री में रूद्रेश्वर, राजिम में राजीव लोचन और कुलेश्वर, मल्हार पातालेश्वर, खरौद में लक्ष्मणेश्वर, शिवरीनारायण में भगवान नारायण, चंद्रचूड़ महादेव, महेश्वर महादेव, अन्नपूर्णा देवी, लक्ष्मीनारायण, श्रीरामलक्ष्मणजानकी और जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का भव्य मंदिर है। गिरौदपुरी में गुरू घासीदास का पीठ और तुरतुरिया में लव कुश का जन्म स्थल बाल्मीकि आश्रम स्थित था। इसी प्रकार चंद्रपुर में मां चंद्रसेनी और संबलपुर में समलेश्वरी देवी का वर्चस्व है। इसी कारण छत्तीसगढ़ में इन्हें काशी और प्रयाग के समान पवित्र और मोक्षदायी माना गया है। शिवरीनारायण में भगवान नारायण के चरण को स्पर्श करता हुआ ''रोहिणी कुंड'' है जिसके दर्शन और जल का आचमन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। सुप्रसिद्ध प्राचीन साहित्यकार पंडित मालिकराम भोगहा इसकी महिमा गाते हैं :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोहिणि कुंडहि स्पर्श करि चित्रोत्पल जल न्हाय।&lt;br /&gt;योग भ्रष्ट योगी मुकति पावत पाप बहाय।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्राचीन कवि बटुकसिंह चौहान ने तो रोहिणी कुंड को ही एक धाम माना है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोहिणी कुंड एक धाम है, है अमृत का नीर,&lt;br /&gt;बंदरी से नारी भई, कंचन होत शरीर।&lt;br /&gt;जो कोई नर जाइके, दरशन करे वही धाम,&lt;br /&gt;बटुक सिंह दरशन करी, पाये पद निर्वाण।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतेन्दु युगीन रचनाकार पंडित हीराराम त्रिपाठी ''शिवरीनारायण महात्म्य'' में लिखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चित्रउतपला के निकट श्री नारायण धाम।&lt;br /&gt;बसत सन्त सज्जन सदा शिवरिनारायण ग्राम।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे पवित्र नगर शिवरीनारयण, जांजगीर-चाम्पा जिलान्तर्गत महानदी के तट पर स्थित है और ''गुप्तधाम'' के रूप में ''पांचवां धाम'' कहलाता है। इसे छत्तीसगढ़ का प्रयाग और जगन्नाथ पुरी कहा जाता है। माघ पूर्णिमा को प्रतिवर्ष यहां भगवान जगन्नाथ पधारते हैं। इस दिन महानदी स्नान कर उनका दर्शन मोक्षदायी होता है। इसी प्रकार राजिम में भगवान राजीव लोचन का दर्शन ''साक्षी गोपाल'' के रूप में किया जाता है। खरौद में भगवान लक्ष्मणेश्वर का दर्शन काशी के समान फलदायी होता है। इसी प्रकार चंद्रपुर की चंद्रसेनी और संबलपुर की समलेश्वरी देवी का दर्शन शक्ति दायक होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्राचीन काल में महानदी व्यापारिक संपर्क का एक माध्यम था। बिलासपुर और जांजगीर-चांपा जिले के अनेक ग्रामों में रोमन सम्राट सरवीरस, क्रोमोडस, औरेलियस और अन्टीनियस के शासन काल के सोने के सिक्के मिले हैं। इसी प्रकार महानदी सोना और हीरा प्राप्ति के लिए विख्यात् रही है। आज भी ''सोनाहारा'' जाति के लोग महानदी की रेत से सोना निकालते हैं। सोनपुर नगर का नामकरण सोना मिलने के कारण है। संबलपुर के हीराकुंड क्षेत्र में हीरा मिलने की बात स्वीकार की जाती है। वराहमिहिर की बृहद संहिता में कोसल में हीरा मिलने का उल्लेख है जो शिरीष के फूल के समान होते हैं :-''शिरीष कुसुमोपम च कोसलम्'' मिश्र के प्रख्यात् ज्योतिषी टालेमी ने कोसल के हीरों का उल्लेख किया है। रोम में महानदी के हीरों की ख्याति थी।.... तभी तो पंडित लोचनप्रसाद पाण्डेय छत्तीसगढ़ की वंदना करते हुए लिखते हैं :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महानदी बोहै जहां होवै धान बिसेस।&lt;br /&gt;जनमभूम सुन्दर हमर अय छत्तीसगढ़ देस।।&lt;br /&gt;अय छत्तीसगढ़ देस महाकोसल सुखरासी।&lt;br /&gt;राज रतनपुर जहां रहिस जस दूसर कासी।।&lt;br /&gt;सोना-हीरा के जहां मिलथे खूब खदान।&lt;br /&gt;हैहयवंसी भूप के वैभव सुजस महान।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महानदी से संस्कारित मेरी यह काया शिवरीनारायण और छत्तीसगढ़ का ऋणी है। आज भी मैं महानदी घाटी के ग्राम्यांचलों में चित्रित भित्ति चित्र को देखता हूं। कदाचित् महानदी छत्तीसगढ़ और उड़ीसा की सांस्कृतिक परम्परा को जोड़ने का एक माध्यम है। छत्तीसगढ़ शासन द्वारा राजिम और शिवरीनारायण को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का निर्णय लेकर उचित और स्वागतेय कदम उठाया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-5164889735763223204?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_1002.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-871561063491652361</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:17:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:17:31.608-08:00</atom:updated><title>महानदी में अस्थि विसर्जन</title><description>भारत की प्रमुख नदियों में महानदी भी एक है। इसे ''चित्रोत्पला-गंगा'' भी कहा जाता है। इसका उद्गम सिहावा की पहाड़ी में उत्पलेश्वर महादेव और अंतिम छोर में चित्रा-माहेश्वरी देवी स्थित हैं। कदाचित् इसी कारण महाभारत के भीष्म पर्व में चित्रोत्पला नदी को पुण्यदायिनी और पाप विनाशिनी कहकर स्तुति की गयी है :-&lt;br /&gt;                 &lt;br /&gt;उत्पलेशं सभासाद्या यीवच्चित्रा महेश्वरी।&lt;br /&gt;चित्रोत्पलेति कथिता सर्वपाप प्रणाशिनी।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महानदी के उद्गम स्थल को ''विंध्यपाद'' कहा जाता है। पुरूषोत्तम तत्व में चित्रोत्पला के अवतरण स्थल की ओर संकेत करते हुए उसे महापुण्या तथा सर्वपापहरा, शुभा आदि कहा गया है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नदीतम महापुण्या विन्ध्यपाद विनिर्गता:।&lt;br /&gt;चित्रोत्पलेति विख्यानां सर्व पापहरा शुभा।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महानदी को ''गंगा'' कहने के बारे में मान्यता है कि त्रेतायुग में श्रृंगी ऋषि का आश्रम सिहावा की पहाड़ी में था। वे अयोध्या में महाराजा दशरथ के निवेदन पर पुत्रेष्ठि यज्ञ कराकर लौटे थे। उनके कमंडल में यज्ञ में प्रयुक्त गंगा का पवित्र जल भरा था। समाधि से उठते समय कमंडल का अभिमंत्रित जल गिर पड़ा और बहकर महानदी के उद्गम में मिल गया। गंगाजल के मिलने से महानदी गंगा के समान पवित्र हो गयी। कौशलेन्द्र महाशिवगुप्त ययाति ने एक ताम्रपत्र में महानदी को चित्रोत्पला के नाम से संबोधित किया है :-&lt;br /&gt;चित्रोत्पला चरण चुम्बित चारूभूमो&lt;br /&gt;श्रीमान कलिंग विषयेतु ययातिषुर्याम्।&lt;br /&gt;ताम्रेचकार रचनां नृपतिर्ययाति&lt;br /&gt;श्री कौशलेन्द्र नामयूत प्रसिद्ध।।&lt;br /&gt;१७ वीं शताब्दी के महाकवि गोपाल ने भी महानदी को ''अति पुण्या चित्रोत्पला'' माना है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाप हरन नरसिंह कहि बेलपान गबरीस,&lt;br /&gt;अतिपुण्या चित्रोत्पला तट राजे सबरीस।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी प्रकार स्कंद पुराण में ''पुरूषोत्तम क्षेत्र'' की स्थिति को स्पष्ट करने के लिए महानदी को माध्यम बनाया गया है :-&lt;br /&gt;ऋषिकुल्या समासाद्या दक्षिणोदधिगामिनीम्।&lt;br /&gt;स्वर्णरेखा महानद्यो मध्ये देश: प्रतिष्ठित: ।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात् पुरूषोत्तम क्षेत्र स्वर्णरेखा से महानदी तक विस्तृत रूप से फैला है, उसके दक्षिण में ऋषिकुल्या नदी स्थित है।&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;यह नारायण क्षेत्र की महिमा अति अद्भूत&lt;br /&gt;सुनहि जे सादर पे्रमयुत, तिन्हन छुवै यमदूत।&lt;br /&gt;जे नारायण क्षेत्र में करै वास नर नारि&lt;br /&gt;जीवन्मुक्त सुधन्य वह होय प्रसन्न मुरारि।।&lt;br /&gt;भावार्थ&lt;br /&gt;यह नारायण क्षेत्र की महिमा परम अद्भूत है। जो कोई सादर इसे चि&gt;श देकर सुनेगा, उसको यमदूत कदापि छू नहीं सकेंगे। जो कोई स्त्री वा पुरूष इस नारायण क्षेत्र में वास करेेंगे, उन्हें जीवन्मुक्त और धन्य २ कहना चाहिये। ५/१११-११२।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहा गया है कि महानदी के जल का स्प र्श करके पितृ देवों का तर्पण करना चाहिए। ऐसा करने से उन्हें अक्षय लोकों की प्राप्ति होती है और उसके कुल का उद्धार हो जाता है। सुप्रसिद्ध कवि बुटु सिंह चौहान भी गाते हैं :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोहा       &lt;br /&gt;शिव गंगा के संगम में, कीन्ह अस पर वाह।&lt;br /&gt;पिण्ड दान वहां जो करे, तरो बैकुण्ठ जाय।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चौपाई&lt;br /&gt;वहां स्नान कर यह फल होई।&lt;br /&gt;विद्या वान गुणी नर सोई।।&lt;br /&gt;एक सौ पितरन वहां पर तारे।&lt;br /&gt;पितरन पिण्ड तहां नर पारै।।&lt;br /&gt;गाया समान ताही फल जानो।&lt;br /&gt;पितरन पिण्ड तहां तुम मानो।।&lt;br /&gt;मानो पितर गाया करि आवे।&lt;br /&gt;पितरन भूरि सबै फल पाये।।&lt;br /&gt;जो कोई जायके पिण्ड ढरकावहीं।&lt;br /&gt;ताकर पितर बैकुण्ठ सिधावहीं।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोहा &lt;br /&gt;क्वांर कृश्णो सुदि नौमि के, होत तहां स्नान।&lt;br /&gt;कोढ़िन को काया मिले, निर्धन को धनवान।।&lt;br /&gt;महानदी गंग के संगम में, जो किन्हे पिण्ड कर दान।&lt;br /&gt;सो जैहैं बैकुण्ठ को, कहीं बुटु सिंह चौहान।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिवरीनारायण में महानदी के तट पर स्थित माखन साव घाट और राम घाट में अस्थि विसर्जन के लिए कुंड बने हुए हैं। माखन साव घाट में रेत के नीचे दबे चट्टान में भी एक अस्थि विसर्जन के लिए कुंड है लेकिन यह कुंड रेत के हटने के बाद दृश्टिगोचर होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कदाचित यही कारण है कि यहां सज्जन व्यक्तियों का वास है जो सदा हरि कीर्तन में रत रहते हैं। भारतेन्दु कालीन कवि पंडित हीराराम त्रिपाठी भी गाते हैं :-&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;दोहा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चित्रउतपला के निकट श्रीनारायण धाम।।&lt;br /&gt;बसत सन्त सज्जन सदा शिवरीनारायणग्राम।। १ ।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवैया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होत सदा हरिनाम उच्चारण रामायण नित गान करैं।&lt;br /&gt;अति निर्मल गंगतरंग लखै उर आनंद के अनुराग भरैं।&lt;br /&gt;शबरी वरदायक नाथ विलोकत जन्म अपार के पाप हरैं।&lt;br /&gt;जहां जीव चारू बखान बसैं सहजे भवसिंधु अपार तरैं।। १ ।।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-871561063491652361?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_5225.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-8620851986053524608</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:16:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:17:01.999-08:00</atom:updated><title>महानदी के घाट</title><description>भारत में घाटों की नगरी के रूप में बनारस विख्यात् है। पवित्र और मोक्षदायी गंगा के तट पर बनारस नगर स्थित है। पूरे भारत के राजा, महाराजा और जमींदारों ने स्मृति चिन्ह के रूप में यहां घाटों का निर्माण कराया है। यहां के सभी घाटों का अपना महत्व है। उसी तर्ज में छत्तीसगढ़ की संस्कारधानी शिवरीनारायण में मोक्षदायी चित्रोत्पलागंगा के तट पर अनेक घाट बने हुए हैं। यह नगर अति प्राचीन है। सतयुग में यहां मतंग ऋशि का गुरूकुल आश्रम था और आगे चलकर भाबरी भी यहां कुटिया बनाकर रहने लगी। उनकी ई वर के प्रति सच्ची भक्ति को देखकर मतंग ऋशि ने बताया कि त्रेतायुग में श्रीरामचंद्र जी तुम्हें द र्शन देने यहां आवेंगे। उनके द र्शन से तुम्हारा न केवल उद्धार होगा बल्कि यह क्षेत्र तुम्हारे और ई वर के संयुक्त नाम से जग प्रसिद्ध होगा। त्रेतायुग में श्रीरामचंद्र जी यहां आते हैं और भाबरी का उद्धार करते हैं। तब से यह क्षेत्र ' शबरीनारायण' के रूप में जग प्रसिद्ध होता है। भाबरीनारायण माहात्म्य में भी उल्लेख है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुनिजन से आशीर्वाद पाकर श्रीयुत् राम और लक्ष्मण शिबरी के गृह गये। भक्ति परिपूर्ण शिवरी ने भ्राता सहित श्रीराम की पूजा और स्तुति करी और हर्ष से गद्गद होकर शाष्टांग नमस्कार कर बोली। आइये ! हे प्रलम्बबाहु राम ! मेरी दीन कुटी को पावन कीजिये। कमल लोचन श्रीराम ने भक्तिभाव देखके भिल्लिनी शिवरी को आतिथ्य अंगीकार कियो। पहुनाई कर वाके फल फूल ग्रहण किये और वाकी भक्ति से प्रसन्न होकर कह्यो कि हे शबरी ! वरदान मांग ।। शवरर्युवाच  ।। शबरी कहती भई। हे राम ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो एक वरदान हेतु याचना करती हूं, सो दीजिये। अर्थात् लोक में मेरे नाम सहित आपका नाम विख्यात् हो। शिवरीनारायण ऐसा नाम इस तीर्थ का होवे। नन्तर शिवरी ने कहा हे भूपाल ! अब मेरे अर्थ चिता रचिये। हे कमलनयन मेरे पंचात्मक देह को दग्धकर अब मैं आपके भवन में वास करूंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवान भाबरीनारायण के गुप्त वास के कारण यह गुप्त प्रयाग के रूप में जग प्रसिद्ध हुआ। यहीं भगवान भाबरीनारायण के चरण को स्प र्श करती हुई मोक्षदायी 'रोहिणी कुंड' है। चित्रोत्पला गंगा में अस्थि विसर्जन किया जाता है और ऐसी मान्यता है कि यहां अस्थि विसर्जन करने से मोक्ष मिलता है। कदाचित् इसी कारण यहां के लोगों ने यहां घाटों का निर्माण कराया है। यहां के घाटों में प्रमुख घाट निम्न लिखित है:-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१.माखन साव घाट २. बुटी साव घाट ३. कृपाराम साव घाट ४. बावा घाट ५. परभुवा घाट  ६. राम घाट ७. हनुमान घाट ८. गऊ घाट ९. भवानी बेड़ा घाट १०. जोगीडीपा घाट ११. डोंगा घाट १२. सोनी घाट १३. सिपाही घाट १४. रपटा घाट १५. भम शान घाट । इन घाटों का अपना महत्व है, इनका विवरण निम्नानुसार है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माखन साव घाट :- शिवरीनारायण के घाटों में यह घाट बहुत महत्वपूर्ण है। इस घाट में हसुवा के मालगुजार श्री माखन साव के पिता श्री मयाराम साव के द्वारा प्रतिश्ठित और माखन साव के द्वारा निर्मित भव्य महे वरनाथ और शीतला माता का मंदिर है। वं श का बढ़ाने वाले महे वरनाथ की कृपा न केवल माखन वं श को मिली बल्कि कटगी-बिलाईगढ़ के जमींदार के वं श को भी मिली है। सन् १८३८ में कटगी-बिलाईगढ़ के जमींदार श्री परानसिंह ने नावापारा गांव को इस मंदिर में चढ़ाया था। इस गांव की आमदनी से इस मंदिर में भोगराग, सावन में श्रावणी और महाशिवरात्रि में भव्य पूजा-अर्चना होता था। माखन साव ने मंदिर निर्माण के साथ पि चमी छोर पर घाट और ऊंची दीवार खड़ी करवाया। इस दीवार में तीन छिद्र बने हुए हैं जो महानदी में बाढ़ की स्थिति को बताते हैं। बाद में माखन वंश के मालगुजार श्री आत्माराम ने सन् १९२६ में अंग्रेज सरकार से अनुमति लेकर इस घाट का विस्तार किया और पूर्वी छोर पर ऊंची दीवार बनवायी। इस घाट में अस्थि विसर्जन के लिए कुंड, सती चौरा और समाधि चौरा बने हुए हैं। इस घाट में ग्राम रक्षक देव बरमबाबा की मूर्ति है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुटी साव घाट :- माखन साव घाट के पूर्व में बुटी साव घाट है। श्री पंचराम, श्री रामदयाल, श्री परसराम, श्री शिवरात्री, श्री मुकुंद साव के पूर्वजों ने इस घाट का निर्माण कराया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृपाराम साव घाट :- माखन साव घाट के पि चम में कृपाराम साव घाट है। श्री प्रयाग साव के पूर्वजों ने इस घाट का निर्माण कराया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बावा घाट :- कृपाराम साव घाट के पि चम में शिवरीनारायण मठ के महंत श्री लालदास ने साधु संतो ंके स्नान आदि के लिए बावा घाट का निर्माण कराया है। साधु संतों को छत्तीसगढ़ी में बावा कहा जाता है इसलिए इस घाट को बावा घाट कहा जाने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परभुवा घाट :- बावा घाट से लगा हुआ अधूरा परभुवा घाट है। परभुवा पारा के लोगों ने इस घाट का निर्माण कराने का संकल्प किया था लेकिन अंतिम समय में जन सहयोग नहीं मिलने के कारण यह घाट अधूरा रह गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रामघाट :- परभुवा घाट से लगा हुआ राम घाट है। श्रीराम भक्त केंवट समाज के द्वारा इस घाट का निर्माण कराया गया है। इस घाट में भी अस्थि विसर्जन कुंड है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हनुमान घाट :- रामघाट से लगा हुआ नवनिर्मित हनुमान घाट है। इस घाट का निर्माण नगर के श्री गणे शप्रसाद नारनोलिया ने अपने पिता श्री हनुमान प्रसाद की स्मृति में बनवाया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गऊ घाट :- हनुमान घाट के लगा हुआ गऊ घाट है। इस घाट में गायों द्वारा पानी पीने के कारण इस घाट का नाम गऊ घाट पड़ा। मेला के अवसर पर भाशसन द्वारा इसी घाट में पम्प के द्वारा पीने के पानी की व्यवस्था की जाती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भवानी बेड़ा :- गऊ घाट से लगा हुआ भवानी बेड़ा है। यहां पर एक बड़ा गड्ढ़ा है जहां से बाढ़ का पानी बस्ती में प्रवे श करता है। यहां पर पत्थर की ऊंची दीवार खड़ी की गयी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जोगीडीपा घाट :- बस्ती के पि चमी छोर में प्राचीन सिंदूरगिरि में महंत अर्जुनदास जी की प्रेरणा से भटगांव के जमींदार ने संवत् १९२७ में एक भव्य भवन बनवाकर सुंदर बगीचा लगवाया था। उनकी प्रेरणा से श्री बैजनाथ साव, श्री चक्रधर, श्री बोधराम और श्री अभयराम पांडेय ने संवत् १९२८ में यहां एक बजरंगबली का भव्य मंदिर बनवाया था जो आज भी सुरक्षित है। रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी यहां एक सप्ताह विश्राम करके विजयाद शमी को वापस मठ लौटते हैं। भगवान जगन्नाथ के यहां एक सप्ताह रूकने के कारण इसे 'जनकपुर' भी कहा जाता है। इस अवसर पर जन समुदाय यहां उनके द र्शन करने आता है। लोग आंवला नवमी के अवसर पर यहां भोज करने आते थे। द शहरा के दिन मठ से महंत जी अपने लावल कर के साथ यहां आज भी आते हैं और द्वार पूजन के बाद लौटकर गादी पूजा में बैठते हैं। महंत अर्जुनदास जी ने यहां महानदी के तट पर एक घाट बनवाया था जो जोगीडीपा बस्ती के कारण जोगीडीपा घाट नाम से जाना जाने लगा। महंत अर्जुनदास और महंत गौतमदास जी के जीवित रहते यहां की भाोभा द र्शनीय थी बाद में यहां के महंतों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया जिससे मंदिर का परकोटा गिरने लगा है और बगीचा पूरी तरह से खत्म हो चुका है। संवत् १९१५ में महंत अर्जुनदास जी को १२ गांव की मालगुजारी अंग्रेज डिप्टी कमि नर ने मंदिर की भोगराग के लिए दी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डोंगाघाट :- बुटीसाव घाट से लगा हुआ डोंगाघाट है। महानदी में नाव (डोंगा) इसी घाट से चलती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोनी घाट :- डोंगा घाट से लगा हुआ सोनी घाट है। इस घाट का निर्माण श्री हरिप्रसाद सोनी ने कराया है। बहुत दिनों तक नाव इसी घाट से चलाई जाती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिपाही घाट :- पुलिस थाना होने और सिपाहियों के नहाने के कारण इसे सिपाही घाट कहा जाने लगा। हालांकि यहां पर कोई पत्थर का घाट नहीं है। कुछ लोग इसे स्कूल घाट भी कहते हैं। क्योंकि स्कूल के विद्यार्थी इस घाट में आते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रपटा घाट :- महानदी में कच्चा पुल यानी रपटा लोक निर्माण विभाग के विश्राम गृह के पास बनाया जाता था। इसी कारण इसे रपटा घाट कहा जाता है। वर्तमान में इसी घाट से लगा हुआ भाबरी पुल बनाया गया है। यहां पर बजरंगबली और काली का भव्य मंदिर बनने से यहां पर लोग भाशम को घूमने आते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भम शान घाट :- बस्ती के पूर्वी छोर पर और रपटा घाट से लगा हुआ भम शान है। मृत भारीर के दाह संस्कार के कारण इस घाट को भम शान घाट कहा जाता है। साप्ताहिक मवे शी बाजार इसी अमराई में लगता है। यहां पर आम के पेड़ तो गिने चुने हैं लेकिन कृशि उपज मंडी अव य बन गया है। मथुआ मरार समाज का राधाकृश्ण मंदिर और बाढ़ नियंत्रण गृह भी यहीं पर बन गया है। इससे इस घाट का अस्तित्व समाप्त हो गया है और लोग मृत भारीर का दाह संस्कार भाबरी पुल के नीचे महानदी की रेत में करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महानदी में हमे शा बाढ़ आती है और बहुत नुकसान होता है। सन् १८८४ और १८८९ में बाढ़ से तहसील कार्यालय के कागजात महानदी में बह गये जिससे अंग्रेज सरकार द्वारा शिवरीनारायण को 'बाढ़ क्षेत्र' घोशित कर इस नगर को खाली करने का आदे श दे दिया था। लेकिन लोगों की जन आस्था के कारण बस्ती खाली नहीं हुई लेकिन तहसील कार्यालय सन् १८९१ में जांजगीर स्थानान्तरित अव य हो गया। लोग की मांग पर मध्यप्रदे श के तात्कालीन मुख्य मंत्री श्री अर्जुनसिंह ने यहां महानदी पर पुल बनाने और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री श्री विद्याचरण शुक्ल ने तटबंद के निर्माण की घोशणा की थी जो आज पूरा होने जा रही है। भाबरी सेतु के बन जाने से यह नगर अन्यान्य नगरों से बस मार्ग से जुड़ गया है और यहां के विकास का मार्ग खुल गया है। शिवरीनारायण को 'पर्यटन स्थल' के रूप में  विकसित करने की घोशणा हो चुकी है लेकिन यह केवल घोशणा ही न रह जाये बल्कि कार्य रूप में परिणत भी होना चाहिए। आज का शिवरीनारायण उन्नत व्यापारिक स्थल के रूप में विख्यात् है और यहां की लोक संस्कृति को समेटने-प्रचारित करने के लिए छत्तीसगढ़ भाशसन द्वारा 'शिवरीनारायण महोत्सव' का आयोजन एक सराहनीय प्रयास है लेकिन महोत्सव की कार्य प्रणाली से जिस बात की कल्पना की गयी थी वह संदिग्ध नजर आ रही है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-8620851986053524608?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_7948.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-7545403299288614183</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:15:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:16:16.962-08:00</atom:updated><title>महानदी के हीरे</title><description>महानदी, छत्तीसगढ़ प्रदेश एवं उड़ीसा की अधिकांश भूमि को सिंचित ही नहीं करती वरन् दोनों प्रदेशों की सांस्कृतिक परम्पराओं को जोड़ती भी है। आज भी छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक परम्पराएं सिहावा से लेकर महानदी के तट पर बसे  ऐतिहासिक और पौराणिक नगर सोनपुर, उड़ीसा तक मिलती है। यह भी सही है कि उड़ीसा और पूर्वी छत्तीसगढ़ का सीमांकन महानदी करती है और इसके तट पर बसे ग्रामों में सांस्कृतिक साम्य दिखाई देता है। सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में उड़िया स्ंशस्कृति की स्पष्ट छाप देखी जा सकती है। चाहे मेला मड़ई हो या रथयात्रा, उसमें उड़ीसा का उखरा प्रमुख रूप से मिलता है। इसी प्रकार जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा उड़ीसा का एक प्रमुख पर्व है जिसे छत्तीसगढ़ के अन्यान्य ग्रामों में सारंगढ़, रायगढ़, चंद्रपुर, सक्ती, रायपुर, राजिम, शिवरीनारायण, बिलासपुर और बस्तर में बड़े धूमधाम से आज भी मनाया जाता है। महानदी मे तट पर बसे सांस्कृतिक केंद्रों क्रमश: सिहावा, सिरपुर, राजिम, खरौद, शिवरीनारायण, चंद्रपुर, पुजारीपाली, संबलपुर और सोनपुर के अलावा आरंग, सरायपाली, बसना, सारंगढ़, रायगढ़, बालपुर और हसुवा आदि नगरों में एक साम्य है। छत्तीसगढ़ और उड़ीसा की सांस्कृतिक परम्परा को प्रदर्शित करने वाले भित्ति चित्र महानदी के तटीय अथवा पास में स्थित ग्रामों में आज भी देखने को मिलते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास साक्षी है कि उड़ीसा का संबलपुर सन् १९०५ तक छत्तीसगढ़ के अंतर्गत था। अक्टूबर सन् १९०५ में सम्बलपुर बंगाल प्रान्त में स्थानान्तरित किया गया। आगे जब उड़ीसा प्रांत बना तब सम्बलपुर उसमें सम्मिलित किया गया। इसी समय चन्द्रपुर-पदमपुर और मालखरौदा स्टैट तथा नौ गौंटियाई खालसा गांव छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिलान्तर्गत जांजगीर  तहसील में स्थानान्तरित किया गया। जब जिलों का पुनर्गठन किया गया तब सरसींवा खालसा और भटगांव, बिलाईगढ़-कटगी, लवन, सोनाखान जमींदारी को रायपुर जिला में स्थानान्तरित कर दिया गया।&lt;br /&gt;                 &lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ का नाम सुनते ही सोचा जाता है कि इस क्षेत्र में ३६ गढ़ या किले होंगे। वास्तव में ''गढ़'' शब्द का अर्थ होता है-प्रशासनिक भवन या किला। प्रसिद्ध संक्षेशभ के ताम्रपत्र के  ''अष्टादश अटवी राज्य'' से ऐसा संकेत मिलता है कि अट्ठारह राज्यों के समूह की परम्परा छठी शताब्दी से चली आ रही है। रतनपुर और रायपुर के १८-१८ गढ़ों के संयुक्त रूप के फलस्वरूप छत्तीसगढ़ बना है। लाला प्रदुम्न सिंह लिखते हैं कि प्राचीन काल में छत्तीसगढ़ विभाग में छत्तीस राजा राज्य करते थे, इसमें ३६ राजधानियां थी। प्रत्येक राजधानी में एक-एक गढ़ था। ३६ गढ़ होने के कारण इस भूभाग का नाम छत्तीसगढ़ पड़ा (लाला प्रदुम्न सिंह, नागवंश, पृ० २)।  चीजम साहब बहादुर ने ३६ गढ़ों की सूची दी है और हेविट साहब बहादुर ने तो अपनी सेटलमेंट रिपोर्ट में उन गढ़ों के नाम, ग्रामों की संख्या के साथ दिये हैं जो शिवनाथ नदी के उत्तर में रतनपुर राजधानी के अंतर्गत और दक्षिण में रायपुर राजधानी के अंतर्गत थे ( सी  यू  बिल्स : जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसायटी पृ० १९९, २१० )। छत्तीसगढ़ शब्द की उत्पत्ति के विषय में एक संदेह और होता है कि कहीं इस शब्द का सम्बंध इस प्रान्त में रहने वाली छत्तीस कुरियों से तो नहीं ? रतनपुर निवासी श्री गोपालचंद्र मिश्र कृत खूबतमाशा और श्री रेवाराम कृत ''विक्रमविलास'' में मिलता है--''बसे छत्तीस कुरी सब दिन के बसवासी सब सबके''। कवि रेवाराम ने विक्रमविलास में लिखा है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; बसत नगर सीमा की खानी, चारी बरन निज धर्म निदान&lt;br /&gt; और कुरी छत्तिस है तहां, रूप राशि गुन  पूरन महां ।      &lt;br /&gt;           &lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ के नरेशों ने ''त्रिकलिंगाधिपति'' और ''त्रिपुरीश'' आदि संख्या विरूद्ध शब्दों को सदबहुमान धारण किया था और इनका संकेत उनके ताम्रशासनों में भी मिलता है। इस आधार पर पंडित लोचनप्रसाद पाण्डेय ने यह तात्पर्य निकाला कि मध्ययुग में किसी राज्य की समर विजित शक्ति और महत्ता बतलाने के लिए उनका मान गढ़ों की संख्या से लगाया जाता था। जैसे बावनगढ़ मंडला, छत्तीसगढ़ रतनपुर आदि। उनका कथन है कि इस प्रान्त को ''छत्तीसगढ़-रतनपुर'' कहते थे। कालान्तर में रतनपुर शब्द का लोप हो गया और पूर्व विशेषण छत्तीसगढ़ राजा तथैव राज्य का अभिधान बन गया (हीरालाल : छत्तीसगढ़ी ग्रामर, प्रस्तावना पृ० ४)। संख्या-विरूद शब्दों का प्रयोग मध्यकाल में स्थान अथवा राज्य के महत्व को सूचित करने के लिए प्रचलित था। उदाहरणार्थ देखिये :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुर्ग अठारह अमित छवि सम्बलपुर परसिद्ध।&lt;br /&gt;गढ़ सत्रह कोउ ना आए नमक छोड़ी अकबर के भये।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अतिरिक्त देवार जाति के गाये जाने वाले गोपल्ला गीत में ऐसे और भी अभिधान हमें देखने को मिलते हैं :- अनलेख गढ़ चांदा, अस्सीगढ़ दुर्ग-धमधा, बावनगढ़ गढ़ा, बावनगढ़ मंडला, अठारहगढ़ रतनपुर, अठारहगढ़ रइपुर, सोरागढ़ नागपुर, सोरागढ़ बलौदा, सातगढ़ संजारी, सातगढ़ कोरिया, बयालिसगांव भटगांव, बारागांव पौंसरा, बाइस डंड उड़ियान, सोरा डंड सिरगुजा। (प्रहलाद दुबे कृत जयचन्द्रिका, हस्तलिखित)।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ और उड़ीसा में रियासतें ब्रिटिश शासन, जागीर, पिं्रस पैलेट्री आदि का प्रशासनिक स्तर पर उल्लेख मिलता है। विभिन्न जाति, वर्ग और देशी रियासतें छत्तीसगढ़ में भी थी, जैसे सोमवंशी, हैहयवंशी, वैष्णवपंथी महंत आदि। हैहयवंशी राजाओं का राज्य जबलपुर से संबलपुर तक था। इनकी पहली राजधानी जबलपुर के पास त्रिपुरी में थी, लेकिन आसफअली के अनुसार सन् १७५६ में हुए युद्ध में यह वंश समाप्त हो गया। इसके पूर्व आठवीें शताब्दी में इस वंश की एक शाखा रतनपुर आ गयी थी। इसके पूर्व यहां सोमवंशी राजाओं का शासन था, तब इस क्षेत्र को ''दक्षिण कोसल'' कहा जाता था। सोमवंशी राजाओं की राजधानी उड़ीसा के सोनपुर में थी। छत्तीसगढ़ को परिभाषित करते हुए रतनपुर के कवि श्री गोपाल मिश्र ने सन् १६८९ में लिखा है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ गाढ़े जहां बड़े गढ़ोई जानि&lt;br /&gt;सेवा स्वामिन को रहैं सकें ऐंड़ को मानि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१५० वर्ष बाद रतनपुर के बाबू रेवाराम कायस्थ ने अपने ''विक्रम विलास'' में ''छ&gt;शीसगढ़'' शब्द का प्रयोग किया है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तिनमें दक्षिण कोसल देसा, जहं हरि ओतु केसरी बेसा।&lt;br /&gt;तासु मध्य छि&gt;शास्गढ़ पावन, पुण्यभूमि सुर मुनि मन भावन।&lt;br /&gt;रत्नपुरी तिनमें है नायक, कासी सम सब विधि सुख दायक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत्‍तीसगढ़की चौदह देशी रियासतें अंग्रेजी और भोंसला राजाओं से संधि के फलस्वरूप एक निश्चित राशि बतौर नजराने ब्रिटिश कम्पनी को देती थी। इन देशी रियासतों में बस्तर, कांकेर, सारंगढ़, रायगढ़, सक्ती, उदयपुर, जशपुर, सरगुजा, कोरिया, चांगभखार, खैरागढ़, छुईखदान, राजनांदगांव, कवर्धा, प्रमुख थे। इन देशी रियासतों में बंगाल के छोटा नागपुर क्षेत्र से पांच रियासत क्रमश: सरगुजा, उदयपुर, जशपुर, कोरिया और चांगभखार को जहां छत्तीसगढ़ में मिलाया गया, वहां छत्तीसगढ़ की पांच रियासतें क्रमश: कालाहांडी, संबलपुर, पटना, बालांगीर और खरियार उड़ीसा में मिला दी गयीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास : ईसा पूर्व से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ के साहित्यकार और पुरातत्वविद् पंडित लोचनप्रसाद पाण्डेय ''श्री विष्णु यज्ञ स्मारक ग्रंथ'' में लिखते हैं :- ''प्राचीन साहित्य के द्वारा कोसल देश पर जो प्रकाश पड़ता है उसके अनुसार उसका इतिहास ७०० ईसा पूर्व का है। ''महावैयाकरण पाणिनी ने अपने व्याकरण में कलिंग और कोसल सम्बंधी सूत्र लिखे हैं। अनेक भाष्यकारों का मत है कि ''कोसल'' शब्द का प्रयोग यहां पर ''दक्षिण कोसल'' के लिए किया गया है। ईसा पूर्व ३०० की ब्राह्मी लिपि में लिखित दो ताम्र मुद्राएं लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में संग्रहीत हैं। इस  पर कोसल चेदि की राजधानी ''त्रिपुरी'' नाम अंकित है। साथ ही स्वस्ति सहित सरित और शैल के तीन चिन्ह बने हैं, मानो यह तीन राज्य कोसल, मैकल और चेदि के द्योतक हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्हेनसांग की यात्रा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रयाग (इलाहाबाद) के किले  में स्थित स्तम्भ में जो उत्कीर्ण लेख है उसमें कोसल का उल्लेख है। उसमें यह भी बताया गया है कि कोसल दक्षिणपथ के राज्यों में से एक है। प्रसिद्ध चीनी यात्री व्हेनसांग ने सन ६१९ में दक्षिण कोसल की यात्रा की थी। उसने इसकी सीमाओं के बारे में जो बातें लिखीं हैं वे यथार्थ के बहुत करीब जान पड़ती है उसके अनुसार दक्षिण का विस्तार लगभग दो हजार मील के वृत्त में था। इसके मध्य में रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, रायगढ़ और सम्बलपुर जिले का अधिेकांश भाग आता था। उत्तर में इसकी सीमा अमरकंटक को पार कर गई थी। अमरकंटक जो नर्मदा नदी का उद्गम स्थान है, मैकल पहाड़ की श्रेणियों के अंतर्गत आता है। रायपुर, रायगढ़ और सरगुजा जिलों की ईशान कोण में फैली हुई ये श्रेणियां उसकी सीमा बनाती है। पि चम भाग में इसकी सीमा दुर्ग और रायपुर जिलों के शेष भाग को समेटती हुई सिहावा तक चली जाती है और बैनगंगा को पार कर बराबर की सीमा को छूने लगती है। दक्षिण में इसका विस्तार बस्तर तक था, जबकि यह पूर्व में महानदी की उ&gt;शरी घाटियों को समावेशित करती हुई सोनपुर तक चली गयी थी, जिससे पटना, बामड़ा, कालाहांडी आदि भी इसके अंतर्गत आ जाते थे जहां से सोमवंशी राजाओं की प्रशस्तियां प्राप्त हुई हैं। पंडित लोचनप्रसाद पाण्डेय के अनुसार दक्षिण कोसल की सीमा इस प्रकार थी-उत्तर में गंगा, दक्षिण में गोदावरी, पश्चिम में उज्जैन और पूर्व में समुद्र के तट पर स्थित पाली (उड़ीसा)। उज्जैन को दक्षिण कोसल के पश्चिम में बताने वाला महाभारत के वन पर्व का श्लोक इस प्रकार है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोसहस्र फलं विंद्यात् कुलंचैव समुद्धरेत्।&lt;br /&gt;कोसलां तुसमासाद्य कालतीर्थमुप स्पृशेत्।। ( अध्याय ८४, वन पर्व )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां हीरे मिलते थे&lt;br /&gt;श्री प्यारेलाल गुप्त द्वारा लिखित ''प्राचीन छ&gt;शीसगढ़'' के अनुसार गिल्बन नामक एक अंग्रेज लेखक ने लिखा है कि संबलपुर के निकट हीराकूट नामक एक छोटा सा द्वीप है जहां हीरा मिलता है। इन हीरों की रोम में बड़ी खपत थी। उनके लेख से सिद्ध होता है कि कोसल का व्यापार रोम से था और रोम के सिक्के जो महानदी की रेत में पाये गये हैं, इसके प्रमाण हैं। व्हेनसांग ने भी लिखा है कि मध्यप्रदेश से हीरा लेकर लोग कलिंग में बेचा करते थे। यह महानदी के तट पर स्थित कोसल देशान्तर्गत संबक या संबलपुर छोड़ दूसरा नगर नहीं है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सांस्कृतिक परम्परा के द्योतक भित्ति चित्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महानदी के तटवर्ती ग्राम्यांचलों में घरों की दीवारों में छत्‍तीसगढ़और उड़ीसा की साक्षी लोक परम्परा के भित्ति चित्र मिलते हैं। सन १९८५ में महानदी के तटवर्ती ग्राम बालपुर में सर्वप्रथम पत्रकार    श्री सतीश जायसवाल ने लोक चित्रांकन की  इस शैली की पहचान की। उन्होंने बताया कि इस भित्ति चित्र में श्रीकृष्ण चरित्र, जगन्नाथ चरित्र, और रामायण के प्रसंग प्रमुख रूप से होते हैं। इनमें गणेश, लक्ष्मी, राधाकृष्ण, राम लक्ष्मण जानकी और हनुमान, राम का वनगमन, स्वर्ण मृग, शेर, धनुर्धर शिकारी के अलावा मछली, मोर का जोड़ा आदि मिलता है। इनके रंग संयोजन भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के रंगों से मिलते हैं, इनका रंग हल्का होता है क्योंकि इसमें प्रयुक्त होने वाले नैसर्गिक रंग वृक्षों की छाल, वनस्पति,कोयला और पत्थर के चूर्ण आदि से तैयार किये जाते हैं। इन भित्ति चित्रों को बनाने वाले लोक कलाकार निषाद-केंवट, धीवर, मछुवारे अथवा शबर जाति के भाट होते हैं। इन्हें बिरतिया भी कहा जाता है।&lt;br /&gt;           &lt;br /&gt;मैंने इन भित्ति चित्रों को अपने पैत्रिक गांव हसुवा में देखा। हसुवा ग्राम पहले जगन्नाथ मंदिर पुरी में चढ़ा ग्राम था जिसे हमारे पूर्वज श्री धीरसाय साव ने अपने पुत्रों मयाराम, मनसाराम और सरधाराम के नाम से खरीदा था। यहां इन भित्ति चित्रों को देखकर मेरी उत्सुकता बढ़ी और मैंने यहां के सरपंच      श्री गोरेलाल केशरवानी से इसकी जानकारी चाही। उन्होंने मुझे बताया कि इन भिि&gt;श चित्रों को बनाने वाले भाट उड़ीसा प्रांत से आते हैं। ये लोग प्रतिवर्ष कार्तिक और जेठ मास के बीच आते हैं, घरों की दीवारों में चित्र बनाते हैं और उड़िया में कोई गीत गाते हैं। बदले में चावल लेते हैं। आजकल पैसे भी लेते हैं। ये चित्र साल भर दीवारों में बने होते हैं। इन लोक चित्रकार में निषाद यजमान मुख्य रूप से महानदी के तटवर्ती ग्राम्यांचलों में रहते हैं। इसलिए भिि&gt;श चित्रांकन की यह लोक परम्परा महानदी के तटवर्ती ग्रामों में अधिक दिखती है। लेकिन मध्य उड़ीसा के कृषि प्रधान गांवों में यह लोक चित्रांकन की परम्परा अनुष्ठानिक हो जाती है। यहां की गृहस्थ और अविवाहित युवतियां दशहरा के दिन से अपने अपने घरों में भिि&gt;श चित्र बनाती हैं। भिि&gt;श चित्रांकन की यह परम्परा कृषि आधारित समृद्धि ग्रामीण समाज में एक शुद्ध लोककला के रूप में पोषित हुई दिखती है। महानदी से सिंचित कृषि ग्रामों में इनके भिि&gt;श चित्रों की बहुलता होती है। लेकिन जैसे जैसे महानदी के तट से दूर होते हैं या सूखाग्रस्त इलाके की ओर बढ़ते हैं, ये भिि&gt;श चित्र कम होने लगते हैं। इसी प्रकार सड़क के भीतर की ओर बसे हुए गांवों में तो ये भिि&gt;श चित्र खूब देखने को मिलते हैं, लेकिन जैसे जैसे सड़क की ओर आते हैं ये कम होते जाते हैं। भिि&gt;श चित्रांकन की महानदी घाटी की यह लोक परम्परा कितनी पुरानी है तथा इसके विकास का क्रम क्या रहा है, इसकी प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साझी संस्कृति का अद्भुत समन्वय&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महानदी के तटवर्ती ग्रामों में हिन्दी, छ&gt;शीसगढ़ी और उड़िया भाषा का अद्भूत समन्वय देखने को मिलता है। एक सर्वेक्षण दल ने महानदी के किनारे बसे पूर्वी छत्‍तीसगढ़और पश्चिम उड़ीसा दक्षिण में भटली से लेकर उ&gt;शर में ओंगना तक लगभग २०० कि. मी. तक का सर्वेक्षण दल ने दौरा किया। इस दल में डॉ. ब्रजभूषणसिंह 'आदर्श', सतीश जायसवाल, सरजू मिश्रा, प्रो. भूपेन्द्र पटेल, बनवारीलाल देवांगन, रवीन्द्र कंचन और सुश्री शैलजा ठाकुर आदि थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्वेक्षण दल के सदस्य प्रो. भूपेन्द्र पटेल के अनुसार वनों और पहाड़ों के बीच बसा एक छोटा सा गांव ओंगना प्रागैतिहासिक शैलचित्रों के कारण आज पुरावे&gt;शाओं की दुनिया में महत्व और ख्याति पा गया है। पहाड़ी चट्टानों पर गैरिक रेखाओं से बने इन शैलचित्रों को देखने के लिए देशी और विदेशी पर्यटक यहां आते हैं। पर इनमें से बहुत कम लोग शैलचित्रों और अर्थो को समझतें हैं। पर्यटकों को कोई बताता भी नहीं कि इस ओंगना ग्राम में समसामयिक जन जीवन भी विद्यमान है, इनकी लोक परम्पराएं जीवित है। यहां उड़िया मूल के ''कोलता'' कृषक रहते हैं। इन कोलता कृषकों को मध्यप्रदेश और छत्‍तीसगढ़में सामाजिक ओैर शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग में शामिल कर लिया गया है।&lt;br /&gt;           &lt;br /&gt;उड़ीसा राज्य के गठन के पूर्व उदयपुर की आदिवासी रियासत तत्कालीन मध्य प्रांत बरार के अंतर्गत संबलपुर थी। धरमजयगढ़ उसका मुख्यालय था। उड़ीसा राज्य के बनते ही संबलपुर तो मध्य प्रांत-बरार से अलग होकर इस नये प्रांत में सम्मिलित हो गया। लेकिन यह आदिवासी रियासत तत्कालीन मध्य प्रदेश में सम्मिलित कर ली गयी। इसके साथ ही ओंगना ग्राम भी तत्कालीन मध्य प्रदेश और वर्तमान छत्‍तीसगढ़में आ गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कीर्तन और साड़ी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओंगना में बसे उड़िया मूल के कोलता कृषक संबलपुरी रेशमी साड़ी बुनने के उन्नत पारंपरिक हस्तकौशल में निष्णात होने के साथ साथ उड़िया कीर्तन रामायण की कला परंपरा से सम्पन्न हैं। संबलपुरी साड़ी को बुनने में बहुत खर्च आता है। उसको बिक्री के लिए संबलपुर तक ले जाना श्रमसाध्य और कठिन है। अत: धीरे धीरे यह उन्नत कौशल लुप्त होता जा रहा है। लेकिन कीर्तन और रामायण कला परंपरा के अवशेष जरूर बचे हैं। इन्हें बचाने की आवश्यकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजा नरेशचंद्र स्मृति संस्थान&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत्‍तीसगढ़की पूर्वी सीमा पर उड़ीसा से लगा एक प्रमुख गढ़ तथा वर्तमान में रायगढ़ जिले का एक प्रमुख तहसील मुख्यालय सारंगढ़ है। यहां छ&gt;शीसगढ़ी और उड़िया संस्कृति का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। चाहे रथ यात्रा पर्व हो या दशहरा, दोनों की साझी सांस्कृतिक परम्परा का समन्वय पर्व होता है और इन्हें जोड़ने का कार्य राजा नरेशचंद्र सिंह स्मृति संस्थान सारंगढ़ कर रहा है। राज परिवार के युवा चिकित्सक दम्पति मेनका-परिवेश मिश्र इस संस्थान के माध्यम से इस अंचल की मिश्रित साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को समेटने-सहेजने और प्रोत्साहित करने में संलग्न हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले वर्ष चंद्रपुर जमींदारी के अंतर्गत महानदी के तट पर बसे ग्राम बालपुर में छायावाद के प्रवर्तक पंडित मुकुटधर पांडेय की जयंती पर एक त्रिदिवसीय लोक शिविर का आयोजन किया गया। इस लोक शिविर में एक मत से छ&gt;शीसगढ़ी और उड़िया भाषी सांस्कृतिक परंपरा को सहेजने-समेटने तथा सांस्कृतिक पुनर्सीमांकन की बात कही। इसके लिए महानदी को माध्यम बनाया जा सकता है। कहना न होगा कि बालपुर का पाण्डेय परिवार साहित्यिक गतिविधियों से पूरी तरह से जुड़ा हुआ है। पुरातत्वविद् और सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित लोचनप्रसाद पाण्डेय कई भाषाओं के साथ उड़िया भाषा के भी ज्ञाता थे। उन्होंने इन भाषाओं में कई पुस्तकें लिखी हैं। अत: बालपुर को भी उड़िया भाषी और हिन्दी भाषी लोगों का संधि स्थल कहा जा सकता है क्यों कि उनके काव्यों में उड़िया और छ&gt;शीसगढ़ी संस्कृति का स्पष्ट प्रभाव देखने को मिलता हैं पूर्वी छत्‍तीसगढ़और पश्चिमी उड़ीसा के बीच सांस्कृतिक और सामाजिक परम्पराओं में व्याप्त एकरूपता इनका प्रमुख आधार है। पंडित मुकुटधर पांण्डेय ने भी लिखा है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किंशुक कानन आवेष्ठित वह महानदी तट-देश।&lt;br /&gt;सरस इक्षु के दंड, धान की नवमंजरी विशेष।।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-7545403299288614183?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_451.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-963603624854738913</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:13:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:15:26.591-08:00</atom:updated><title>शिवरीनारायण की कहानी और उसी की जुबानी</title><description>शबरीनारायण, जी हां ! लोग मुझे इसी नाम से जानते हैं। लोग मेरे नाम का विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि जहां शबरी जैसी मीठे बेर चुनने वाली भीलनी और साक्षात् भगवान नारायण का वास हो, उस पतित पावन स्थान को ही शबरीनारायण कहते हैं। मेरी पवित्रता में चार चांद लगाती हुई चित्रोत्पला-गंगा (महानदी) बहती है। हालांकि वह गंगा के समान पवित्रता को समेटे हुए है। इसी महानता के कारण उसे महानदी कहते हैं। इससे मेरा मान बढ़ा है। कवि श्री धनसाय विदेह के मुख से :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धन्य धन्य शबरीनारायण महानदी के तीर।&lt;br /&gt;जहां कभी पद कमल धरे थे रामलखन दो वीर।।&lt;br /&gt;धन्य यहां की वसुन्धरा, धन्य यहां की धूल।&lt;br /&gt;धन्य सहां की शबरीनारायण का दर्शन सुखमूल।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महानदी की पवित्रता से इंकार कैसा ? लेकिन उसकी धार के साथ आ रही रेती से नदी उथली होती जा रही है, दोनों तट पर मिट्टी के कटाव बढ़ने से नदी का पार चौड़ा होता जा रहा है और थोड़ी बरसात हुई नहीं कि पानी बस्ती के भीतर। एक बार, दो बार नहीं बल्कि कई बार महानदी में आई बाढ़ से प्रलय जैसा दृश्य उपस्थित होता रहा है और ठाकुर जगमोहनसिंह जैसे कवि की लेखनी चलने लगती है:-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शबरीनारायण सुमिर भाखौ चरित रसाल।&lt;br /&gt;महानदी बूड़ो बड़ो जेठ भयो विकराल।।&lt;br /&gt;अस न भयो आगे कबहुं भाखै बूढ़े लोग।&lt;br /&gt;जैसी वारिद वारि भरि ग्राम दियो करि सोग।।&lt;br /&gt;शिव के जटा बिहारिनी बड़ी सिहावा आय।&lt;br /&gt;गिरि कंदर मंदर सबै टोरि फोरि जल जाय।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन १८६१ में जब बिलासपुर जिला बना तब बिलासपुर के अलावा दो अन्य तहसील क्रमश: शबरीनारायण और मुंगेली बनाया गया। इसके पूर्व न्यायालयीन कार्य क्रमश: खरौद और नवागढ़ में होता था। अंग्रेजों ने तब यहां पुलिस थाना, प्राइमरी स्कूल आदि खुलवाया था। तब मैं भोगहापारा और महंतपारा में बटा था। तहसील कार्यालय पंडित यदुनाथ भोगहा के भवन में लगता था। भोगहा जी, महंत अर्जुनदास और माखन साव यहां आनरेरी बेंच मजिस्टे्रट थे। महंत अर्जुनदास के बाद महंत गौतम दास और माखन साव के बाद खेदूराम साव यहां के आनरेरी मजिस्ट्रेट नियुक्त हुये थे। विजयराघवगढ़ के राजकुमार ठाकुर जगमोहनसिंह यहां के तहसीलदार थे। वे सुप्रसिद्ध साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चंद्र के सहपाठी थे। ठाकुर साहब ने न केवल इस क्षेत्र के नदी-नालों, अमराई, वन पर्वतादिक को घूमा बल्कि उन्हें अपनी रचनाओं में समेटा भी है। इसके अलावा वे यहां के बिखरे साहित्यकारों को एक सूत्र में पिरोकर उन्हें लेखन की दिशा प्रदान की और इसे सांस्कृतिक के साथ ही साहित्यिक तीर्थ की मान्यता दिलायी। उस समय पंडित अनंतराम पाण्डेय (रायगढ़), पंडित पुरूषोत्तम प्रसाद पाण्डेय (बालपुर), पंडित मेदिनी प्रसाद पाण्डेय (परसापाली), वेदनाथ शर्मा (बलौदा), ज्वालाप्रसाद तिवारी (बिलाईगढ़), काव्योपाध्याय हीरालाल (धमतरी) आदि यहां काव्य साधना के लिए आया करते थे। यहां भी पंडित मालिकराम भोगहा, पंडित हीराराम त्रिपाठी, गोविन्द साव और पंडित शुकलाल पाण्डेय जैसे उच्च कोटि के साहित्यकार हुए। कुथुर के      श्री बटुकसिंह चौहान और तुलसी के जन्मांध कवि नरसिंहदास वैष्णव ने इसे अपनी साधना स्थली बनायी। प्राचीन साहित्य में यह उल्लेख मिलता है कि ठाकुर जगमोहन सिंह ने यहां काशी के ''भारतेन्दु मंडल`` की तर्ज में ``जगमोहन मंडल'' की स्थापना की थी । वे यहां सन् १८८२ से १८८७ तक रहे और लगभग एक दर्जन पुस्तकें लिखकर प्रकाशित करायी। कुछ पुस्तकें अधूरी थी जिसे वे कूचविहार स्टेट में रहकर पूरा किया था। पंडित मुकुटधर पाण्डेय ने भी एक जगह लिखा है कि ``मेरे पूज्याग्रज श्री पुरूषोत्तम पाण्डेय नाव की सवारी से शबरीनारायण जाया करते थे। वहां के पंडित मालिकराम भोगहा से उनकी अच्छी मित्रता थी। भोगहा जी भी अक्सर बालपुर आया करते थे। आगे चलकर  लोचनप्रसाद जी ने भोगहा जी को गुरूतुल्य मानकर उनकी लेखन शैली को अपनाया था।``&lt;br /&gt;अंग्रेज जमाने के पुलिस थाने में आज तक कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। शायद सरकार को पुरानी चीजों को मौलिक रूप में सहेज कर रखने की आदत हो गयी है। उस समय इस थाने का कार्य क्षेत्र बहुत विशाल था, आज उसमें कटौती कर दी गयी है..जगह जगह पुलिस थाना और चौकी बना दिया गया है। मीडिल स्कूल अब हाई स्कूल अवश्य हो गया है, संस्कृत पाठ शालाएं बंद हो गई हैं और कन्या हाई स्कूल, सरस्वती विद्यालय और कान्वेंट स्कूल आदि खुल गये हैं। स्कूलों की गिरती दीवारें, टूटते छप्पर, वहां का हाल सुनाने के लिए पर्याप्त है। स्कूलों में शिक्षक की कमी तो लगभग सभी स्कूलों में है, तो यहां कैसे नहीं होगी ? एक बार मुझे यहां के गौरवशाली स्कूल में जाने का सौभाग्य मिला और वहां की स्थिति देखकर वह बात याद आ गयी जिसमें कहा गया है कि``... स्वयं अभावों में रहकर बच्चों के अच्छी पढ़ाई की कल्पना कैसे की जा सकती है ?`` यहां तो शिक्षक ही घंटी बजाता है, झाड़ू लगाता है और टूटी-फूटी कुर्सी में बैठता है। साहित्य समाज का दर्पण होता है, हमारे समाज का साहित्य आज ऐसी स्थिति में पहुंच गया है कि अगर हम समय रहते उचित कदम नहीं उठाते हैं तो हमारे समाज की विकृति हमारी नौनिहालों के भविष्य को नष्ट कर देगी ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महानदी अपनी विनाश लीला दिखाने में कभी पीछे नहीं रही। महानदी में एक गंगरेल बांध और दूसरा हीराकंुड बहुद्देशीय बांध बनाया गया है जिससे बाढ़ में कमी अवश्य आयी है। लेकिन सन् १८८५ और १८८९ में जो विनाशकारी बाढ़ आयी थी जिससे यहां के तहसील के कागजात बह गये थे और अंग्रेज अधिकारी शबरीनारायण को बाढ़ क्षेत्र घोषित कर पूरा गांव खाली करने का आदेश दे दिया था। मगर भगवान नारायण के भक्त इस गांव को खाली नहीं किये... बल्कि उनकी आस्था भगवान नारायण के उपर बढ़ गयी। तहसील मुख्यालय तो चाम्पा के जमींदार की सहमती से जांजगीर में स्थापित कर दिया गया। आज जांजगीर जिला मुख्यालय बन गया है लेकिन शबरीनारायण के हिस्से में ले देकर उप तहसील मुख्यालय ही आ सका है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितनी विडंबना है कि लोग मेरे नाम की पवित्रता और धार्मिक महत्ता का बखान करते अघाते नहीं है, लेकिन मेरे नाम का कोई पटवारी हल्का नहीं है। मेरा अस्तित्व महंतपारा और भोगहापारा के रूप में है। प्राचीन काल में यह क्षेत्र दंडकारण्य फिर दक्षिण कोसल और आज छत्तीसगढ़ का एक छोटा सा भाग है। जब दंडकारण्य के इस भाग को खरदूषण से मुक्ति मिल गयी तब यहां मतंग ऋषि का गुरूकुल आश्रम था जहां शबरी परिचारिका थी।... और शबरी को दर्शन देकर कृतार्थ करने भगवान श्रीराम और लक्ष्मण यहां आये थे। द्वापरयुग में यह एक घनघोर वन था। तब इस क्षेत्र को सिंदूरगिरि कहा जाता था। इसी क्षेत्र में एक कुंड के किनारे बांस पेड़ों के बीच भगवान श्रीकृष्ण के मृत शरीर को जरा नाम का शबर लाकर उसकी पूजा-अर्चना करने लगा। बाद में पुरी (उड़ीसा) में भव्य मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हुआ तब आकाशवाणी हुई कि ``दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में शिव गंगा का संगम के निकट बांस के घने वनों के बीच रखी मूर्ति को लाकर स्भापित करो..`` आगे चलकर उस मूर्ति को पुरी में भगवान जगन्नाथ के रूप में स्थापित किये। उनके यहां ये चले जाने के बाद उनका नारायणी स्वरूप यहां गुप्त रूप से विद्यमान रहा। तब से इसे ``गुप्तधाम`` के रूप में ``पांचवां धाम`` होने का सौभाग्य मिला। उस पवित्र कुंड को ''रोहिणी कुंड`` कहा गया। इस कुंड को श्री बटुक सिंह चौहान ने एक धाम माना है जबकि सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित मालिकराम भोगहा ने ''शबरीनारायण माहात्म्य'' में उसे मुक्ति धाम बताया हैं :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोहिणि कुंडहि स्पर्श करि चित्रोत्पल जल न्हाय।&lt;br /&gt;योग भ्रश्ट योगी मुकति पावत पाप बहाय ।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवान नारायण की पूजा-अर्चना में यहां का भोगहा परिवार ६० पुश्तों से करते आ रहे हैं। उनको ``भोगहा`` उपनाम भगवान को भोग लगाने के कारण ही मिला है। आगे चलकर भोगहापारा उनकी मालगुजारी हुई। भोगहा जी ने माखन साव के परिवार को हसुवा से यहां बसाया। इस क्षेत्र के सभी राजा-महाराजा, जमींदार और मालगुजारों से भोगहा जी की मित्रता थी। उन्हीं के कहने पर सोनाखान के जमींदार रामाराय ने अपने बारापाली गांव को भगवान नारायण मंदिर में चढ़ा दिया था। ये सब माफी गांव हैं और मठ के अधीन हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां के सभी मंदिरों की भोग रागादि की व्यवस्था मठ से होती है। श्रद्धालुओं द्वारा जितने भी गांव मंदिर में चढ़ाए गये उनकी देखरेख भी मठ के द्वारा होती है। प्राचीन काल में शबरीनारायण नाथ सम्प्र्रदाय के तांत्रिकों गढ़ था। नारायण मंदिर के दक्षिणी द्वार पर दो छोटे मंदिर है,उसी में कनफड़ा बाबा और नाकफड़ा की मूर्ति है जो नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों के गुरू थे। स्वामी दयाराम दास तीर्थाटन करते रत्नपुर आये। उनसे प्रभावित होकर रत्नपुर के राजा उन्हें शबरीनारायण क्षेत्र में निवास करने की प्रार्थना की और कुछ माफी गांव दिए। यहां आकर उन्होंने तांत्रिकों से शास्त्रार्थ किया और इस क्षेत्र को छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। उन्होंने ही यहां वैष्णव पीठ की स्थापना की। इस मठ के वे पहले महंत हुए। तब से आज तक १४ महंत एक से बढ़कर एक थे। वर्तमान में श्री रामसुन्दरदास यहां के महंत हैं। महंतों ने इस क्षेत्र में धर्म के प्रति जागृति पैदा की, अंचल की परम्पराओं को संरक्षित किया। उनकी मालगुजारी महंतपारा में माघ पूर्णिमा को मेला का आयोजन करना, उसकी व्यवस्था करने में महंत का अविस्मरणीय योगदान रहा है। भोगहा जी भी भोगहापारा में मेला लगाने की कोशिश की मगर उनको सफलता नहीं मिली। बहरहाल, यहां का मेला सुव्यवस्थित होता है। पहले यहां का मेला एक माह तक लगता था लेकिन अब १५ दिन तक लगता है। मान्यता है कि माघ पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ यहां विराजमान होते हैं। इस दिन उनका दर्शन मोक्षदायी होता है। कदाचित् इसी कारण यहां श्रद्धालुओं की अपार भीड़ होती है। यहां के मेला को ''छत्तीसगढ़ का महाकुंभ'' कहा जाता है। हालांकि महाकुंभ हर १२ वर्श में लगता है लेकिन यहां महाकुंभ जैसी भीड़ हर वर्श होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां तो मैं कह रहा था... पहले ले देकर महंतपारा और भोगहापारा को मिलाकर ग्राम पंचायत बनाया गया और सरपंच बने श्री तिजाऊप्रसाद केशरवानी। ११ वर्ष तक तन मन से उन्होंने नगर की सेवा की, कई शासकीय दफ्तर खुलवाये, स्कूल भवन, पंचायत भवन, भारतीय स्टैट बैंक भवन, बिजली आफिस भवन आदि का निर्माण करवाये। नदी के बढ़ते कटाव को रोकने के लिए पाट बनवाये, सब्जी बाजार लगवाये। मवेशी बाजार की वसूली का अधिकार जनपद पंचायत जांजगीर से प्राप्त कर पंचायत की आय में बृद्धि की। नदी में तरबूज और खरबूज की खेती करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया। मैं बचपन से ही यहां के बिजली खम्भों में ट्यूब लाइट और मरकरी देखते आ रहा हूं। ग्राम न्यायालय गांवों में आज लागू हुआ है जबकि शिवरीनारायण में बहुत पहले से ही लागू है।...न जाने कितने परिवारों को बिखरने और टूटने से बचाया है श्री तिजाऊप्रसाद ने, लेकिन आज अपने ही परिवार को बिखरने ने नहीं बचा पा रहे हैं। इसके बाद श्री सुरेन्द्र तिवारी सरपंच बने। नया खून, नया जोश..लोगों को भी उनसे बहुत आशाएं थी। मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। हां, उसके बाद यह नगरपालिका बना और प्रथम नगरपालिका अघ्यक्ष बनने का सौभाग्य हासिल किया श्री विजयकुमार तिवारी ने। जन्म भर की कांग्रेस की सेवा करने का पुरस्कार था यह। सन् १९८० में यहां भयानक बाढ़ आयी और खूब तबाही मचायी..कई स्वयं सेवी संस्थाएं आसूं पोंछने आये, कई नेता आये और अनेक घोषणाएं भी की मगर मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अर्जुन सिंह ने महानदी में पुल निर्माण की जो घोषणा की थी वह अवश्य पूरी हो गयी है जिससे यहां विकास का मार्ग खुल गया  है। यहां की जनता उनके प्रति आभारी है। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री श्री विद्याचरण शुक्ल ने तब महानदी के कटाव को रोकने के लिए दोनों ओर तटबंध निर्माण कराने की घोषणा की थी, सर्वे भी कराया गया मगर आज तक यह पूरा नहीं हो सका, हां लीपापोती अव य हो गयी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;....लेकिन जर्जर सड़कें, गंदगियों की भरमार, बीमार अस्पताल, नगर पंचायत का खस्ता हाल, बनारस की याद दिलाते यहां के गंदगियों से भरे घाट और आपस में लड़ते-मरते लोग आज की उपलब्धि है। श्री बल्दाऊ प्रसाद केशरवानी ने अपने दादा श्री प्रयागप्रसाद केशरवानी की स्मृति में उनके जीते जी एक चिकित्सालय का निर्माण कराया, उसमें श्री देवालाल केशरवानी ने अपने दादा स्व. श्री पचकौड़प्रसाद साव की स्मृति में विद्युतीकरण कराया तो लोगों को अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग होने का अहसास हुआ। डॉ. एम. एम. गौर को लोग अब भूल गये हैं लेकिन उन्हीं की प्रेरणा और सहयोग से ऐसा संभव हुआ था। उनके बाद डॉ. बी. बी. पाठक, फिर डॉ. शुक्ला, डॉ. आहूजा, डॉ. बी. पी. चंद्रा, डॉ. वर्मा, डॉ. जितपुरे और डॉ शकुन्तला जितपुरे, डॉ. बोडे आये और चले गये मगर आज यह नगर एक अद्द डॉ. के लिए तरस रहा है। दानदाता की बात निकली है तो कहना अनुचित नहीं होगा कि लोगों ने दान के नाम पर नगर को बहुत छला है। श्री जगन्नाथ प्रसाद केशरवानी शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय और २० बिस्तर वाला जुगरीबाई प्रसूती गृह का शिलान्यास क्रमश: श्री विद्याचरण शुक्ला और कु. बिमला वर्मा ने किया था। इस अस्पताल में ऑपरेशन थियेटर के निर्माण की घोषणा श्री गणेशप्रसाद नारनोलिया ने की थी। श्री परसराम केशरवानी और श्री तिजराम केशरवानी ने अपने बच्चों की स्मृति में एक एक कमरा पेइंग वार्ड के लिये बनवाने की घोषणा की थीे। मगर घोषणाएं तो वाहवाही के लिए होती हैं, उसे पूरा करना जरूरी नहीं होता ? दानदाताओं के द्वारा दान में दिया गया भवन शासन लेता जरूर है मगर उसकी देखभाल नहीं करता और भवन जर्जर होकर गिर जाता है..। शासन आज ऐसे पब्लिक सेक्टर के शासकीय कार्यालयों को जनभागीदरी से संचालित करता जा रहा है तो दान में दिये गये भवनों की सुरक्षा, उसकी देखभाल आदि की जिम्मेदारी शासन क्यों नहीं लेता। इससे लोगों में दान के प्रति झुकाव कम हुआ है। यही हाल स्कूल भवनों का है। एक तो ८० प्रतिशत स्कूलों के अपने भवन नहीं हैं और जहां है उसकी देखरेख नहीं हो पा रहा है। शासन की यह नीति कहां तक उचित है ? अस्पताल में न डॉक्टर है, न स्कूलों में शिक्षक...न जाने कैसा होगा मेरा भविष्य ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवान नारायण के अनेक रूप जैसे केशवनारायण ,लक्ष्मीनारायण, राधाकृृष्ण, जगन्नाथ के मंदिर यहां हैं। इसी प्रकार औघड़ दानी शिव के अनेक रूप जैसे महेश्वरनाथ, चंद्रचूड़ महादेव, श्रीराम लक्ष्मण जानकी मंदिर, मां अन्नपूर्णा मंदिर, मां काली मंदिर आदि अन्यान्य मंदिर दर्शनीय है। महानदी का मुहाना बड़ा मनोरम है। छत्तीसगढ़ शासन शिवरीनारायण को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया है जिसके लिए वह बधाई के पात्र हैं। यहां की जनता उनके प्रति आभारी है। इस महाकंुभ के अवसर पर सारे जगत को जगन्नाथ धाम का दर्शन कराने वाला और मोक्ष देने वाला है..तभी तो कवि हीराराम त्रिपाठी गाते हैं :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होत सदा हरिनाम उच्चारण रामायण नित गान करै।&lt;br /&gt;अति निर्मल गंग तरंग लखै उर आनंद के अनुराग भरै।।&lt;br /&gt;शबरी बरदायक नाथ विलोकत जन्म अपार के पाप हरै।&lt;br /&gt;जहां जीव चारू बखान बसै सहज भवसिंधु अपार तरै।।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-963603624854738913?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_4249.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-1863979588533182793</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:12:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:13:46.777-08:00</atom:updated><title>मट और महंत परंपरा</title><description>शिवरीनारायण में चतुर्भुजी विष्णु मूर्तियों और मंदिरों की अधिकता के कारण यह क्षेत्र प्राचीन काल से श्री पुरूषो&gt;शम और श्री नारायण क्षेत्र के रूप में विख्यात था। जगन्नाथ पुरी के भगवान जगन्नाथ को शिवरीनारायण से ही पुरी ले जाने का उल्लेख उड़िया कवि सरलादास ने चौदहवीं शताब्दी में किया था। उस काल का अवशेष आज भी यहां देखा जा सकता है। यहां नाथ सम्प्रदाय के गुरू कनफड़ा और नागफड़ा बाबा की मूर्ति एक गुफा मंदिर में तथा बस्ती के बाहर एक नाथ गुफा आज भी सुरक्षित है। प्राचीन काल में जगन्नाथ पुरी जाने का मार्ग शिवरीनारायण होकर जाता था। प्राचीन काल में तीर्थयात्रा पैदल जाते थे। ऐसी किंवदंती है कि उन पैदल तीर्थ यात्रियों को ये डरा धमकाकर लूट लेते थे। चूंकि नाथ सम्प्रदाय के लोग तांत्रिक होते थे अत: ये तंत्र मंत्र का उपयोग भी इस कार्य में करते थे। आज भी इस क्षेत्र में तंत्र मंत्र का प्रभाव है। उड़िया साहित्य के अनुसार सम्पूर्ण उड़ीसा तंत्र मंत्र के प्रभाव में प्राचीन काल से आज तक रहा है। ऐसी मान्यता है कि पुरी का जगन्नाथ मंदिर भी इन्हीं तांत्रिकों के कब्जे में था जिनसे आदि शंकराचार्य ने शास्त्रार्थ करके मुक्त कराया था। शिवरीनारायण के मठ और मंदिर भी तांत्रिकों के कब्जे में होने की किंवदंती है। रामानंद सम्प्रदाय के स्वामी दयाराम दास ग्वालियर से तीर्थाटन करते छत्‍तीसगढ़के रत्नपुर आये। उनके ज्ञान और विद्वता से प्रभावित होकर रत्नपुर के राजा ने उन्हें अपना गुरू बनाया और उन्हें शिवरीनारायण में मठ बनवाकर दिया और उसकी व्यवस्था के लिये कुछ माफी गांव भी दिये। जब वे शिवरीनारायण में आये तो उन्हें भी नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों ने डराने धमकाने का प्रयास किया मगर स्वामी जी के साथ वे सफल नहीं हो सके। स्वामी दयारामदास ने उनके गुरूओं के साथ शास्त्रार्थ किया और उन्हें यहां से जाने को बाध्य किया। उनके जाने के बाद यहां उन्होंने ''श्री वैष्णव मठ'' की स्थापना की और वे इस मठ के प्रथम महंत बने। स्वामी दयारामदास के यहां आने का काल और रत्नपुर में किस राजा ने अपना गुरू बनाकर उन्हें शिवरीनारायण में मठ बनवाकर महंत बनाया, इसकी जानकारी नहीं मिलती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; रामानुजाचार्य का कार्यकाल सन् १०२७ से ११३७ था। स्वामी दयारामदास जी इनके अनुयायी थे। इसका अर्थ यह हुआ कि वे यहां इसी काल में आये होंगे ? कहीं कहीं इस मठ को रामानंदी वैष्णव सम्प्रदाय का माना गया है। रामानंद जी का जन्म सन् १२९९ ईसवीं में प्रयाग में हुआ था। श्री सम्प्रदाय की दीक्षा उन्होंने काशी में स्वामी राघवानंद से ली थी जो रामानुज परंपरा की चौथी पीढ़ी के थे। भक्ति आन्दोलन में रामानंद जी बड़े महत्वपूर्ण आचार्य हुए। श्री सम्प्रदाय विष्णु और उनकी शक्ति लक्ष्मी की पूजा में विश्वास करता था, किंतु विष्णु के रामावतार की पूजा का प्रचलन उस सम्प्रदाय में नहीं था। रामोपासना का वास्तविक प्रवर्तन रामानंद ने ही किया है। रामानंद का सम्प्रदाय इसीलिए ''रामावत् सम्प्रदाय'' कहलाता है जो विशिष्ट द्वैतवादी तो है ही, किंतु वह विष्णु के बदले राम की उपासना करता है। रामानंद जी पूरे देश का भ्रमण किये। दक्षिण में वे वर्षो रहे और दक्षिण की भक्ति की धारा को उ&gt;शर में लाने वाले वे ही थे।&lt;br /&gt;भक्ती द्राविड़ उपजी, लाये रामानंद,&lt;br /&gt;परगट कियो कबीर ने सात द्वीप नौ खंड।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खरौद के लक्ष्मणेश्वर मंदिर में स्थित कलचुरि संवत् ९३३ के शिलालेख में २४ वें श्लोक में देवालय के दक्षिण में तपस्वियों के निवासार्थ एक मठ निर्माण कराने का उल्लेख है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मठ कठोर काष्ठौ घ्रैरत्रैवाकारि धीमता।&lt;br /&gt;देव दक्षिण दिग्भागे निवासार्थ तपस्विनां।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात् शिवरीनारायण में मठ का निर्माण संवत् ९३३ में हुआ होगा। शिवरीनारायण में चंद्रचूड़ महादेव मंदिर के चेदि संवत् ९१९ के शिलालेख में और नारायण मंदिर के दक्षिण भाग में स्थित एक छोटे मंदिर में स्थित राजा संग्रामसिंह की मूर्ति के नीचे कलचुरि संवत् ९९८ में रत्नपुर के राजाओं की जानकारी है। इसी प्रकार पंडित रामचंद्र भोगहा के पास संवत् ८७८ के रत्नदेव द्वितीय का ताम्रपत्र में भी इसी प्रकार का उल्लेख है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, शिवरीनारायण के मठ के पहले महंत स्वामी दयारामदास जी थे। उसके बाद निम्नलिखित महंत हो चुके हैं :- १. स्वामी दयारामदास २. स्वामी कल्याणदास ३. स्वामी हरीदास ४. स्वामी बालकदास ५. स्वामी महादास ६. स्वामी मोहनदास ७. स्वामी सूरतदास ८. स्वामी मथुरादास ९. स्वामी प्रेमदास १०. स्वामी तुलसीदास ११. स्वामी अर्जुनदास १२. स्वामी गौतमदास १३. स्वामी लालदास १४. राजेश्री महंत वैष्णवदास और वर्तमान में राजेश्री महंत रामसुन्दरदास जी हैं। शिवरीनारायण मठ के ११ वें महंत   श्री अर्जुनदास से आज तक की जानकारी मिलती है, उसके पूर्व की जानकारी नहीं मिलती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महंत अर्जुनदास जी :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वामी अर्जुनदास जी शिवरीनारायण मठ के ग्यारहवीं पीढ़ी के महंत थे। वे शिवरीनारायण तहसील के आनरेरी बेंच मजिस्ट्रेट थे। बिलासपुर जिलान्तर्गत (वर्तमान रायपुर) ग्राम बलौदा में संवत् १८६७ में उनका जन्म हुआ। १८ वर्ष की आयु तक विद्याध्ययन किया और फिर वे मठ मंदिर में पुजारी नियुक्त होकर २३ वर्ष की आयु तक कार्य करते रहे। तत्पश्चात् इस मठ के महंत बने। सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित मालिकराम भोगहा ने 'शिवरीनारायण माहात्म्य' में उनके बारे में लिखा है:- ''स्वामी अर्जुनदास जी बड़े आस्तिक थे। बालपन से ही मूर्ति पूजा करते थे। नदी से कंकड़, पत्थर लाकर उनकी पूजा किया करते थे। इसमें वे अपनी तृप्ति मानते थे। आगे चलकर आपको हनुमान जी की बड़ी कृपा मिली।'' वे श्रीराम की उपासना में सदा दृढ़ रहे। अपनी दिनचर्या में रामायणादि और भगवत्कथा के श्रवण में कुछ समय अवश्य निकालते थे। उन्हें 'वाक् सिद्धि' थी। उनके मुख से निकली हुई हर बात सत्य होती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अकलतरा के जमींदार श्री सिदारसिंह का कोई पुत्र नहीं था। उन्होंने स्वामी जी से पुत्र निमि&gt;श प्रार्थना की। स्वामी जी ने हनुमान जी का ध्यान धरकर पुत्रोत्पि&gt;श की बात कही। ईश्वर इच्छा से उनका पुत्र हुआ। उन्होंने अपने पुत्र का नाम अमरसिंह रखा। स्वामी जी की प्रेरणा पाकर सिदारसिंह ने अपने भाई श्री गरूड़सिंह की सहायता से संवत् १९२७ में एक मंदिर बनवाकर उसमें श्रीराम लक्ष्मण और जानकी जी की प्रतिमा स्थापित करायी। इसी प्रकार लवन निवासी सुधाराम नामक ब्राह्मण को भी पुत्रोत्पि&gt;श का वरदान दिया था। यथाकाल उनके घर भी पुत्र की प्राप्ति हुई। स्वामी जी की प्रेरणा से उन्होंने मठ परिसर में संवत् १९२७ में एक हनुमान जी का मंदिर बनवाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी प्रकार स्वामी जी की आज्ञा पाकर श्री रामनाथ साव ने चंद्रचूड़ महादेव मंदिर के बगल में संवत् १९२७ में एक महादेव जी का मंदिर बनवाया। इस मंदिर में भगवान विष्णु की चतुर्भुजी मूर्ति भी है। आज उनके वंशज श्री मंगलप्रसाद, श्री तीजराम और श्री जगन्नाथ प्रसाद केशरवानी इस मंदिर की देखरेख और पूजा-अर्चना कर रहे हैं। स्वामी जी की प्रेरणा से भटगांव के जमींदार श्री राजसिंह ने मठ प्रांगण में जगन्नाथ मंदिर की नींव संवत् १९२७ में डाली, जिसे उनके पुत्र श्री चंदनसिंह ने पूरा कराया और राग भोगादि की व्यवस्था की। इसी समय भटगांव के जमींदार ने योगी साधु-संतों के निवासार्थ जोगीडीपा में एक भवन का निर्माण कराया जिसे आज जनकपुर के नाम से जाना जाता है। रथयात्रा में आज भी भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी के साथ एक सप्ताह यहां विश्राम करते हैं। संवत् १९२६ में यहां       श्री बैजनाथ साव, चक्रधर, बोधराम और अभयराम ने एक हनुमान जी का भव्य मंदिर बनवाया था। आज यह उजाड़ जरूर हो गया है लेकिन महंत अर्जुनदास जी यहां एक सुंदर बगीचा लगवाया था। वे यहां प्रतिदिन आया करते थे। द्वार पर एक शिलालेख है जिसमें हनुमान मंदिर बनाने का उल्लेख है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संवत् १९२३ से १९२७ तक नारायण मंदिर के चारों ओर पत्थर से पोख्तगी कराकर मंदिर को मजबूती प्रदान कराया। यही नहीं बल्कि इधर उधर बिखरे मूर्तियों को दीवारों में जड़वाकर सुरक्षित करवा दिया। आज यहां का मंदिर परिसर जीवित म्यूजियम जैसा प्रतीत होता है। संवत् १९२९ में मठ परिसर में पूर्व महंतों की समाधि में छतरी बनवायी। फाल्गुन शुक्ल पंचमी, संवत् १९४४ को रायपुर के छोगमल मोतीचंद ने मठ परिसर में द्वार से लगा एक सूर्य मंदिर का निर्माण कराया। स्वामी अर्जुनदास ने रायपुर के डिप्टी कमिश्नर श्री इलियट साहब से मंदिर के खर्चे का वर्णन किया, तब उन्होंने १२ गांव की माफी मालगुजारी संवत् १९१५ में यह कहकर दिया-'... अब आपके ठाकुर जी का खर्च ठीक चलेगा।' संवत् १९२० में डिप्टी कमिश्नर चीजम साहब की अनुमति से उन्होंने यहां एक पाठशाला खुलवाया। यह पाठशाला महानदी के तट पर स्थित माखनसाव के कुलदेव महेश्वर महादेव मंदिर के पास स्थित थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंडित हीराराम त्रिपाठी श्री शिवरीनारायण माहात्म्य में महंत अर्जुनदास जी के बारे में लिखते हैं-'स्वामी जी का शील स्वभाव और ईश्वरोपासना में दृढ़ भक्ति और मिलनसारिता के कारण उनके सब हाकमान सदा प्रसन्न रहते थे।' संवत् १९३३ (जनवरी सन् १८७७ ई.) में राज राजेश्वरी को महारानी की उपाधि मिलने पर उन्होंने स्वामी जी को एक प्रशंसा पत्र देकर सम्मानित किया था। इस प्रकार ४४ वर्ष इस मठ के महंत रहकर ७५ वर्ष की आयु में मठ प्रबंधन का सारा भार अपने शिष्य श्री गौतमदास को सौंपकर वे पौष कृष्ण अष्टमी दिन मंगलवार संवत् १९४२ को स्वर्गवासी हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंडित मालिकराम भोगहा ने महंत अर्जुनदास जी की दिनचर्या और रात्रिचर्या का वर्णन इस प्रकार किया है- ''...प्रात:काल चार बजे प्रत्येक ऋतुओं में स्नानकर हनुमान जी की पूजा करना, अनंतर आठ बजे दिन तक राम स्तवराज का पाठ और श्रीविष्णुमहामंत्र के अनुष्ठान में पगे रहकर शुभकामना और वासना का संस्कार किया करते थे। नंतर शबरीनारायण के दर्शन को आते और अपने हाथ से सुंदर सामयिक पत्र, पुष्प और फल आदि अर्पण कर चरणामृत ले श्रीरामचंद्र जी के मंदिर आते थे। उसी प्रकार वहां भी दर्शन-पर्शन और साधुओं को दंडवत् प्रणाम कर जगन्नाथ जी के मंदिर की शोभा बढ़ाते थे। इधर उनको मठ का काम यह देखना पड़ता था कि शबरीनारायण मंदिर, श्रीरामचंद्रजी के मंदिर और मठ के भंडार में क्या क्या सामान गया। जब जब जिस जिस ऋतुओं में नई वस्तु कहीं से आती, बिना भगवान के भोग लगाये अपने मुख में डालना उन्हें शपथ था। अनंतर १० बजे के भीतर जोगीडीपा जिसे जनकपुर और सिंदूरगिरि भी कहते हैं, जाया करते। वहां हनुमान जी का दर्शन और वहां का उद्यान निरीक्षण कर १२ बजे लौटकर पंगत में शामिल हुआ करते थे। दो घंटा आराम कर राम नाम जपतेे रामायण की कथा सुनाते और चार बजे फिर जोगीडीपा आ शौच-स्नान कर संध्या के पहिले मठ में आ जाते थे। लंबी तुलसी की माला हाथ में लिये वासुदेव मंत्र का जाप करते शबरीनारायण की प्रदक्षिणा कर भीतर दर्शन करने आते और-''जय राम रमा रमन शमन भवताप भयाकुल पाहि जनम'' यह छंद पढ़ते पढ़ते चंवर डुलाते और चरणामृत पानकर रामचंद्रजी के मंदिर में आते। उसी तरह प्रणाम-अभिवादन के अनंतर मठ में आ जगन्नाथ जी के तथा अन्य मूर्तियों के दर्शन कर अपने नित्य कर्म में प्रवृ&gt;श होते थे। यह चरित्र प्राय: उनके जीवन भर मैं देखता रहा। अब कहिये इन्हें सिद्ध कहें या देवता..?''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महंत गौतमदास जी :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिवरीनारायण मठ के १२ वें महंत स्वामी गौतमदास जी हुए जो स्वामी अर्जुनदास जी के परम शिष्य थे। वे शिवरीनारायण तहसील के आनरेरी बेंच मजिस्ट्रेट थे। गौतमदास जी का जन्म बिलासपुर (वर्तमान रायपुर) जिलान्तर्गत बलौदा ग्राम में श्री गंगादास और श्रीमती सूरर्या देवी के पुत्र रत्न के रूप में माघ शुक्ल द्वादशी संवत् १८९२ रविवार को अच्युत गोत्रीय वैष्णव कुल में हुआ। बलौदा इनकी गौटियाई गांव था जहां अच्छी खेती होती थी। ९ वर्ष की आयु तक वे अपने माता पिता के पास रहे। उसके बाद दीक्षित होकर विद्याध्ययन करने के लिए शिवरीनारायण आ गये। उनके गुरू स्वामी अर्जुनदास जी ने उनकी शिक्षा की व्यवस्था मठ में ही करा दी। सात वर्ष तक उनको संस्कृत और नागरी भाषा में शिक्षा मिली। तत्पश्चात् गीतादि और कर्मकांड में शिक्षा ग्रहणकर निपुण हुए। संवत् १९१० में महंत अर्जुनदास जी ने अपना सम्पूर्ण कार्यभार उन्हें सौंप दिया, यहां तक कि सरकार के दरबार में भी उन्हें जाने का अधिकार उन्होंने दिया। फिर वे मठ की देखरेख करने लगे। महंत अर्जुनदास जी की प्रेरणा से बनने वाले सभी मंदिर उन्हीं की देखरेख में बने। उन्होंने अपने गुरू का ३४ वर्ष तक साथ निभाया। उनके मृत्योपरांत ५० वर्ष की अवस्था में वे संवत् १९३६ में इस मठ के महंत बने। उन्होंने शिवरीनारायण में रथयात्रा, श्रावणी, झूलोत्सव, और माघी मेला लगाने की दिशा में समुचित प्रयास किया जिसे उनके शिष्य महंत लालदास जी ने व्यवस्थित रूप प्रदान किया। उन्होंने टुन्ड्रा में एक तालाब खुदवाकर सुन्दर बगीचा लगवाया। इसी प्रकार शिवरीनारायण में प्रमुख बाजार से लगा एक सुन्दर बगीचा लगवाया। इसे ''फुलवारी'' के नाम से जाना जाता है। उनका सम्पूर्ण समय ईश्वरोपासना, श्रीराम के भजन और श्रीहरिकथा श्रवण में व्यतीत होता था। धर्म्म व्यवहार में उनकी इतनी दृढ़ता थी कि अस्वस्थ होने पर भी धर्मानुकूल व्यवहार करने में वे कभी नहीं चुकते थे। वे धर्माभिमानी और धर्मात्मा पुरूष थे। प्रयाग, काशी, गया, जगन्नाथपुरी और अयोध्या आदि तीर्थयात्रा उन्होंने की थी। वे सनातन धर्म के रक्षार्थ निरंतर कटिबद्ध रहे। शिवरीनारायण में सबसे पहले उन्होंने ही नाटकों के मंचन को प्रोत्साहित किया जिसे महंत लालदास जी ने प्रचारित कराया। उन्होंने अपने भाई श्री जयरामदास के पुत्र श्री लालदास जी को अपना शिष्य बनाकर मठ का महंत नियुक्त किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महंत लालदास जी :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिवरीनारायण मठ के १३ वें महंत स्वामी लालदास जी हुए। बिलासपुर (वर्तमान रायपुर) जिलान्तर्गत ग्राम बलौदा के श्री जयरामदास जी के पुत्र के रूप में आषाढ़ शुक्ल ११, संवत् १९३६ में उनका जन्म हुआ। वे महंत गौतमदास जी के भतीजे थे। माघ शुक्ल ५, संवत् १९४० को श्री लालदास का विद्याध्ययन आरंभ हुआ और चैत्र शुक्ल ८, संवत् १९४५ को संस्कारित होकर विधिवत दीक्षित हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महंत लालदास जी संत सेवी, भगवत भक्त और समाज के उत्थान के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे। यहां त्योहारों और पर्वो में विशेष धूम उन्हीं के कारण होने लगी थी। सावन में झूला उत्सव, रामनवमीं, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, रथयात्रा, विजियादशमी यहां बड़े धूमधाम से मनाया जाता था जिसमें आस पास के गांवों के बड़ी संख्या में लोग सम्मिलित होते थे। यहां रामलीला, कृष्णलीला और नाटक का मंचन बहुत अच्छे ढंग से होता था जिसे देखने के लिए राजा-महाराजा, जमींदार और मालगुजार तक आते थे। महंत गौतमदास जी के समय यहां एक ''महानद थियेटिकल कम्पनी'' नाम से नाटक मंडली बनी थी जिसके द्वारा धार्मिक नाटकों का मंचन किया जाता था। इस नाटक मंडली को आर्थिक सहायता मठ के द्वारा मिला था। मठ के मुख्तियार श्री कौशल प्रसाद तिवारी ने भी ''बाल महानद थियेटिकल कम्पनी'' के नाम से एक नाटक मंडली बनायी थी। आगे चलकर महानद थियेटिकल कम्पनी और बाल महानद थियेटिकल कम्पनी को एक करके ''महानद थियेटिकल कम्पनी'' बनी। इस कम्पनी के मैनेजर श्री कौशल प्रसाद तिवारी थे। यहां मनोरंजन के यही साधन थे। समय समय पर यहां संत समागम, यज्ञ आदि भी होते थे। कदाचित् इन्हीं सब कारणों से महंत लालदास जी सबके आदरणीय और पूज्य थे। वे आयुर्वेद के अच्छे ज्ञाता थे। औषधियों का निर्माण वे स्वयं कराते थे और जरूरत मंद लोगों को नि:शुल्क देते थे। उन्होंने शिवरीनारायण को ''व्यावसायिक मुख्यालय'' बनाने के लिए बड़ा यत्न किया। दूर दराज के व्यावसायियों को आमंत्रित कर यहां बसाया और सुविधाएं दी, उन्हें व्यापार हेतु प्रोत्साहित किया। प्रमुख बाजार स्थित दुकानें उनकी दूर दृष्टि का ही परिणाम है। यहां के माघी मेला जो पूरी तरह व्यवस्थित होती है, इसे व्यवस्थित रूप प्रदान करने का सारा श्रेय महंत लालदास को ही जाता है। मठ के मुख्तियार श्री कौशलप्रसाद तिवारी महंत जी की आज्ञा से महंतपारा की अमराई में मेला के लिए सीमेंट की दुकानें बनवायी जो आज टूटती जा रही है। उन्होंने महानदी के तट पर संत-महात्माओं के स्नान-ध्यान के लिए अलग ''बावाघाट'' का निर्माण कराया। नि:संदेह ऐसे परम ज्ञानी, संत, कुशल प्रशासक और दूर दृष्टा महंत का यह क्षेत्र सदैव ऋणी रहेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महंत लालदास ने अपने भतीजे दामोदरदास को अपना शिष्य बनाया। लेकिन २९ जून सन १९५७ को असमय उनकी मृत्यु हो जाने के कारण दूधाधारी मठ रायपुर के महंत श्री वैष्णवदास जी को अपना शिष्य बनाकर इस मठ का महंत नियुक्त किया जो उनके २४ अगस्त सन् १९५८ को मृत्योपरांत मठ का कार्यभार सम्हाला। इस प्रकार शिवरीनारायण मठ और रायपुर के दूधाधारी मठ के बीच एक नया संबंध स्थापित हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजेश्री महंत वैष्णवदास जी :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिवरीनारायण मठ के राजेश्री महंत वैष्णवदास जी १४ वें महंत थे। वे ऐसे पहले महंत थे जो शिवरीनारायण मठ के अलावा रायपुर के दूधाधारी मठ के भी महंत थे। दूधाधारी मठ के अंतर्गत निम्नलिखित मठ-मंदिर संचालित होते हैं :-&lt;br /&gt;      १. दूधाधारी मठ, रायपुर&lt;br /&gt;      २. श्री जगन्नाथ मंदिर हटरी पारा, पुरानी बस्ती, रायपुर&lt;br /&gt;      ३. श्री जगन्नाथ मंदिर राजिम&lt;br /&gt;      ४. श्रीराम मंदिर, पवनी, महाराष्ट्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री वैष्णवदास बिहार प्रांत के छपरा जिलान्तर्गत परसा थाना में पंचरूखी अथवा पंचरूखिया के निवासी थे। वे एक रामलीला मंडली के साथ बिहार से मध्यप्रदेश के छत्‍तीसगढ़में आये थे। उस समय उनकी आयु १६ वर्ष थी। उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर दूधाधारी मठ के महंत श्री बजरंगदास ने उन्हें अपना शिष्य बना लिया। श्री वैष्णवदास ३१.७.१९३४ को उनके मृत्योपारांत इस मठ के आठवें महंत बने। इस समय मठ में २० गांव की मालगुजारी थी, वैष्णवदास ने पांच गांव खरीदकर गांवों की संख्या २५ कर ली थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत्‍तीसगढ़की राजनीति में पंडित रविशंकर शुक्ल के अलावा जैतूसाव मठ के महंत लक्ष्मीनारायण दास और दूधाधारी मठ के महंत वैष्णवदास की अच्छी पूछ परख थी। महंत लक्ष्मीनारायण दास तो रायपुर जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के अलावा दो बार विधायक और एक बार राज्यसभा के सांसद बने थे। रायपुर जिला की राजनीति में उनकी भूमिका निर्णायक होती थी। इसी प्रकार महंत वैष्णवदास ने भी एक बार भाटापारा-सीतापुर निर्वाचन क्षेत्र से किसान मजदूर प्रजापार्टी से चुनाव लड़े थे जिसमें कांग्रेस के     श्री चक्रपाणि शुक्ल से मात्र १५२३ वोट से हार गये थे। महंत जी के राजनीतिक मित्रों में पंडित रामदयाल तिवारी, श्री बृजलाल वर्मा, श्री खूबचंद बघेल, और ठाकुर प्यारेलाल सिंह प्रमुख थे। ठाकुर प्यारेलाल सिंह जब तक कांग्रेस में रहे तब तक वैष्णवदास जी भी कांग्रेस में थे। सन् १९३७ में महंत जी कांग्रेस से जुड़े। सन् १९४२ में वे जेल तो नहीं गये मगर तीन बार सत्याग्रह किये और जुर्माना दिये थे। ठाकुर प्यारेलाल सिंह के साथ महंत वैष्णवदास ''किसान मजदूर प्रजापार्टी'' में चले गये। एक ओर महंत लक्ष्मीनारायणदास पं. रविशंकर शुक्ल के साथ थे, तो दूसरी ओर महंत वैष्णवदास ठाकुर प्यारेलाल सिंह के साथ थे। लेकिन राजनीति में जितना लाभ महंत लक्ष्मीनारायण दास को मिला उतना महंत वैष्णवदास को नहीं मिला। राजनीति से वे हमेशा धोखा खाते रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन् १९७० में जैन मुनि आचार्य तुलसी चतुर्मास बिताने रायपुर आये थे। उन्होंने अपनी पुस्तक ''सीता की अग्नि परीक्षा'' को यहां प्रचारित किया। इस पुस्तक में श्रीराम को ''कायर'' जैसे शब्दों से संबोधित किया गया था। महंत वैष्णवदास रामानंदी सम्प्रदाय के होने के कारण श्रीराम का अपमान वे कैसे सहन कर सकते थे ? उन्होंने उनका विरोध ही नहीं किया बल्कि विरोध का ऐसा अभियान चलाया जिसमें श्री हजारीलाल वर्मा को जेल हो गयी थी। उस समय स&gt;शी बाजार स्थित अम्बादेवी मंदिर में अयोध्या के रामायणी श्री सीतारामशरण जी का प्रवचन कराया गया था। उस समय धार्मिक प्रतिस्पर्धा देखने लायक थी। स्वामी करपात्री महाराज भी उस समय प्रवचन देने यहां आये थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महंत वैष्णवदास जी संस्कृत शिक्षा के बड़े प्रेमी थे। शिक्षा के प्रसार-प्रचार के लिए उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया। सन् १९५५ में रायपुर में ''श्री दूधाधारी वैष्णव संस्कृत महाविद्यालय'' खुलवाने के लिए ३.५ लाख रूपये नगद और १०० एकड़ जमीन दान में दिया। आगे चलकर अमरदीप टॉकिज को भी इस महाविद्यालय को दान कर दिया। इस कार्य में देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्रप्रसाद और प्रदेश के मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल का विशेष योगदान था। इसी प्रकार बालिकाओं की शिक्षा के लिए रायपुर में सन् १९५८ में 'शासकीय दूधाधारी बजरंगदास महिला महाविद्यालय'' खुलवाया और इसकी व्यवस्था के लिए मठ से १.५ लाख रूपये नगद और पेंड्री गांव के ३०० एकड़ जमीन दान में दी। मध्य प्रांत के तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल की ''विद्यामंदिर योजना'' के क्रियान्वयन के लिए मठ से ३० एकड़ जमीन दान में दी। सन् १९५८ में अपने गुरू के नाम पर अभनपुर में ''श्री बजरंगदास उच्चतर माध्यमिक विद्यालय''  खुलवाया। इसी प्रकार अपने पिता की स्मृति में अपने पैतृक गांव पंचरूखी में एक हाई स्कूल खुलवाया। सन् १९३८ में मठ में एक संस्कृत पाठशाला चलती थी जिसमें लगभग १०८ विद्यार्थी पढ़ते थे जो बाद में कम होते गये, उनके रहने, खाने-पीने, कपड़ा, पुस्तकादि का खर्च मठ से देने की व्यवस्था महंत जी ने की थी। बलौदाबाजार के विधि महाविद्यालय के संचालन के लिए मठ से छेड़िया ग्राम की ४० एकड़ भूमि दान की दी। श्री वैष्णवदास ने रायपुर में ''श्री दूधाधारी सत्संग भवन'' के रूप में छत्‍तीसगढ़की जनता को धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों के लिए सर्व सुविधा युक्त भवन उपलब्ध कराया। उनके इस सद्कार्य के लिए म.प्र. स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संघ के प्रांतीय अध्यक्ष सेठ गोविंददास ने एक ''ताम्रपत्र'' देकर सम्मानित  किया था। म. प्र शासन ने .सन् १९७५-७६ में उन्हें ''कृषक शिरोमणि'' की उपाधि प्रदान की थी। सामाजिक उत्थान में अपना सर्वस्र न्योछावर करने वाले महंत वैष्ण्वदास जी को ''अखिल भारतीय वैष्णव सम्प्रदाय के अध्यक्ष''  बनने का भी सौभाग्य मिला। उन्हें      २५. ११. १९९५ को छत्‍तीसगढ़की जनता ने ''राजेश्री''  की उपाधि प्रदान की थी। उन्होंने श्री रामसुन्दरदास को अपना शिष्य बनाकर शिवरीनारायण और दूधाधारी मठ का महंत नियुक्त किया और दिनांक          १२. ११. १९९५ को ब्रह्मलीन हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;०१.१०.१९८६ को मठ के प्रबंधन के लिए एक ''पब्लिक ट्रस्ट'' का गठन किया गया था जिसके चेयरमेन ट्रस्टी राजेश्री महंत वैष्णवदासजी और श्री जे. एन. ठाकुर को सचिव बनाया गया था। इस ट्रस्ट में निम्न लिखित सदस्य मनोनित किये गये थे :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१. श्री नरेन्द्रकुमार मिश्रा, विधायक, बलौदाबाजार&lt;br /&gt;२. श्री रामसनेही अग्रवाल, अधिवक्ता, बिलासपुर&lt;br /&gt;३. श्री जगदीशप्रसाद केशरवानी, अधिवक्ता, बिलासपुर&lt;br /&gt;४. श्री ललित सुरजन, संपादक, देशबंधु, रायपुर&lt;br /&gt;५. श्री रामविशाल शुक्ल, सरकारी अधिवक्&gt;शा, रायपुर&lt;br /&gt;६. श्री भगवानसिंह ठाकुर, अधिवक्ता, रायपुर&lt;br /&gt;७. श्री जे. एन. ठाकुर, पुरानी बस्ती, रायपुर, सचिव&lt;br /&gt;८. श्री लक्ष्मणप्रसाद मिश्रा, बिलासपुर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजेश्री महंत रामसुन्दरदास जी :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री रामसुन्दरदास जी शिवरीनारायण मठ के १५ वें और दूधाधारी मठ रायपुर के ९ वें महंत हैं। वे जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत ग्राम पिहरीद के श्री टंकेश्वर प्रसाद त्रिवेदी और श्रीमती सावित्री देवी के पुत्ररत्न के रूप में ६.६.१९६६ को जन्में। प्राथमिक शिक्षा उन्होंने शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय मालखरौदा से प्राप्त की और उच्च शिक्षा के लिए रायपुर के श्रीदूधाधारी संस्कृत महाविद्यालय आ गये। यहां से उन्होंने एम. ए. क्लासिक्स एवं आचार्य की उपाधि प्राप्त की। युवा, उर्जावान, ओजस्वी व्यक्तित्व के धनी राजेश्री महंत रामसुन्दरदास जी अपने गुरू स्व. राजेश्री वैष्णवदास के अधूरे कार्यो को पूरा करने, शिवरीनारायण को पर्यटक और व्यापारिक स्थल के रूप में विकसित करने के लिए कृत संकल्पित हैं। उन्होंने जन कल्याण के लिए अनेक कार्यक्रम शुरू किये हैं जिनमें निम्नलिखित प्रमुख हैं :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; जूना बिलासपुर में एक सर्व सुविधायुक्त भवन महंत लालदास की स्मृति में ''शिवरीनारायण भवन'' का निर्माण कराया।&lt;br /&gt; शिवरीनारायण मंदिर का भव्य प्रवेश द्वार का निर्माण कराया।&lt;br /&gt; साधनहीन छात्र-छात्राओं को शिक्षा, आवास और छात्रवृि&gt;श उपलब्ध कराया जा रहा है।&lt;br /&gt; शिवरीनारायण में ''महंत लालदास कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय'' की स्थापना करायी जिसका लोकार्पण १६ अगस्त सन् २००० को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह और स्वामी स्वरूपानंद जी  ने   किया।&lt;br /&gt; दर्शनार्थियों और पर्यटकों के लिए शिवरीनारायण में एक सर्व सुविधायुक्त भवन का निर्माण कराया गया है।&lt;br /&gt; शिवरीनारायण मठ के जीर्ण शीर्ण भवनों का जीर्णोद्धार कराकर सत्संग भवन और संत निवास का निर्माण कराया गया है।&lt;br /&gt; रायपुर में पेयजल व्यवस्था के लिए दूधाधारी मठ के समीप रावणभाठा में पम्प हाउस निर्माण के लिए २७ एकड़ भूमि प्रदान की है।&lt;br /&gt; कारगिल युद्ध, लातूर और राजस्थान में भूकम्प और उड़ीसा के विनाशकारी तूफान जैसे राष्ट्रीय संकटों में मठ अपनी सहभागिता, समर्पण और सहयोग की भूमिका निभाता रहा है।&lt;br /&gt; राजेश्री महंत रामसुन्दरदास जी के ही सद्प्रयास से शिवरीनाराण को पर्यटन नक्शे में लाने के ध्येय से ''टेम्पल सीटी''  की घोषणा की गयी है और उप तहसील बनाया गया है।&lt;br /&gt; नेत्र शिविर, रामलीला, कृष्णलीला, प्रवचन, सत्संग और यज्ञादि धार्मिक कार्य मठ प्रबंधन द्वारा सम्पन्न कराये जाने हेतु कृत संकल्पित है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्तमान में मठ प्रबंधन के लिए बनायी गयी पब्लिक ट्रस्ट के निम्नलिखित सदस्य हैं :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१. राजेश्री महंत रामसुन्दरदास, चेयरमेन ट्रस्टी&lt;br /&gt;२. श्री जे. एन. ठाकुर, सचिव&lt;br /&gt;३. श्री नरेन्द्र कुमार मिश्रा, सदस्य&lt;br /&gt;४. श्री ललित सुरजन, सदस्य&lt;br /&gt;५. श्री लक्ष्मण प्रसाद मिश्रा, सदस्य&lt;br /&gt;६. श्री भगवान सिंह ठाकुर, सदस्य&lt;br /&gt;७. डॉ. अशोक शर्मा, सदस्य&lt;br /&gt;८. श्री महेशचंद्र गुप्ता, सदस्य&lt;br /&gt;९. श्री ब्रिजे श कुमार के शरवानी, सदस्य&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-1863979588533182793?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_830.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-5837646419993184175</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:12:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:12:31.804-08:00</atom:updated><title>गादी चौरा पूजा</title><description>छत्तीसगढ़ का सांस्कृतिक तीर्थ शिवरीनारायण प्राचीन काल में दक्षिणापथ और जगन्नाथ पुरी जाने का मार्ग था। लोग इसी मार्ग से जगन्नाथ पुरी और दक्षिण दि शा में तीर्थ यात्रा करने जाते थे। उस समय यहां नाथ संप्रदाय के तांत्रिक रहते थे और यात्रियों को लूटा करते थे। एक बार आदि गुरू दयाराम दास तीर्थाटन के लिए ग्वालियर से रत्नपुर आए। उनकी विद्वता से रत्नपुर के राजा बहुत प्रभावित हुए और उन्हें अपना गुरू बनाकर अपने राज्य में रहने के लिए निवेदन किया। रत्नपुर के राजा  शिवरीनारायण में तांत्रिकों के प्रभाव और लूटमार से परिचित थे। उन्होंने स्वामी दयाराम दास से तांत्रिकों से मुक्ति दिलाने का अनुरोध किया। आदि स्वामी दयाराम दास जी शिवरीनारायण गये। वहां उन्हें भी तांत्रिकों ने लूटने का प्रयास किया मगर वे सफल नहीं हुए, उनकी तांत्रिक सिद्धि स्वामी जी के उपर काम नहीं की। तांत्रिकों ने स्वामी दयाराम दास को भाशस्त्रार्थ करने के लिए आमंत्रित किया जिसे उन्होंने सहर्श स्वीकार कर लिया और फिर दोनों के बीच भाशस्त्रार्थ हुआ जिसमें तांत्रिकों की पराजय हुई और जमीन के भीतर एक चूहे के बिल में प्रवे श कर अपनी जान की भीख मांगने लगे। स्वामी जी ने उन्हें जमीन के भीतर ही रहने की आज्ञा दी और उनकी तांत्रिक प्रभाव की भाशंति के लिए प्रतिवर्श माघ शुक्ल त्रयोदस और विजयाद शमी (द शहरा) को पूजन और हवन करने का विधान बनाया। आज भी शिवरीनारायण में भाबरीनारायण मंदिर परिसर में दक्षिण द्वार के पास स्थित एक गुफानुमा मंदिर में नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिक गुरू कनफड़ा और नगफड़ा बाबा की पगड़ी धारी मूर्ति स्थित है। साथ ही बस्ती के बाहर एक नाथ गुफा भी है। शिवरीनारायण में ९वीं भाताब्दी में निर्मित और नाथ सम्प्रदाय के कब्जे में बरसों से रहे मठ में वैश्णव परंपरा की नींव डाली। शिवरीनारायण के इस मठ के स्वामी दयाराम दास पहले महंत हुए। तब से आज तक १४ महंत हो चुके हैं और १५ वें महंत राजेश्री रामसुंदरदास जी वर्तमान में हैं। इस मठ के महंत रामानंदी सम्प्रदाय के हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस स्थान में दोनों के बीच भाशस्त्रार्थ हुआ था वहां पर एक चबुतरा और छतरी बनवा गया। बरसों से प्रचलित इस पूजन परंपरा को ''गादी पूजा'' कहा गया। क्योंकि पूजन और हवन के बाद महंत उसके उपर विराजमान होते हैं और नागरिक गणों द्वारा गादी पर विराजित होने पर महंत को श्री फल और भेंट देकर उनका सम्मान किया जाता है। इस परंपरा के बारे में कोई लिखित दस्तावेज नहीं है मगर महंती सौंपते समय उन्हें मठ की परंपराओं के बारे में जो गुरू मंत्र दिया जाता है उनमें यह भी भाशमिल होता है। इस मठ में जितने भी महंत हुए सबने इस परंपरा का बखूबी निर्वाह किया है। इस मठ में अब तक १५ महंतों के नाम इस प्रकार है- १. स्वामी दयाराम दास, २. स्वामी कल्याण दास, ३. महंत हरिदास ४. महंत बालक दास, ५. महंत महादास, ६. महंत मोहनदास, ७. महंत सूरतदास, ८. महंत मथुरा दास, ९. महंत प्रेमदास, १०. महंत तुलसीदास, ११. महंत अर्जुनदास, १२. महंत गौतमदास, १३. महंत लालदास १४. राजेश्री महंत वैश्णवदास और १५वें महंत राजेश्री रामसुंदरदास ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिवरीनारायण के मठ को महानदी के पार स्थित एक छोटे से ग्राम बलौदा ने चार महंत दिये हैं। बलौदा से पहले महंत के रूप में महंत अर्जुनदास जी, दूसरे महंत के रूप में महंत गौतमदास जी, तीसरे महंत के रूप में महंत लालदास जी और चौथे महंत के रूप में महंत दामोदरदास जी मिले हैं।         श्री दामोदरदास जी की असामयिक निधन होने के कारण वे यहां की महंती नहीं सम्हाल सके और महंत लालदास जी ने श्री वैश्णवदास जी को अपना चेला बनाकर इस मठ की महंती सौंपी। आगे चलकर उन्हें रायपुर के दूधाधारी मठ के महंत का भी दायित्व सौंपा गया। इस मठ में आज तक गुरू-चेला की परंपरा है जिसका निर्वाह इस मठ के महंतों द्वारा की जा रही है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-5837646419993184175?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_5856.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-5570145488727514747</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:11:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:11:57.251-08:00</atom:updated><title>रोहिणी कुंड</title><description>शिवरीनारायण में भगवान भाबरीनारायण के चरण के नीचे एक कुंड को ही ''रोहिणी कुंड'' कहते हैं। आठों काल और बारहों मास इसमें हमे शा जल भरा रहता है। इसके द र्शन करने और इसके जल के आचमन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, ऐसी मान्यता है। प्राचीन भाबरीनारायण माहात्म्य में इस कंुड में स्नान करने की बात का उल्लेख है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में यह तालाब सदृ य रहा होगा और इसमें द र्शनार्थीगण स्नान करते रहे होंगे ? और भगवान नारायण जब यहां ' शबरीनारायण' के रूप गुप्त रूप से विराजमान हुए तब मंदिर निर्माण कराते समय इसे एक कुंड का रूप प्रदान कर दिया गया होगा ? भाबरीनारायण मंदिर का चबुतरा १०० ग १०० मीटर का है। अर्थात् जब किसी जलस्रोत को १०० मीटर दूर से बांधना पड़ा होगा। मंदिर परिसर में माखन साव के परिवारजनों द्वारा निर्मित एक कुंआ है। इस कुएं का जल निर्मल और स्वादिश्ट है और इसका जल स्तर कभी कम नहीं होता। एक समय था जब पूरे नगर में जल आपूर्ति इस कुएं से होती थी। इससे भाबरीनारायण माहात्म्य में उल्लेखित तथ्यों की पुश्टि होती है। आज भी रोहिणी कुंड भगवान भाबरीनारायण के चरण को स्प र्श करती हुई स्थित है। पंडित मालिकराम भोगहा कृत श्री शिवरीनारायण माहात्म्य के दूसरे अध्याय के १३४-१३५ वें भलोक का अनुवाद भोगहा जी ने इस प्रकार किया है :-&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;वह नारायण क्षेत्र में रहौं नित्य करि प्रेम&lt;br /&gt;जब जब दानव दलन करि हरै जगत के छेम&lt;br /&gt;करि सेवा वहि क्षेत्र की लहि बल निश्चर जीति&lt;br /&gt;याते रोहिणी कुंड हम करी प्रगट यहि रीति।।२/१३४-१३५।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस कुंड की महिमा अनुपम है। इस कुंड के जल को स्प र्श करने और आचमन करने से मोक्ष मिलता है। इसी अध्याय के १३६-१३७ वें भलोक के अनुवाद में भोगहा जी ने लिखा है :-&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;रोहिणि कुंडहि स्पर्श करि न्हाइ उत्पला नीर&lt;br /&gt;योग भ्रश्ट योगी मुकति पावत धोइ शरीर।।&lt;br /&gt;उत्पलेश आरंभ हो चित्रेश्वरी प्रयंत&lt;br /&gt;चित्रोत्पला सुजानिये नासै पाप अनंत।।२/१३६-१३७।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थात् इसलिये रोहिणी कुंड के जल को जो कोई स्पर्श कर चित्रोत्पला नदी के जल में स्नान करेगा, योग भ्रश्ट योगी भी मुक्ति पावेंगे। अब यह बताते हैं कि चित्रोत्पला गंगा कहां से कहां तक माननी चाहिये। उत्पलेश महादेव राजीव लोचन में महानदी और पैरी के संगम में है जो अब कुलेश्वर नाम से प्रख्यात् है, वहां से चित्रा महेश्वरी अर्थात् चंद्रसेनी चंद्रपुर तक मानना चाहिये। जो अनंत पाप के नासने वाली है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोहिणी कुंड की महिमा अनंत है। कहा भी गया है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोहिणी कुण्ड मासाद्य स्थित: सेव्य: सदा सुरै:&lt;br /&gt;तस्य दर्शनं मात्रेण मुच्यते पातकैर्नरा:। २/१४४।&lt;br /&gt;अनुवाद&lt;br /&gt;रोहणि कुंडहि आइ करि सेवत सुर गण नित&lt;br /&gt;तासु दरस ही मात्र से नासत पाप अमित।।&lt;br /&gt;भावार्थ&lt;br /&gt;...और रोहिणी कुंड में देवतागण आकर चरणामृत सदा सेवन किया करते हैं। तुम्हारे हमारे अनंत पाप उसके दरशन ही से क्यों न छूट जावेगा, इसलिये हम सबको चाहिये कि जब तक जीयें, रोहिणी कुंड के दरसन करें, उसके जल का चरणामृत ग्रहण करें और चित्रोत्पला नदी में नित्य स्नान किया करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भोगहा जी भी गाते हैं :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोमश से जेहि विधि सुनी कहे सूत तिमि मोहि&lt;br /&gt;वही आपसों हम कहे कृपा सु मोपर होहि&lt;br /&gt;महिमा रोहणि कुंड की दुर्ल्लभ मैं कहि दीन&lt;br /&gt;यातें नारायण पुरी सदा मोक्ष आधीन।। ३/४७-४८।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी तो श्री बरणत सिंह चौहान ने रोहिणी कुंड को एक धाम माना है। वे गाते हैं :-&lt;br /&gt;                 &lt;br /&gt;रोहिणी कंुड एक धाम है, है अमृत का नीर&lt;br /&gt;बंदरी से नारी भई, कंचन भयो भारीर।&lt;br /&gt;जो कोई नर जाइके, दर शन करे वही धाम&lt;br /&gt;बटुक सिंह दर शन करी, पाये परम पद निर्वाण।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्कंद पुराण में इस उत्तम तीर्थ को 'श्री क्षेत्र' और 'श्री नारायण क्षेत्र' कहा गया है। यहां आज भी भगवान श्री विश्णु के अन्यान्य रूप विराजमान हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां उनका गुप्तवास है। प्रतिवर्श माघ पूर्णिमा को केवल दिन वे यहां भगवान जगन्नाथ के रूप में प्रकट होते हैं। इस दिन उनका द र्शन मोक्षदायी होता है। हजारों-लाखों श्रद्धालु द र्शनार्थी जमीन में लोट मारते यहां उनके द र्शन करने आते हैं। श्री नारायण क्षेत्र की महिमा भोगहा जी गाते अघाते नहीं हैं :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह धाम नारायण कलाश्रित परम पावन जानिये&lt;br /&gt;हे राम रोहनि कुण्ड निर्म्मल देखकर सुख मानिये&lt;br /&gt;चित्रोत्पला गंगा सुधा सम जल वहां नित प्रतिबहे&lt;br /&gt;करि स्नान सुन्दर कुंड में जन भुक्ति मुक्ति तहां लहे।।            &lt;br /&gt;भावार्थ&lt;br /&gt;वह धाम नारायण के कलाश्रित होने के कारण परम पावन है। हे राम ! वहां रोहिणी कुंड के निर्म्मल जल को देखकर आप अत्यंत सुख मानेंगे चित्रोत्पला गंगा में अमृत समान जल की धारा निरंतर निर्मल बहा करती है। वहां स्नान कर रोहिणी कुंड के चरणामृत लेने से मनुष्य गणों को भुक्ति मुक्ति मिलती है। ५/८२-८३।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;           &lt;br /&gt;यह नारायण क्षेत्र की महिमा अति अद्भूत&lt;br /&gt;सुनहि जे सादर पे्रमयुत, तिन्ह न छुवै यमदूत।&lt;br /&gt;जे नारायण क्षेत्र में करै वास नर नारि&lt;br /&gt;जीवन्मुक्त सुधन्य वह होय प्रसन्न मुरारि।।&lt;br /&gt;          &lt;br /&gt;  भावार्थ&lt;br /&gt;यह नारायण क्षेत्र की महिमा परम अद्भूत है। जो कोई सादर इसे चि&gt;श देकर सुनेगा, उसको यमदूत कदापि छू नहीं सकेंगे। जो कोई स्त्री वा पुरूष इस नारायण क्षेत्र में वास करेेंगे, उन्हें जीवन्मुक्त और धन्य २ कहना चाहिये। ५/१११-११२।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोहिणी कुंड को प्रकट करने कथा और उसकी महिमा को पंडित हीराराम त्रिपाठी ने भाबरीनारायण माहात्म्य में याज्ञवलक्य संहिता से उद्धृत किया है-।। सूतउवाच ।। एकाग्रचि&gt;श होकर सुनिये। तीर्थ की कथा अति पावन है। इसके श्रवण से प्राणी क्षणमात्र में पापराशि से मुक्त हो जाता है। ये उ&gt;शम फल देने हारे तीर्थस्थान इस लोक के और दैवलोक के प्राणियों को दुर्लभ हैं। इन तीर्थन में आश्रीभूत आठौंगण देवतागण और मुनिगण रहते हैं। श्रीनारायणपुर क्षेत्र चित्रोत्पला नदी के तट आसाद्यनाम कलिंगभूमि के निकट साक्षात् धर्म्म रूप भूमि है। इस स्थान का दर्शन, स्मरण और वास पुण्यफल दाता है। इस भूमि की सेवा से अर्थात् इसमें वास करने से जगन्नाथ परमात्मा प्रसन्न रहते हैं। हे मुनि आप जो ब्रह्म वर्णन करने हारे हैं सो सब नारायण क्षेत्र को सेवन करे, अर्थात् वहां वास करें एवं इतरलोग जो वास करें तो उन्हें भी दुर्लभ ब्रह्म पद लभ्य होवे। आगे कहते हैं-नारायण क्षेत्र को साक्षात् भगवद्धाम जानिये, वह नारायण का कला रूप है। इस क्षेत्र का आदि नाम विष्णुपुरी, द्वितीय नाम रामपुर, त्रितीय नाम बैकुंठपुर और चतुर्थ नाम नारायणपुर युगानुक्रम से जानिये। यहां चित्रोत्पला नदी के तट पुण्य रूपी कानन मंडित सिंदूर नामक पर्वत के निकट साक्षात् अविनाशी श्री नारायण रोहिणी कुंड के उपर विराजमान हैं। श्री नारायण भक्तजनों के वांछित फलदाता सदा काल तीष्ट हैं। लक्ष्मीपति श्रीनारायण पीताम्बर धारण किये सर्व सृष्टिर्कत्‍ताकुंडल झलमलित, प्रकाशमान बदन, किरीट मुकुट धारण किये, श्यामघटा तुल्य वर्ण, कड़ा कंकण भूषित, कौस्तुभमणि, वक्षस्थल प्रकाशमान, वनमाला उर लसित, शंख, चक्र, गदा, पद्म से अलंकृत, कर में पंकज लिये, पीत वस्त्र सहित उ&gt;शरीय विराजमान हैं। पीताम्बर इस भांति शोभा देता है जैसे कि श्यामल घटा में बिजली चमकती हो ? श्रेष्ठ पार्षदगण चमर पंखा लेकर सेवन कर रहे हैं। सन्मुख में गरूड़जी हाथ जोड़े निरंतर स्तुति करते हैं एवं अनेकानेक मुनीश्वर स्तुति में मग्न हैं। इस भांति सर्वश्रेष्ठ विश्व व्यापी विष्णु लक्ष्मीजी सहित सकल सुखदाता सुरेश्वर नारायणपुर क्षेत्र में विराजमान हैं। रोहिणी कुंड पर सुर असुर सब उनकी सेवा करते हैं। तिनके दर्शन मात्र से सर्व पाप मोचन होते हैं। चित्रोत्पला में स्नान कर रोहिणी कुंड का स्पर्श करते ही महा पातकी भी मुक्ति पाते हैं और जो गति योगीगणों को मिलना कठिन है, ताको प्राप्त होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऋशियों के पूछने पर महाविश्णु ने कहा-''हे इन्द्रादि देवगण और हे ऋषियों ! सुनो ! मैं रामनाम धारणकर रघुवंश में में नररूप हो प्रगट होऊँगा तब तुम्हारे दु:खों को हरूंगा। तुम सब जाओ और मेरी आज्ञानुसार महाउ&gt;शम नारायण क्षेत्र में वास करो। एकाग्रचि&gt;श होकर एक सहस्र वर्ष तक वहां विष्णु के महामंत्र से जप और यज्ञ करेश। तब हे देवगण मैं प्रसन्न होकर शरीर धारणकर प्रगट हो तुम्हें उपदेश करूंगा जिससे तुम्हारे शत्रु का विनाश होगा। इस भांति ब्रह्मवाणी श्रवणकर ब्रह्मादि सुर सिंदूरगिरि के निकट चित्रोत्पला नदी के तट पुण्यमय कानन परम रम्य शोभायमान नारायण क्षेत्र में गये और मन को जीतकर श्रीहरि का जप यज्ञ करने लगे। सहस्रवर्ष पूर्ण होने पर भक्तवत्सल श्री भगवान अपने पार्षद सहित प्रगट भये। तिन्हें ब्रह्मादि सब देवता देखत भये। तब नीलवर्ण श्यामघटा छवि, पीताम्बर और किरीट मुकुट आदि आभूषण धारण किये, शंख, चक्र, गदा, पद्म चारिभुज आयुध सहित प्रसन्न वदन भगवान बोलत भये:- ''बरम्ब्रुहि २ `` तब देवताओं ने स्तुति आरंभ की जिसे श्रवणकर कमलाक्ष अर्थात् कमल नेत्र भगवान बोलत भये। हे देवगण मैं अपअंश चतुरात्मा चारू स्वरूप धारणकर अयोध्यापुरी के मध्य रघुवंश में जन्म धारणकर प्रगट होऊंगा। कौशल्या मेरी माता और महात्मा दशरथ पिता होंगे। मेरा नाम राम होगा। भेष धनुर्धारी, लोक पावन मर्यादा और पुरूषो&gt;शम लीला से मैं विख्यात् होऊंगा। सो हे देवगण मेरे रावण के वध करने तक तुम मेरी सेना निमि&gt;श अपने २ अंश धर बानर रूप धरकर पृथ्वी में रहो। हे देवगण यह नारायण क्षेत्र अमल और सृष्टि की आदि से मेरा धाम है। यहां तुम्हारे जप यज्ञ करने से पूर्व पुष्टि मेरा तन भया। याहि से मैं बलवान भया और अब मैं महा २ असुरन को बध करूंगा। जब विष्णु भगवान ऐसा वरदान दे चुके तब सब देवगणों ने अर्ध्य पदार्थ उदक सहित वेदमंत्रों से उनका पूजन किया। नंतर महाविष्णु बोलत भये :- हे देवगण ! सुनो मुझको जो तुमने पदार्थ उदक दिया है तिस कारण तुम्हारे दिये हुये पदार्थ उदक से इस नारायण क्षेत्र में गंगाकद तीर्थ रूपी कुंड बहुकाल पर्यन्त रहेगा और कुंड के उपर मेरी आद्यनारायण प्रतिमा रहे्रगी। जब जब तुम दानव द्वारा निर्बल होओगे और इस स्थान में वासकर नारायण की सेवा करोगे, तब तब तुम महाअसुरों को विजय करोगे। इस कुंड को रोहिणी कुंड मैं प्रख्यात् किया है। चित्रोत्पला गंगा में स्नानकर रोहिणीकुण्ड के स्पर्श से अनेक जन्मान्तरों के पाप नाश होकर जो गति योगीजनों को दुर्लभ है सो प्राप्त होगी। उत्पलेश्वर नाम शंकर के स्थान से महानदी प्रगट भई है। वहां से चित्रामाहेश्वरी देवी परर्यन्त उसका चित्रोत्पलागंगा नाम भया है। यह चित्रोत्पला सर्व पाप की नाश करने हारी साक्षात् गंगा है। त्रेतायुग में रामनाम से प्रगट होकर मैं इस स्थान में आऊंगा। तब सीता का खोज लगाते समय मैं अपने अनुज लक्ष्मणजी सहित दर्शानाकांक्षी मुनिमण्डल सहित तुम्हें दर्शन दे इसी स्थान में नम्रबुद्धि शबरी को वरदान दूंगा। और तब इस नारायण क्षेत्र को स्पर्शकर मुनि लोगन से आशीर्वाद प्राप्तकर लंका में जाकर बड़े २ राक्षसों का वध करूंगा। देवतागणों को ऐसा उपाय बताकर और वरदान देकर अविनाशी पुरूष श्रीमन्नारायण अंतर्धान हो जात भये। तब सब देवतागणों ने श्रीमन्नारायण क्षेत्र में वास किया।। वादरायणरूवाच ।। व्यासजी वशिष्ठ जी से कहते भये। इस भांति यह नारायण क्षेत्र उ&gt;शम तीर्थ है- तहां सब देवों के देव नारायण का वास है। जिन्हें सब देवासुर सेवन करते हैं, उनके दर्शन से अवश्यकर नर पातकों से मोचन हो जात हैं। यह तीर्थ जिस भांति नारायण क्षेत्र कहाया और जिस भांति कुण्ड का नाम ''रोहिणी कुण्ड`` भया सो कथा मैंने आपसे कही। अब इसकी ललित कीर्ति के चरित्र श्रवण करने का फल श्रवण कीजिये। इस कीर्ति को एकचि&gt;श होकर श्रवण करने से रघुपति पद भक्ति प्राप्त होगी और सकल सुख, समृद्धि, पुत्र-पौत्रादि अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष लभ्य होंगे। सम्पूर्ण पातक नाश होकर संसार में विपुल कीर्ति प्राप्त होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंडित मालिकराम भोगहा रोहिणी कुंड की महिमा गाते हैं :-&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;      कुंड रोहिणी की महिमा का कहों सुभग सज्जन प्यारे&lt;br /&gt;      तीन लोक चौदहों भुवन यश गावत हैं सब संसारे।&lt;br /&gt;      देखो जहां वहां जल पत्थर पत्र पुष्प फल फूल वही&lt;br /&gt;      एक भावना भक्त बनावे प्रीति रीति रस रीति चही।&lt;br /&gt;      जोग ध्यान जप तप व्रत पूजा बिना प्रेम कुछ सफल नहीं&lt;br /&gt;      बिना लोक व्यंजन इव कहिये मालिक सीठे स्वाद सही।&lt;br /&gt;      कुंड रोहिणी चरण कमल तर गिरधारी गिरिवर धरणम्&lt;br /&gt;      तुंड चखि शबरी की बदरी नामर धंगी वद करणम्&lt;br /&gt;      लाल बने नयनार विंद भज देहु नाथ सुंदर वरणम्&lt;br /&gt;      जय सुंदरगिरि राज शबरीनारायण तारं तरणम् ।। १ ।।&lt;br /&gt;      जय आसन पंपा के संगम बहत नीर वल्ली तरणम्&lt;br /&gt;      रहे पुष्प छाया तर शीतल बंधु सहित आसन करणम्&lt;br /&gt;      त्रभ्ंशृशाप किन्नर की गति औ पापो मोक्ष वधू वरणम्&lt;br /&gt;      जय सुंदरगिरि राजे शबरीनारायण तारं तरणम् ।। २ ।।&lt;br /&gt;      गौतम नारि शिला तें तरिगे इन्द्रशाप मोचन करणम्&lt;br /&gt;      भई पार मनिका अघधारी अजामील सुर पुर करणम्&lt;br /&gt;      मैं अधीन भवजाल फंद भ्रम अहोनाथ चित में धरणम्&lt;br /&gt;      जय सुंदरगिरि राजे शबरी नारायण तारं तरणम् ।। ३ ।।&lt;br /&gt;      बुद्धिहीन सेवा बलनाही राम हृदय नहि मुख वरणम्&lt;br /&gt;      तीरथ पैज नहीं या तन में करूणा सिंधु दया करणम्&lt;br /&gt;      पतित हंस पावन कर स्वामी पार ब्रह्म चितयो धरणम्&lt;br /&gt;      जय सुन्दर गिरि राजे शबरीनारायण तारं तरणम् ।। ४ ।।&lt;br /&gt;      श्याम रूप लीला तब अवगत जलशायी सुंदर करणम्&lt;br /&gt;      विश्व रूप रमणी रस रंगी जय मुकुंद राधा वरणम्&lt;br /&gt;      कलापवंत मन बोध भजें जय दीनबंधु रास्यो करणम्&lt;br /&gt;      जय सुंदरगिरि राजे शबरीनारायण तारं तरणम् ।। ५ ।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;।। याज्ञवल्क्य उवाच ।। हे विप्र ! एकाग्रचि&gt;श होकर श्रवण कीजिये। इस पुण्यदाता आख्यान के सुनने से पातकी नरों को भी मुक्ति प्राप्त हो जाती है। मैं आपसे क्रम से रोहिणी कुण्ड का माहात्म्य वर्णन करता हूं। पूर्व में बंगाल देशाधिपति क्षत्री कुलभूषण धनुर्विद्या परायण ब्रह्म पालक और पुण्यात्मा एक धर्म्मवान राजा भया। उसकी रानी विशाल नेत्रों वाली विनता नाम्नी भई। सो राजा अपनी विख्यात् चंद्रिका नगरी नाम रम्य राजधानी में रहकर चतुरंग सेना सहित धर्म पूर्वक पृथ्वी पालन करता भया। एक समय जब पति पत्नी का एकांत भया। अर्थात् रममाण राजा मणिमय रचित महल के बीच अपनी राजी के पलंग पर बैठत भया और रानी के मस्तक पर हाथ फेरा तब रानी के सिर में खोपड़ी न देखकर राजा चकित होकर बोला कि हे रानी ! यह क्या है ? तब पूर्व के वृ&gt;शांत की ज्ञाता रानी बोलती भई। हे राजन ! अब कुछ पूर्व का वृ&gt;शांत सुनिये। पूर्व जन्म में मैं बानरी योनि में उत्पन्न थी। बानरों के साथ सिंदूरगिरि के निकट रम्य कानन में फिरती रही। एक समय रामनगर अर्थात् शुभ नारायण क्षेत्र में रोहिणी कुण्ड के समीप बांस भिरों में बानरन सहित कूद २ के क्रीडा करती रही। उस अवसर पर मैं बांस की डगाली से खिसल पड़ी तब मेरी खोपड़ी में एक बांस का कांटा छितजात भया। उस बांस कंटक में मेरी उपर की खोपरी रहजात भई और मैं गिर पड़ी। अस्थि सहित मेरा शरीर कमल कुमुदिनी आदि फूलों से मंडित रोहिणी कुण्ड में गिरकर गल जात भया। इस भांति मेरे अनेक जन्मों के पातक उस कुंड के प्रभाव से नष्ट हो जात भये और पुण्योदय होकर मैंने राजपुत्री का जन्म पाया। मेरी आधी खोपड़ी बांस कंटक में पोही हुई उसी स्थान पर अबलों लटकती है। या भांति मैं पूर्व जन्म की बानरी अब आपकी पटरानी भई हूं और आपके साथ राज भोगती हूं। पति सहित इस लोक देवेन्द्र भवन में सुख भोगकर पश्चात् मैं आप सहित बैकुंठ पाऊंगी। रानी से ये वचन सुनकर राजा आश्चर्य चकित होकर बोलत भये- प्रभात समय मैं तेरे सहित नारायण क्षेत्र चलूंगा। वहां तुम मुझे यह दिखाना कि कहां रोहिणी कुंड है और कहां तेरी आधी खोपड़ी है। ऐसा निश्चयकर प्रभात ही राजा ने सैन्य और रानी सहित नारायण क्षेत्र को कूच किया। कुछ दिन चलने के पश्चात् वहां पहुंचे। चित्रोत्पला गंगा में स्नान किये और रानी के संकेत पर रोहिणी कुंड को जानते भये। वहीं पर बांसों में आधी खोपड़ी की अस्थि राजा खोजते भये। निदान एक बांस के भिरे में कांटों पर छिदे हुये खोपड़ी के श्वेत अस्थि राजा को दृष्टि पड़े। राजा ने उन्हें अपने धनुष से रोहिणी कुंड में गिराये। कुंड में पड़ने के क्षणमात्र ही नंतर रानी के शीस पर अस्थि पूर्ण हो गई। इसे देख राजा अचंभित भये। उस तीर्थ को परमो&gt;शम ठहराया और उस शुभ पुण्यमय रामपुर नाम क्षेत्र में वासकर वहां भगवत्धाम को मणिमय भयो और तत्क्षण अनेक मुनिगण सहित यज्ञ आरंभ कर दियो और उसे भक्ति पूर्वक संपूर्ण करके विपुल दक्षिणा अर्पण की। तब प्रसन्न होकर श्रीमन्नारायण प्रगट भये। श्रेष्ठ राजा ने स्तुति की। भगवान के वाम अंग मंे साक्षात् लक्ष्मीजी सहित मुखारबिंद, मकराकृत कुंडल, किरीट मुकुट सहित घनश्याम कलेवर पीतांबर धारण और निज आयुध सहित, चतुर्भुज रूप देख राजा ने प्रणाम कियो और विधिवत पूजा और स्तुति करी ।    ।। राजोवाच।। हे महाराज ! आपके दर्शन पाते ही मैं धन्य भया हूं। आपके दर्शन ने मुझे कृतकृत्य किया। अब मुझे यही वर दीजिये कि जन्म जन्म में आपके पदारविन्दों में मेरी भक्ति हो। यह सुन भगवान एवमस्तु कहत भये। और कहा मेरी उपासना से तू कल्मष रहित इस लोक का सुख भोगकर अन्त में देवेन्द्र भवन देवाधिदेव भवन में स्थान पावेगा। हे राजा ! यह नारायण तीर्थ परम पावन है, इसे तू साक्षात् भगवत्धाम जान। यह नारायण का कलारूप है। जब जब धर्म्म में ग्लानि होती है और राक्षसों के अधर्म्म से पृथ्वी को भार होता है तब तब दैत्यों के भंजनार्थ और भूभार निवारणार्थ मैं रूप धारण करता हूं। रामावतार के समय अर्थात् जब मैं रघुकुल में नर स्वरूप रामरूप धारणकर अवतार लंूगा तब अनुज लक्ष्मण सहित इस तीर्थ को आऊंगा।। राजा को इस भांति प्रसादितकर भगवान अंतर्धान हो जात भये। तबसे उस बंगदेशाधिपति ने भगवत्भाव भावना सहित कई सहस्रवर्ष धर्माचरण से राज्य सुख भोगा। या भांति नारायणपुर में सेवकन सहित वासकर शरीरसुख भोगने उपरान्त वह राजा सपत्नीक देवतों की भांति दिव्य विमान में आरूढ़ होकर अप्सरागण क्षत्र चामर दिव्य अलंकार गंधादि युक्त इन्द्र के भुवन में जात भया। इन्द्र ने बड़े आवभाव से पूजा की। नन्तर राजा दुर्लभ मुक्ति को प्राप्त भया।। या प्रकार हे मुनीश्वर ! रोहिणीकुण्ड को अत्यद्भुत माहात्म्य मैंने आपके प्रति वर्णन कियो। सो यह नारायण क्षेत्र सर्वदा प्राणियों को मुक्तिदायक जानिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दंडकारण्य जाते श्रीराम को ऋशि मुनियों ने कहा।। ऋषिरूवाच ।। हे राम ! श्रवण कीजिये। यहां राम भक्ति परायण शिवरी को वास है सो आप जाकर वाके आश्रम को पावन कीजिये। यह धाम नारायण कलाश्रित अति पावन है। अमल रोहिणीकुण्ड भी यहीं पर है, स्नानकर या शुभकुंड को जल मस्तिष्क में सिंचन करने से भुक्ति मुक्ति होती है। हे दीर्घबाहु ! अब चित्रोत्पलागंगा के अमृततुल्य निर्मल जल में स्नानकर रावणादि राक्षसों का बध कीजिये। हे विशाल बाहु राम ! या चित्रोत्पला के उ&gt;शर तट जो अति पवित्र उच्चभूमि है, सो सिंदूरगिरि नाम से विख्यात् है। पूर्व समय में या स्थान में जब गणेशजी ने सिंदूर निपातन कियो तब से ही याको नाम ''सिंदूरगिरि'` भयो है। सो हे रघुवंश शिरोमणि ! आप याकी प्रदक्षिणा कीजिये यासें आपको भय शोक विनाश होकर यश कीर्ति बढ़ेगो। ये सब बातें श्रवणकर राम ने मुनि को प्रणामकर तद् कथनानुसार र्व&gt;शाव कियो। मुनिनन से आशीर्वाद पाकर श्रीयुत् रामलक्ष्मण शिबरी के गृह गये। भक्ति परिपूर्ण शिवरी ने भ्राता सहित श्रीराम की पूजा और स्तुति करी और हर्ष से गद्गद होकर साष्टांग नमस्कार कर बोली। आइये ! हे प्रलम्बबाहु राम ! मेरी दीन कुटी को पावन कीजिये। कमल लोचन श्रीराम ने भक्तिभाव देखके भिल्लिनी शिवरी को आतिथ्य अंगीकार कियो। पहुनाई कर वाके फल फूल ग्रहण किये और वाकी भक्ति से प्रसन्न होकर कह्यो कि हे शबरी ! वरदान मांग ।। शवरर्युवाच  ।। शबरी कहती भई। हे राम ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो एक वरदान हेतु याचना करती हूं, सो दीजिये। अर्थात् लोक में मेरे नाम सहित आपका नाम विख्यात् हो। शिवरीनारायण ऐसा नाम इस तीर्थ का होवे। नन्तर शिवरी ने कहा हे भूपाल ! अब मेरे अर्थ चिता रचिये। हे कमलनयन मेरे पंचात्मक देह को दग्धकर अब मैं आपके भवन का वास करूंगी। ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव नाम बानरों का राजा रहता है। यह सुग्रीव अपनो बानर और भालुदल लेकर आपको अर्थ सम्पादन करोगो। तब चारि पदार्थ के देने हारे भक्तवत्सल महाराज रामचंद्र एवमस्तु कहते भये। वाही दिवस से या क्षेत्र को नाम शिवरीनारायण भयो है और वाही नाम से यहां पुरी बसी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे पवित्र और पुण्य फलदायी क्षेत्र में कौन निवास करना नहीं चाहेगा ? मेरा परम सौभाग्य है कि यह मेरी जन्मस्थली है। पतित पावनी मोक्षदायी चित्रोत्पलागंगा का मुझे संस्कार और भगवान भाबरीनारायण का आ शीश मिला है तभी इस पवित्र ग्रंथ की रचना कर सका हूं। यहां की महत्ता कवि भी गाते अघाते नहीं हैं। कवि की एक बानगी पे श है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोहा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                        चित्रउतपला के निकट श्रीनारायण धाम।।&lt;br /&gt;                        बसत सन्त सज्जन सदा शिवरीनारायणग्राम।। १ ।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवैया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                        होत सदा हरिनाम उच्चारण रामायण नित गान करैं।&lt;br /&gt;                        अति निर्मल गंगतरंग लखै उर आनंद के अनुराग भरैं।&lt;br /&gt;                        शबरी वरदायक नाथ विलोकत जन्म अपार के पाप हरैं।&lt;br /&gt;                        जहां जीव चारू बखान बसैं सहजे भवसिंधु अपार तरैं।। १ ।।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-5570145488727514747?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_7927.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-4407224526290385347</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:10:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:11:00.798-08:00</atom:updated><title>मेला</title><description>छत्‍तीसगढ़में शिवरीनारायण के मेला का वि ोश महत्व है। क्यों कि यहां का मेला अन्य मेला की तरह बेतरतीब नहीं बल्कि पूरी तरह से व्यवस्थित होता है। दुकान की अलग अलग लाईनें होती हैं। एक लाईन फल दुकान की, दूसरी लाइन बर्तन दुकानों की, तीसरी लाइन मनिहारी दुकानों की, चौथी लाइन रजाई-गद्दों की, पांचवीं लाइन सोने-चांदी के जेवरों की होती है। इसी प्रकार एक लाईन होटलों की, एक लाइन सिनेमा-सर्कस की, एक लाइन कृशि उपकरणों, जूता-चप्पलों की दुकानें आदि होती है। इस मेले में दुकानदार अच्छी खासी कमाई कर लेता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      नगर के पि चम में महंतपारा की अमराई में और उससे लगे मैदान में माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्री तक प्रतिवर्श मेला लगता है। माघ पूर्णिमा की पूर्व रात्रि में यहां भजन-कीर्तन, रामलीला, गम्मत, और नाच-गाना करके द र्शनार्थियों का मनोरंजन किया जाता है और प्रात: तीन-चार बजे चित्रोत्पलागंगा महानदी में स्नान करके भगवान भाबरीनारायण के द र्शन के लिए लाइन लगायी जाती है। द र्शनार्थियों की लाइन मंदिर से साव घाट तक लगता था। भगवान भाबरीनारायण की आरती के बाद मंदिर का द्वार द र्शनार्थियों के लिए खोल दिया जाता है। इस दिन भगवान भाबरीनारायण का द र्शन मोक्षदायी माना गया है। ऐसी  मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ इस दिन पुरी से आकर यहां स शरीर विराजते हैं। कदाचित् इसी कारण दूर दूर से लोग यहां चित्रोत्पलागंगा-महानदी में स्नान कर भगवान भाबरीनारायण का द र्शन करने आते है। बड़ी मात्रा में लोग जमीन में ''लोट मारते'' यहां आते हैं। मंदिर के आसपास और माखन साव घाट तक ब्राह्मणों द्वारा श्री सत्यनारायण जी की कथा-पूजा कराया जाता था। रमरमिहा लोगों के द्वारा वि ोश राम नाम कीर्तन होता था। शिवरीनारायण में मेला लगने की शुरूवात कब हुई इसकी लिखित में जानकारी नहीं है लेकिन प्राचीन काल से माघी पूर्णिमा को भगवान भाबरीनारायण के द र्शन करने हजारों लोग यहां आते थे...और जहां हजारों लोगों की भीड़ हो वहां चार दुकानें अव य लग जाती है, कुछ मनोरंजन के साधन-सिनेमा, सर्कस, झूला, मौत का कुंआ, पुतरी घर आदि आ जाते हैं। यहां भी ऐसा ही हुआ होगा। लेकिन इसे मेला के रूप में व्यवस्थित रूप महंत गौतमदास जी की प्रेरणा से हुई। मेला को वर्तमान व्यवस्थित रूप प्रदान करने में महंत लालदास जी का बड़ा योगदान रहा है। उन्होंने मठ के मुख्तियार पंडित कौ शलप्रसाद तिवारी की मद्द से अमराई में सीमेंट की दुकानें बनवायी और मेला को व्यवस्थित रूप प्रदान कराया। पंडित रामचंद्र भोगहा ने भी भोगहापारा में सीमेंट की दुकानें बनवायी और मेला को महंतपारा की अमराई से भोगहापारा तक विस्तार कराया। चूंकि यहां का प्रमुख बाजार भोगहापारा में लगता था अत: भोगहा जी को बाजार के कर वसूली का अधिकार अंग्रेज सरकार द्वारा प्रदान किया गया था। आजादी के बाद मेला की व्यवस्था और कर वसूली का दायित्व जनपद पंचायत जांजगीर को सौंपा गया था। जबसे शिवरीनारायण नगर पंचायत बना है तब से मेले की व्यवस्था और कर वसूली नगर पंचायत करती है। नगर की सेवा समितियों और मठ की ओर से द र्शनार्थियों के रहने, खाने-पीने आदि की नि: शुल्क व्यवस्था की जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      आजादी के पूर्व अंग्रेज सरकार द्वारा गजेटियर प्रकाशित कराया गया जिसमें मध्यप्रदे श के जिलों की सम्पूर्ण जानकारी होती थी। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ फ्यूडेटरी इस्टेट प्रकाशित कराया गया जिसमें छत्तीसगढ़ के रियासतों, जमींदारी और द र्शनीय स्थलों की जानकारी थी। आजादी के प चात सन १९६१ की जनगरणा हुई और मध्यप्रदे श के मेला और मड़ई की जानकारी एकत्रित करके इम्पीरियल गजेटियर के रूप में प्रकाशित किया गया था। इसमें छत्तीसगढ़ के छ: जिलों क्रम श: रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, रायगढ़, सरगुजा, बस्तर के मेला, मड़ई, पर्व और त्योहारों की जानकारी प्रकाशित की गयी है। इसके अनुसार छत्तीसगढ़ में शिवरीनारायण, राजिम और पीथमपुर का मेला १०० वर्श से अधिक वर्शो से लगने तथा यहां के मेला में एक लाख द र्शनार्थियों के भाशमिल होने का उल्लेख है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      यहां के मेला में वैवाहिक खरीददारी अधिक होती थी। बर्तन, रजाई-गद्दा, पेटी, सिल-लोढ़ा, झारा, डुवा, कपड़ा आदि की अच्छी खरीददारी की जाती थी। मेला में अकलतरा और शिवरीनारायण के साव स्टोर का मनिहारी दुकान, दुर्ग, धमधा, बलौदाबाजार, चांपा, बहम्नीडीह और रायपुर का बर्तन दुकान, बिलासपुर का रजाई-गद्दे की दुकान, कलकत्ता का पेटी दुकान, चुड़ी-टिकली की दुकानें, सोने-चांदी के जेवरों की दुकानें, नैला के रमा शंकर गुप्ता का होटल और उसके बगल में गुपचुप दुकान, अकलतरा और सक्ती का सिनेमा घर, किसिम किसिम के झूला, मौत का कुंआ, नाटक मंडली, जादू, तथा उड़ीसा का मिट्टी की मूर्तियों की प्रदि र्शनी-पुतरी घर बहुत प्रसिद्ध था। यहां उड़िया संस्कृति को पोशित करने वाला सुस्वादिश्ट उखरा बहुतायत में आज भी बिकने आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      शिवरीनारायण और आस पास के गांवों में मेला के अवसर पर मेहमानों की अपार भीड़ होती है। इस अवसर पर वि ोश रूप से बहू-बेटियों को लिवा लाने की प्रथा है। भाशम होते ही घर की महिलाएं झुंड के झुंड खरीददारी के निकल पड़ती हैं। खरीददारी के साथ साथ वे होटलों और चाट दुकानों में अव य जाती हैं और सिनेमा देखना नहीं भूलतीं। मेला में वैवाहिक खरीददारी अव य होती है। भाशसन द र्शनार्थियों की सुविधा के लिए पुलिस थाना, विभिन्न भाशसकीय प्रदि र्शनी, पीने के पानी की व्यवस्था आदि करती है। लोग चित्रोत्पलागंगा में स्नान कर, भगवान भाबरीनारायण का द र्शन करने, श्री सत्यनारायण की कथा-पूजा करवाने और मंदिर में ध्वजा चढ़ाने से लेकर विभिन्न मनोरंजन का लुत्फ उठाने और खरीददारी कर प्रफुल्लित मन से घर वापस लौटते हैं। यानी एक पंथ दो काज... तीर्थ यात्रा के साथ साथ मनोरंजन और खरीददारी। लोग मेले की तैयारी एक माह पूर्व से करते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-4407224526290385347?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_712.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-3644411878866102040</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:10:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:10:30.275-08:00</atom:updated><title>रथयात्रा</title><description>शबरीनारायण में मठ के भीतर संवत् १९२७ में महंत अर्जुनदास जी की प्रेरणा से भटगांव के जमींदार श्री राजसिंह ने जगन्नाथ मंदिर की नींव डाली जिसे उनके पुत्र श्री चंदनसिंह ने पूरा कराया और उसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की विग्रह मूर्तियों की स्थापना करायी। संवत् १९२७ में ही उन्होंने महंत अर्जुनदास जी की प्रेरणा से महानदी के तट पर योगियों के निवासार्थ एक भवन का निर्माण कराया। इसे ''जोगीडीपा`` कहते हैं। सुप्रसिद्ध साहित्यकार और तत्कालीन शबरीनारायण तहसील के तहसीलदार ठाकुर जगमोहनसिंह ने अपनी पुस्तक ''प्रलय`` में लिखा है:-''जोगीडिफा श्री मान् बाबा गौतमदास जी का सुंदर बगीचा एक ऊँची भूमि पर जो किसी समय में एक पहाड़ी थी, है। बाबा जी यहां के महंत और प्रतिष्ठित हैं।`` रथयात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी यहां एक सप्ताह विश्राम करते हैं। इस कारण इसे ''जनकपुर`` भी कहा जाता है। इसी प्रकार श्री माखनसाव के अनुज श्री भाोभाराम के पौत्र परघिया साव ने जगन्नाथ पुरी की यात्रा के बाद शिवरीनारायण में पंडित धर्मानंद द्विवेदी के घर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की मूर्ति स्थापित करायी और भोगराग की व्यवस्था के लिए पुरगांव में जमीन दी। मूर्तियां आज भी सुरक्षित है। पहले रथयात्रा में यहीं की मूर्तियों को रथ में निकाला जाता था। बाद में जब मठ की मूर्तियों को रथ में निकाला जाने लगा तब दो रथ में दोनों जगहों की मूर्तियां निकाली जाने लगी। आगे चलकर केवल मठ की मूर्तियां ही निकाली जाने लगी। यह परम्परा आज भी जारी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      रथयात्रा यहां का एक प्रमुख त्योहार है। प्राचीन काल से यहां रथयात्रा का आयोजन मठ के द्वारा किया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार महंत गौतमदास ने यहां रथयात्रा की शुरूवात की और महंत लालदास ने उसे सुव्यवस्थित किया। मठ के मुख्तियार पंडित कौशलप्रसाद तिवारी को हमेशा स्मरण किया जायेगा। उन्होंने ही यहां रामलीला, रासलीला, नाटक, रथयात्रा, और माघी मेला को सुव्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। रथयात्रा के लिए जगन्नाथ पुरी की तरह यहां भी प्रतिवर्ष लकड़ी का रथ निर्माण कराया जाता था जिसे बाद में बंद कर दिया गया और एक लोहे का रथ बनवाया गया है जिसमें आज रथयात्रा निकलती है। शिवरीनारायण और आसपास के हजारों-लाखों श्रद्धालु यहां आकर रथयात्रा में शामिल होकर और रथ खींचकर पुण्यलाभ के भागीदार होते हैं। जगह जगह रथ को रोककर पूजा-अर्चना की जाती है। प्रसाद के रूप में नारियल, लाई और गजामूंग दिया जाता है। मेला जैसा दृश्य होता है। इस दिन को सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में बड़ा पवित्र दिन माना जाता है। इस दिन बेटी को बिदा करने, बहू को लिवा लाने, नये दुकानों की शुरूवात और गृह प्रवेश जैसे महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न कराये जाते हैं। इस दिन अपने स्वजनों, परिजनों और मित्रों के घर मेवा-मिष्ठान भिजवाने की परम्परा है। बच्चे नये कपड़े पहनते हैं और उन्हें खर्च करने के लिए पैसा दिया जाता है। उनके लिए यह एक विशेष दिन होता है। सद्भाव के प्रतीक रथयात्रा आज भी यहो श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। शिवरीनारायण को ''छत्‍तीसगढ़की जगन्नाथ पुरी`` कहा जाता है। राजिम में भगवान साक्षी गोपाल विराजमान हैं और ऐसी मान्यता है कि शिवरीनारायण के बाद राजिम की यात्रा और भगवान साक्षी गोपाल का दर्शन करना आवश्यक है अन्यथा उनकी यात्रा निरर्थक होता है। इसी लिए प्राचीन कवि श्री बटुसिंह शिवरीनारायण माहात्म्य में गाते हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                  मास अषाढ़ रथ दुतीया, रथ के किया बयान।&lt;br /&gt;                  दर्शन रथ को जो करे, पावे पद निर्वान ।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      जिस प्रकार जगन्नाथ पुरी को ''स्वर्गद्वार'' कहा जाता है और कोढ़ियों का उद्धार होता है। उसी प्रकार शिवरीनारायण की भी महत्‍ताहै। कवि बटुकसिंह श्रीशिवरीनारायण-सिंदूरगिरि माहात्म्य में लिखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                  क्वांर कृष्णों सुदि नौमि के होत तहां स्नान।&lt;br /&gt;                  कोढ़िन को काया मिले निर्धन को धनवान।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      शिवरीनारायण में बिलासपुर रोड में एक पुराना कोढ़ि खाना है और यहां एक लेप्रोसी विशेषज्ञ के रूप में डॉ. एम. एम. गौर की नियुक्ति भी हुई थी। बाद में उन्हीं के सलाह पर प्रयागप्रसाद केशरवानी चिकित्सालय की स्थापना की गयी थी। शिवरीनारायण से पांच कि. मी. की दूरी पर स्थित दुरपा गांव को अंग्रेज सरकार द्वारा ''लेप्रोसी गांव'' घोषित किया गया था। इस गांव में आना-जाना पूर्णत: प्रतिबंधित था। शिवरीनारायण से ७० कि.मी. पर चांपा में सोंठी कुष्ठ आश्रम है। इसी प्रकार बिलासपुर रायपुर रोड में बैतलपुर में भी एक कुष्ठ आश्रम है, जहां कोढ़ियों का ईलाज होता है और अनेक प्रकार के उद्योग उनके द्वारा चलाये जाते हैं। उनके बच्चों के रहने और पढ़ने आदि का पूरा इंतजाम किया जाता है। सरकार इस संस्था को हर प्रकार का सहयोग प्रदान करती है। ऐसे मुक्तिधाम को पुरी क्षेत्र कहा गया है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                  शिवरीनारायण पुरी क्षेत्र शिरोमणि जान।&lt;br /&gt;                  याज्ञवल्क्य व्यासादि ऋषि निजमुख करत बखान।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      यहां भगवान नारायण के चरण को स्पर्श करती रोहिणीकुंड की महिमा अपार है। कवियों ने उसे साक्षात् मोक्ष देने वाला बताया है। उस कुंड के कारण इसे बैकुंठ द्वार माना गया है। देखिये कवि की एक बानगी :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                  नारायण के कलाश्रित जानिय धामहि एक&lt;br /&gt;                  प्रथम विष्णुपुरि नाम पुनि रामपुरि हूं नेक&lt;br /&gt;                  चित्रोत्पल नदि तीर महि मंडित अति आराम&lt;br /&gt;                  बस्यो यहां बैकुंठपुर नारायणपुर धाम&lt;br /&gt;                  भासति तहं सिंदूरगिरि श्रीहरि कीन्ह निवास&lt;br /&gt;                  कुंड रोहिणी चरण तल भक्त अभीष्ट प्रकास।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-3644411878866102040?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_5905.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-9209227099437575584</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:09:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:09:57.667-08:00</atom:updated><title>नाट्य परंपरा</title><description>अभिनय मनुश्य की सहज प्रवृत्ति है। हर्श, उल्लास और खु शी से झूमते, नाचते-गाते मनुश्य की सहज अभिव्यक्ति है अभिनय। छत्तीसगढ़ के लोक जीवन की झांकी गांवों के खेतों, खलिहानों, गली, चौराहों और घरों में स्पश्ट देखी जा सकती है। इस ग्रामीण अभिव्यक्ति को 'लोक नाट्य' कहा जाता है। छत्तीसगढ़ में लोक नाट्य की प्राचीन परंपरा रही है। यही आगे चलकर नाटक के रूप में विकसित हुआ। 'नाट्य भाशस्त्र' जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ का प्रणयन दूसरी सदी में हुआ। भरत मुनि ने ऋग्वेद से पाठ्य, सामवेद से गान, यजुर्वेद से अभिनय, और अथर्वेद से रस लेकर इसकी रचना की। भरत मुनि के समक्ष लोकधर्म का आद र्श सर्वोपरि था। कदाचित् इसी कारण उन्होंने लोकधर्म के प्रति अपना अनुराग द र्शाया है। नाट्य शास्त्र में भी उल्लेख है :-&lt;br /&gt;                  तद्ध्यात्माभिसंभूतं छन्द: भाब्द समन्वितम्।&lt;br /&gt;                  लोकसिद्धं भवेत्सिद्धं नाट्यं लोकात्मकंत्विदम्।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      छत्तीसगढ़ में लोकनाट्य की प्राचीन परंपरा सरगुजा के रामगिरि और सीता बोंगरा गुफा में स्थित नाट्य शाला से सिद्ध होती है। यहां के शिलालेख में भी इसका उल्लेख है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                  आदि पयंति हृदयां सभावगरूकवयों यं रातयंदुले।&lt;br /&gt;                  अवसंतिया हांसानुभूते कुदस्पीसं एवं अलंगेति।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      इन गुफाओं में स्थित नाट्य भाशलाओं की तुलना प्राचीन ग्रीक थियेटर से की जाती है। रंग शाला यानी थियेटर और लोकनाट्य के बारे में लोगों में अनाव यक भ्रम होता है। थियेटर अपेक्षाकृत व्यापक भाब्द है और यूनानी भाब्द 'थिया' से लिया गया है। इसका अर्थ है 'दृ य' और वि ोशकर 'देखने' के अर्थ में यूनानी भाशा के 'थडमा' से साम्य रखता है। इसका अर्थ है-'ऐसी वस्तु जो घूर घूरकर देखने को बाध्य करे' दूसरी ओर 'ड्रामा' भाब्द भी यूनानी भाब्द 'ड्रान' से लिया गया है जिसका अर्थ है-'अभिनय करना।' भारतीय परिवे श में 'थियेटर' भाब्द को 'रंगभूमि' का और ड्रामा को नाट्य के नजदीक माना गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                  अविक्य कियोपतेम तिसत्वातिभाशितम्।&lt;br /&gt;                  लोलांगहारभियं नाट्य लक्ष्मण लक्षितम्।।&lt;br /&gt;                  स्वरालंकार संयुक्तमस्वर्भूरूशाश्रयम्।&lt;br /&gt;                  यदोध शं भवेन्नाट्यं नाट्यधर्मोतुसास्मृता।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      अर्थात् नाट्य प्रकृत स्थिति भिन्न कलात्मक और विशिश्ट उद्दे य का अग्रणी होता है, जबकि लोकनाट्य प्राकृतजन की अभिव्यक्ति को लोक रंजन के लिए कृतिम रूप से प्रस्तुत करता है। कालिदास ने 'नाट्यं भिन्न स्वेजनिस्य बहुधात्येक समाराधनम्' कहकर नाटक को सभी के लिए ग्राह्य बताया है। इसी प्रकार सुप्रसिद्ध संस्कृत कवि और 'उत्तर राम चरित्र' के रचयिता भवभूति कहते हैं-' कालोह्यं निरवधि विपुला च पृथ्वी:।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      लोकनाट्य के तीन प्रमुख अंग होते हैं- १. बहिरंग। इसके अंतर्गत कथा का उद्याम आवेग, आंचलिक बोली, आंचलिक प्रतीकात्मक पात्र, आडम्बरहीन रंगमंच और सहज श्रंृगार प्रमुख होते हैं।       २. अंतरंग। इसमें गीत और नृत्य प्रमुख होते हैं। ३. अभिनय। इन तीनों अंगों की समवेत प्रस्तुति ही मूलत: लोकनाट्य है। गीत इसके प्राण हैं और अभिनय से यह सजीव हो उठता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      श्री गोपाल भार्मा अपने लेख-'मध्यप्रदे श का हिन्दी नाट्य साहित्य' में लिखते हैं-'जिस समाज में रंगमंच का अभाव हो, वहां नाट्य साहित्य का उचित विकास नहीं हो पाता। रंगमंच से केवल एक पर्दे से सजे हुए मंच का बोध नहीं होता। इसके अंतर्गत कई बातें आती हैं। जिस समाज की अभिनय की ओर रूचि न हो, अभिनय कला को संगीत और चित्रकला के समान सम्मान और श्रद्धा की भावना से न देखा जाता हो, नाटक के प्रति आकर्शण के साथ साथ उसके तंत्र और साहित्य संबंधी बारीकियों का अर्थ समझकर आनंद लेने की वृत्ति न उत्पन हुई हो उस समाज में रंगमंच का अभाव है, ऐसा समझना चाहिए।'&lt;br /&gt;      एक समय था जब नाट्य साहित्य मुख्यत: अभिनय के लिए लिखा जाता था। कालिदास, भवभूति और शुद्रक आदि अनेक नाटककारों की सारी रचनाएं अभिनय सुलभ है। नाटक की सार्थकता उसकी अभिनेयता में है अन्यथा वह साहित्य की एक विशिश्ट लेखन भौली बनकर रह जाती। नाटक वास्तव में लेखक, अभिनेता और द र्शकों की सम्मिलित सृश्टि है। यही कारण है कि नाटक लेखकों के कंधों पर वि ोश उत्तरदायित्व होता है। रंगमंच के तंत्र का ज्ञान पात्रों की सजीवता, घटनाओं का औत्सुक्य और आकर्शण तथा स्वाभाविक कथोपकथन नाटक के प्राण हैं। इन सबको ध्यान में रखकर नाटक यदि नहीं लिखा गया है तो वह केवल साहित्यिक पाठ्य सामाग्री रह जाती है। भारतीय हिन्दी भाशी समाज में रामलीला और नौटंकी का प्रसार था। कभी कभी रास मंडली भी आया करती थी जो अश्ठछाप के काव्य साहित्य के आधार पर राधा कृश्ण के नृत्यों से परिपूर्ण संगीत प्रधान कथानक प्रस्तुत करती थी। रामलीला और रासलीला को लोग धार्मिक भावनाओं से देखते थे। गांवों में जो नौटंकी हुआ करती थी उसका प्रधान विशय वीरगाथा अथवा उस प्रदेशिक भाग में प्रचलित कोई प्रेम गाथा हुआ करती थी। ग्रामीणजन का मनोरंजन करने में इनका बहुत बड़ा हाथ होता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      मुगलों के आक्रमण के पूर्व भारत के सभी भागों में खासकर राज प्रसादों और मंदिरों में संस्कृत और पाली प्राकृत नाटकों के लेखन और मंथन की परंपरा रही है लेकिन उनका संबंध अभिजात्य वर्ग तक ही सीमित था। ग्रामीणजन के बीच परंपरागत लोकनाट्य ही प्रचलित थे। मुगलो के आक्रमण से भारतीय परंपराएं छिन्न भिन्न हो गयी और यहां के प्रेक्षागृह भग्न हो गये। तब नाटकों ने दरबारों में भाण और प्रहसन का रूप ले लिया। लेकिन लोकनाट्य की परंपरा आज भी जीवित है...चाहे ढोलामारू, चंदापन या लोरिकियन रूप में हो, आज भी प्रचलित है। आज हमारे बीच जो लोकनाट्य प्रचलित है उसका समुचित विकास मध्य युग के धार्मिक आंदोलन की छत्रछाया में हुआ। यही युग की सांस्कृतिक चेतना का वाहक बना। आचार्य रामचंद्र ने राम कथा को और आचार्य बल्लभाचार्य ने कृश्ण लीला को प्रोत्साहित किया। इनके शिश्यों में सूर और तुलसी ने क्रम श: रासलीला और रामलीला को विकसित किया। इसी समय बंगाल में महाप्रभु चैतन्य ने जात्रा के माध्यम से कृश्ण भक्ति का प्रचार किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      छत्तीसगढ़ में लोकनाट्य दो रूपों में विकसित हुआ। एक तो निम्न वर्ग के देवार, नट, भट आदि लोगों में आल्हा उदल, ढोला मारू जैसी परंपरा को तथा पंडु, कंवर और संवरा जाति में पंडवानी और पंथी को विकसित किया। छत्तीसगढ़ में इसका प्रचार प्रसार लगभग १६ वीं और १७ वीं भाताब्दी के मध्य हुआ। उत्तर भारत के रासलीला और रामलीला मथुरा, वृंदावन, का शी और इलाहाबाद से सतना, रीवा, अमरकंटक होते हुए पेंड्रा, रतनपुर, शिवरीनारायण, अकलतरा, सारंगढ़, किकिरदा, मल्दा, नरियरा, बलौदा, कवर्धा, कोसा और राजिम आदि में फैल गया। इसलिए छत्तीसगढ़ी भाशा में ब्रज और अवधी का पुट मिलता है। दूसरी ओर बंगाल की जात्रा, उड़ीसा की पाल्हा, जगन्नाथपुरी से सुंदरगढ़, संबलपुर, सारंगढ़, चंद्रपुर, पुसौर, रायगढ़, और तमनार आदि जगहों मेंं फैल गया। यहां की नाट्य परंपराओं में इसका स्पश्ट प्रभाव देखा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      डॉ. बल्देव से मिली जानकारी के अनुसार रायगढ़ के राजा भूपदेवसिंह के भाशसनकाल में नगर दरोगा ठाकुर रामचरण सिंह जात्रा से प्रभावित रास के निश्णात कलाकार थे। उन्होंने इस क्षेत्र में रामलीला और रासलीला के विकास के लिए अविस्मरणीय प्रयास किया। गौद, मल्दा, नरियरा और अकलतरा रासलीला के लिए और शिवरीनारायण, किकिरदा, रतनपुर, सारंगढ़ और कवर्धा रामलीला के लिए प्रसिद्ध थे। नरियरा के रासलीला को इतनी प्रसिद्धि मिली कि उसे 'छत्तीसगढ़ का वृंदावन' कहा जाने लगा। ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर, उनके बहनोई कोसिरसिंह और भांजा वि वे वर सिंह ने नरियरा और अकलतरा के रासलीला और रामलीला के लिए अथक प्रयास किया। उस काल में जांजगीर क्षेत्रान्तर्गत अनेक गम्मतहार सुरमिनदास, धरमलाल, लक्ष्मणदास चिकरहा को नाचा पार्टी में रास का यथेश्ट प्रभाव देखने को मिलता था। उस समय दादूसिंह गौद और ननका रहस मंडली, रानीगांव रासलीला के लिए प्रसिद्ध था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत कम लोगों को मालूम है कि शिवरीनारायण का अभिनय संसार केवल छत्‍तीसगढ़में ही नहीं वरन् देश के कोने में प्रसिद्ध था। हालांकि हर गांव में नाचा, गम्मत, रामलीला और रासलीला पार्टी होती थी लेकिन यहां की रामलीला और नाटक मंडली की बात ही कुछ और थी। ''छत्‍तीसगढ़गौरव'' में पंडित शुकलाल पांडेय ने लिखा है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                        ब्रज की सी यदि रास देखना हो तो प्यारों&lt;br /&gt;                        ले नरियर नरियरा ग्राम को शीघ्र सिधारों&lt;br /&gt;                        यदि लखना हो सुहृद ! आपको राघव लीला&lt;br /&gt;                        अकलतरा को चलो, करो मत मन को ढीला&lt;br /&gt;                        शिवरीनारायण को जाइये लखना हो नाटक सुघ्घर&lt;br /&gt;                        बस यहीं कहीं मिल जायेंगे जग नाटक के सूत्रधार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      प्राचीन साहित्य में उल्लेख मिलता है कि पंडित मालिकराम भोगहा ने एक नाटक मंडली यहां बनायी थी। इस नाटक मंडली द्वारा अनेक धार्मिक और सामाजिक नाटकों का सफलता पूर्वक मंचन किया जाता था। भोगहा जी भी छत्‍तीसगढ़के एक उत्कृष्ट नाटककार थे। उन्होंने अनेक नाटक लिखे जिसमें राम राज्य वियोग, प्रबोध चंद्रोदय और सती सुलोचना प्रमुख है। इन नाटकों का यहां सफलता पूर्वक मंचन भी किया गया था। भोगहा जी की एक मात्र प्रकाशित नाटक ''राम राज्य वियोग'' में उन्होंने लिखा है :- ''यहां भी कई वर्ष नित्य हरि कीर्तन, नाटक और रासलीला देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। एक समय मेरे छोटे भाई श्रीनिवास ने ''कंस वध उपाख्यान'' का अभिनय दिखाकर सर्व सज्जनों को प्रसन्न किया। इस मंडली में हमारे मुकुटमणि श्रीमान् महंत गौतमदास जी भी सुशोभित थे। श्रीकृष्ण भगवान का अंतर्ध्यान और गोपियों का प्रलापना, उनके हृदय में चित्र की भांति अंकित हो गया जिससे आपकी आनंद सरिता उमड़ी और प्रत्यंग को आप सोते में निमग्न कर अचल हो गये। अतएव नाटक र्कत्‍ताका उत्साह अकथनीय था और एक मुख्य कारण इसके निर्माण का हुआ।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      इस सदी के दूसरे दशक में महंत गौतमदास के संरक्षण में पंडित विश्वेश्वर तिवारी के कुशल निर्देशन में एक नाटक मंडली संचालित थी जिसे उनके पुत्र श्री कौशलप्रसाद तिवारी ने ''महानद थियेटिकल कम्पनी'' नाम से कुशलता पूर्वक संचालित और निर्देशित किया। इसी प्रकार श्री भुवनलाल शर्मा ''भोगहा'' के निर्देशन में नवयुवक नाटक मंडली और श्री विद्याधर साव के निर्देशन में केशरवानी नाटक मंडली यहां संचालित थी। श्री कौशलप्रसाद तिवारी ने भी एक बाल महानद थियेटिकल कम्पनी का गठन किया था। आगे चलकर इस नाटक मंडली को उन्होंने महानद थियेटिकल कंपनी में मिला दिया। पंडित कौ शलप्रसाद तिवारी पार्सी थियेटर के अच्छे जानकार थे। उनको नाटकों का बहुत अच्छा ज्ञान था। वे नाटक मंडली के केवल निर्दे शक ही नहीं बल्कि एक अच्छे कलाकार भी थे। कलकत्ता के नाट्य मंडलियों और निर्दे शकों से उनका सतत् संपर्क था। हिन्दुस्तान के प्राय: सभी नाट्य कलाकार शिवरीनारायण में अपनी कला का प्रद र्शन कर चुके हैं। तिवारी जी सभी कलाकारों का बहुत ख्याल रखते थे। उनके आने-जाने, रहने और खाने-पीने की बहुत अच्छी व्यवस्था करते थे। वे कलकत्ता के के. सी. दास एण्ड कंपनी से रसगुल्ला और फिरकोस नामक दुकान से जो आज फ्लरिज के नाम से प्रसिद्ध है, से पेस्टी मंगाते थे। चूंकि नाटकों के मंचन और उसकी तैयारी में बहुत खर्च होता था और यहां के लोगों के लिये ही नाटक एक मात्र मनोरंजन का साधन होता था। अत: मठ के महंत श्री गौतमदास और मठ के मुख्तियार श्री विश्वेश्वर प्रसाद तिवारी महानद थियेटिकल कम्पनी के कलाकारों को नाटक की तैयारी और मंचन के लिये आर्थिक मदद देने लगे। इससे यहां का नाटकों का मंचन बहुत अच्छा होता था। दशहरा-दीपावली के बाद से नाटकों का रिहर्सल शुरू होता था और गर्मी के मौसम में रात्रि में नाटकों का मंचन होता है जिसे देखने के लिये छत्‍तीसगढ़के राजा, महाराजा और जमींदार तक यहां आते थे। नाटकों का मंचन पहले केशवनारायण मंदिर का प्रांगण में होता था। फिर मठ के गाधी चौरा प्रांगण में और बाद में बाजार में कुआं के बगल में नाटकों का मंचन होता था। महानद थियेटिकल कम्पनी के कलाकारों को कलकत्‍ताके डॉ. अब्दुल शकूर और खुदीराम बोस रिहर्सल कराने आते थे। तब उन्हें ''बाजा मास्टर'' कहा जाता था। सबके प्रयास से नाटकों का मंचन प्रभावोत्पादक, मनोरंजनपूर्ण और आकर्षक होता था। इसमें नृत्य, संगीत और अभिनय का सुन्दर समन्वय होता था। श्री कौशलप्रसाद तिवारी, श्री रथांग पांडेय और श्री गुलजारीलाल शर्मा से मेरी इस सम्बंध में चर्चा होती थी। नाटकों के प्रति मेरी अभिरूचि देखकर वे उस काल की जानकारी दिया करते थे। उन्होंने मुझे बताया कि सन् १९४४-४५ के मेला में अंग्रेज सरकार के सहायतार्थ नाटकों का मंचन मेला के मैदान में किया गया था। इसे देखने के लिये सारंगढ़ के राजा, भटगांव, बिलाईगढ़, अकलतरा, पिथौरा के जमींदार और अनेक गांव के मालगुजार और अंग्रेज अधिकारी और बिलासपुर जिले के कलेक्टर सहित बहुत लोग आये थे। सभी सिनेमा और सर्कस खाली और जैसे पूरी भीड़ नाटक देखने के लिये उमड़ पड़ी थी। नाटक के एक ट्रिक सीन को देखकर अंग्रेज अधिकारी बहुत उ&gt;ोजित हो गये थे जिन्हें बड़ी मुश्किल से शांत किया जा सका था। एक वि वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पंडित कौ शलप्रसाद तिवारी के द्वारा महानद थियेटिकल कंपनी का निर्माण और नाटकों का पहला मंचन सन् १९२५ में हुआ और अंतिम नाटक सन् १९५२ में खेला गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      महानद थियेटिकल कम्पनी के द्वारा मंचित नाटकों में प्रमुख रूप ये धार्मिक और सामाजिक नाटक होते थे। धार्मिक नाटकों में सीता वनवास, सती सुलोचना, राजा हरिश्चंद्र, वीर अभिमन्यु, दानवीर कर्ण, सम्राट परीक्षित, कृष्ण और सुदामा, भक्त प्रहलाद, भक्त अम्बरीष आदि सामाजिक नाटकों में आदर्श नारी, दिल की प्यास, आंखों का नशा, नई जिंदगी, महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी, आदि प्रमुख थे। इस थियेटिकल कम्पनी के प्रमुख पात्रों में श्री कौशलप्रसाद तिवारी, पंडित श्यामलाल, पंडित गयाराम, पंडित ओंकारप्रसाद, विशेशर चौबे, बनमाली भठ्ठ, प्यार पठान, गुलजारीलाल शर्मा, लक्ष्मण चौबे, रामगुलाम साव, जवाहर जायसवाल, भीम साव, बोधी पांडेय, दीनबंधु पोद्दार, मोहन भट्ट, रथांग पांडेय, भूषण तिवारी, मातादीन सेठ, हरि महाराज, सीताराम हलवाई, याकूब पठान, भालचंद्र तिवारी, तिजाऊ प्रसाद केशरवानी, केदार मुकिम, लादूराम पुजारी आदि प्रमुख थे। इनमेें गयाराम पांडेय अर्जुन और कंस, गुलजारीलाल शर्मा हिरण्य कश्यप, मातादीन केडिया दुर्योधन, लादूराम पुजारी द्रोणाचार्य और शंकर, तिजाऊ प्रसाद केशरवानी राणाप्रताप और भालचंद्र तिवारी प्रमुख नायक के रूप में तथा विशेशर चौबे, लक्ष्मण शर्मा, केदार मुकिम प्रमुख नायिका के अभिनय के लिये बहुत चर्चित थे। श्यामलाल शर्मा, बनमाली भट्ट और विश्वेश्वर चौबे हास्य कलाकार थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      श्री भुवनलाल शर्मा भोगहा द्वारा निर्देशित और संचालित ''नवयुवक नाटक मंडली'' वास्तव में पंडित मालिकराम भोगहा के नाटक मंडली का नवीनतम रूप था। इस नाटक मंडली को कलाकारों के आपसी झगड़े के कारण बनाया गया था। इनके नाटकों का मंचन केशवनारायण मंदिर प्रांगण में और भोगहापारा में थाना चौक के आसपास किया जाता था। इस मंडली के प्रमुख पात्रों में भुवनलाल शर्मा, रामेश्वर पांडेय, साहेबलाल तिवारी, दुखुराम तिवारी, ज्ञानदेव, ननकेसर उपाध्याय, लक्ष्मी दाऊ, रामगोपाल तिवारी, सीताराम तिवारी, चुन्नीलाल तिवारी, रामशरण पांडेय, देवीप्रसाद तिवारी, केशव भट्ट, विशाल रावत, रामजी यादव, बद्री यादव, होली नाई, छेड़ूराम, लखन छिपिया, रामरूप, टकसार दास वैष्णव, पुरूषो&gt;शम कश्यप, कंुजराम कर्ष, विजयकुमार तिवारी, कपिल तिवारी, गंगाराम पोद्दार आदि प्रमुख थे। इस नाटक मंडली द्वारा बहुत दिनों तक नाटकों का मंचन किया जाता रहा है। इनमें धार्मिक, सामाजिक और हास्यप्रद नाटकों की बहुलता होती थी। आज भी भोगहा जी के घर और मंदिर प्रांगण में नाटक की सामाग्री देखने को मिल जायेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      श्री विद्याधर केशरवानी द्वारा निर्देशित और संचालित ''केशरवानी नाटक मंडली'' माखन साव परिवार के बच्चों की जिद का परिणाम था। इस नाटक के प्रमुख कलाकारों में तिजाऊप्रसाद, भालचंद्र तिवारी, भीमप्रसाद, रामेश्वरप्रसाद, देवालाल, सेवकलाल, अम्बिकाप्रसाद, सत्यनारायण, परमेश्वर प्रसाद, और मोतीलाल केशरवानी के अलावा मोहितराम सराफ और शरद् तिवारी प्रमुख थे। श्री मोहितराम सराफ नाटक और संगीत को इतने समर्पित थे कि वे दुरपा से रात में अकेले शिवरीनारायण आ जाया करते थे। आज वे चांपा में सराफा के व्यावसायी हैं। मंै भी यहां के माखन वं श का बहुत छोटा पौध हूं। बचपन में मुझे हमारे कुलदेव के मंदिर परिसर में स्थित धर्मशाला के एक कमरे में नाटकों की सामाग्री, मोर मुकुट और पोशाक देखकर नाटकों में भाग लेने की इच्छा अवश्य होती थी। कुछ ऐसे अवसर भी आये जब मित्रों के साथ श्री भुवनलाल शर्मा के ''भोगहा नाटक मंडली'' के मंच में उतरने का मौका मिला। भाई जीवन यादव, वीरेन्द्र तिवारी, सुखीराम कश्यप, तीजराम केंवट, राजेन्द्र केशरवानी, आदि ऐसे कलाकार हमारे साथ थे जिनकी आज केवल स्मृतियां शेष हैं। पंडित शुकलाल पांडेय लिखते हैं :-&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;                  हैं शिवलाल समान यहीं पर उ&gt;शम गायक।&lt;br /&gt;                  क्षिति गंधर्व सुरेश तुल्य रहते हैं वादक।&lt;br /&gt;                  विविध नृत्य में कुशल यहीं हैं माधव नर्तक।&lt;br /&gt;                  राममनोहर तुल्य यहीं हैं निपुण विदूषक।&lt;br /&gt;                  हैं गयाराम पांडेय से अभिनेता विश्रुत यहीं।&lt;br /&gt;                  भारत में तू छत्‍तीसगढ़! किसी प्रान्त से कम नहीं।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      इन नाटक मंडलियों के कलाकार प्रतिष्ठित परिवारों के बच्चे थे और केवल मनोरंजन के लिये नाटक मंडलियों से जुड़े थे। क्योंकि उस समय मनोरंजन का कोई दूसरा साधन नहीं था। महंत लालदास के जीते जी महानद थियेटिकल कम्पनी के कलाकारों को आर्थिक सहयोग मठ से मिलता रहा उसके बाद पूरी नाटक मंडली बिखर गयी। यहां के नाटकों में अल्फ्रेड और कोरियन्थर और पार्सी थियेटर का स्पष्ट प्रभाव था। यह यहां के साहित्यिक पृष्ठभूमि का मजबूत अभिनय पक्ष है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-9209227099437575584?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_1650.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-8075948577009005037</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:08:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:09:12.091-08:00</atom:updated><title>तांत्रिक परंपरा</title><description>महानदी, शिवनाथ और जोंक नदी के त्रिधारा संगम के तट पर स्थित प्राचीन, प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण और ''छत्तीसगढ़ की जगन्नाथपुरी`` के नाम से विख्यात् शिवरीनारायण अप्रतिम सौंदर्य और चतुर्भुजी विष्णु की मूर्तियों की अधिकता के कारण स्कंद पुराण में इसे श्री पुरूषो&gt;शम और श्री नारायण क्षेत्र कहा गया है। हर युग में इस नगर का अस्तित्व रहा है और सतयुग में बैकुंठपुर, त्रेतायुग में रामपुर और द्वापरयुग में विष्णुपुरी तथा नारायणपुर के नाम से विख्यात् यह नगर मतंग ऋषि का गुरूकुल आश्रम और शबरी की साधना स्थली भी रहा है। भगवान श्रीराम और लक्ष्मण शबरी के जूठे बेर यहीं खाये थे और उन्हें मोक्ष प्रदान करके इस घनघोर दंडकारण्य वन में आर्य संस्कृति के बीज प्रस्फुटित किये थे। शबरी की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए 'शबरी-नारायण` नगर बसा है। भगवान श्रीराम का नारायणी रूप आज भी यहां गुप्त रूप से विराजमान हैं। कदाचित् इसी कारण इसे ''गुप्त तीर्थधाम`` कहा गया है। याज्ञवल्क्य संहिता और रामावतार चरित्र में इसका उल्लेख है। भगवान जगन्नाथ की विग्रह मूर्तियों को यहीं से पुरी (उड़ीसा) ले जाया गया था। प्रचलित किंवदंति के अनुसार प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ यहां विराजते हैं। इस दिन उनका दर्शन मोक्षदायी होता है। शिवरीनारायण की महत्ता जगन्नाथ पुरी से किसी प्रकार कम नहीं है। कदाचित् इसी कारण इस दिन यहां अपार भीड़ होती है। इसी दिन से यहां मेला लगता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      स्कंद पुराण में शबरीनारायण (वर्तमान शिवरीनारायण) को ''श्रीसिंदूरगिरिक्षेत्र`` कहा गया है। प्राचीन काल में यहां शबरों का शासन था। द्वापरयुग के अंतिम चरण में श्रापवश जरा नाम के शबर के तीर से श्रीकृष्ण घायल होकर मृत्यु को प्राप्त होते हैं। वैदिक रीति से उनका दाह संस्कार किया जाता है। लेकिन उनका मृत शरीर नहीं जलता। तब उस मृत शरीर को समुद्र में प्रवाहित कर दिया जाता है। आज भी बहुत जगह मृत शरीर के मुख को औपचारिक रूप से जलाकर समुद्र अथवा नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। इधर जरा को बहुत पश्चाताप होता है और जब उसे श्रीकृष्ण के मृत शरीर को समुद्र में प्रवाहित किये जाने का समाचार मिलता है तब वह तत्काल उस मृत शरीर को ले आता है और इसी श्रीसिंदूरगिरि क्षेत्र में एक जलस्रोत के किनारे बांस के पेड़ के नीचे रखकर उसकी पूजा-अर्चना करने लगा। आगे चलकर वह उसके सामने बैठकर तंत्र मंत्र की साधना करने लगा। इसी मृत शरीर को आगे चलकर ''नीलमाधव`` कहा गया। इसी नीलमाधव को १४ वीं शताब्दी के उड़िया कवि सरलादास ने पुरी में ले जाकर  स्थापित करने की बात कही है। डॉ. जे. पी. सिंहदेव और डॉ. एल. पी. साहू ने ''कल्ट ऑफ जगन्नाथ`` और ''कल्चरल प्रोफाइल ऑफ साउथ कोसला`` में लिखते हैं-''भगवान नीलमाधव की मूर्ति को शबरीनारायण से पुरी लाने वाले पुरी के राजपुरोहित विद्यापति नहीं थे बल्कि उन्हें तांत्रिक इंद्रभूति संभल पहाड़ी की एक गुफा में ले जाकर उसके सम्मुख बैठकर तंत्र मंत्र की साधना किया करता था। यहीं उन्होंने ''वज्रयान बुद्धिज्म`` की स्थापना की। उन्होंने तिब्बत जाकर लामा सम्प्रदाय की भी स्थापना की थी। बंगाल की राजकुमारी लक्ष्मींकरा जो बाद में पटना के राजा जैलेन्द्रनाथ से विवाह की, वह इंद्रभूति की बहन थी। इंद्रभूति के वंशज तीन पीढ़ी तक नीलमाधव के सम्मुख बैठकर तंत्र मंत्र की साधना करते रहे बाद में उस मूर्ति को पुरी में ले जाकर भगवान जगन्नाथ के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। पहले जगन्नाथ पुरी के इस मंदिर में तांत्रिकों का कब्जा था जिसे आदि गुरू शंकराचार्य ने उनसे शास्त्रार्थ करके उनके प्रभाव से मुक्त कराया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      इधर जरा अपने नीलमाधव को न पाकर खूब विलाप करने लगा और अन्न जल त्याग कर मृत्यु का वरण करने के लिए उद्यत हो गया तभी भगवान नीलमाधव ने अपने नारायणी रूप का उन्हें दर्शन कराया और यहां गुप्त रूप से विराजित होने का वरदान दिये। उन्होंने यह भी वरदान दिया कि प्रतिवर्ष माघपूर्णिमा को जो कोई मेरा दर्शन करेगा वह मोक्ष को प्राप्त कर सीधे बैकंुठधाम को जाएगा। तब से यह गुप्तधाम के रूप में पांचवां धाम कहलाया। आज भी यहां भगवान नारायण का मोक्षदायी स्वरूप विद्यमान है और उनके चरण को स्पर्श करता ''रोहिणी कुंड`` विद्यमान है जिसकी महिमा अपार है। प्राचीन कवि श्री बटुकसिंह ने रोहिणी कुंड को एक धाम माना है-''रोहिणी कंुड एक धाम है, है अमृत का नीर`` जबकि सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित मालिकराम भोगहा ने शबरीनारायण माहात्म्य में मुक्ति पाने का एक साधन बताया है :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                  रोहिणि कुंडहि स्पर्श कर चित्रोत्पल जल न्हाय।&lt;br /&gt;                  योग भ्रश्ट योगी मुकति पावत पाप बहाय।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      तथ्य चाहे जो हो, पुरी के जगन्नाथ मंदिर और शबरीनारायण मंदिर में बहुत कुछ समानता है। दोनों मंदिर तांत्रिकों के कब्जे में था जिसे क्रमश: आदि गुरू शंकराचार्य और स्वामी दयाराम दास ने शास्त्रार्थ करके तांत्रिकों के प्रभाव से मुक्त कराया। शबरीनारायण में नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों का कब्जा था। चूंकि शबरीनारायण से होकर जगन्नाथपुरी जाने का मार्ग था। पथिकों को यहां के तांत्रिक शेर बनकर डराते और अपने प्रभाव से मारकर खा जाते थे। इसलिए इस मार्ग में जाने में यात्रीगण भय खाते थे। एक बार स्वामी दयाराम दास ग्वालियर से तीर्थाटन के लिए घुमते हुए रत्नपुर पहुंचे। उनकी विद्वता और पांडित्य से रत्नपुर के राजा अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें शबरीनारायण के मंदिर और मठ की व्यवस्था करने का दायित्व सौंपा। स्वामी दयाराम दास जब शबरीनारायण पहुंचे तब वहां के तांत्रिक उन्हें भी डराने के लिए शेर बनकर झपटे लेकिन ऐसा चमत्कार हुआ कि शेर के रूप में तांत्रिक उनका कुछ नहीं बिगाड़ सके। बाद में तांत्रिकों के गुरू कनफड़ा बाबा के साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ जिसमें कनफड़ा बाबा को पराजय का सामना करना पड़ा और डर के मारे वे जमीन के भीतर प्रवेश कर गये। इस प्रकार शबरीनारायण के मठ और मंदिर नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों के प्रभाव से मुक्त हुआ, जगन्नाथ पुरी जाने वाले यात्रियों को तांत्रिकों के भय से मुक्ति मिली और यहां रामानंदी सम्प्रदाय के वैष्णवों का बीजारोपण हुआ। यहां के मठ के स्वामी दयाराम दास पहले महंत हुए और तब से आज तक इस वैष्णव मठ में १४ महंत हो चुके हैं जो एक से बढ़कर एक धार्मिक, अध्यात्मिक और ईश्वर भक्त हुए। उनकी प्रेरणा से अनेक मंदिर, महानदी के किनारे घाट और मंदिर की व्यवस्था के लिए जमीन दान में देकर कृतार्थ ही नहीं हुए बल्कि इस क्षेत्र में भक्ति भाव की लहर फैलाने में मद्द भी की। जिस स्थान पर कनफड़ा बाबा जमीन के भीतर प्रवेश किये थे उस स्थान पर स्वामी दयाराम दास ने एक ''गाधी चौरा`` का निर्माण कराया। प्रतिवर्ष माघ शुक्ल तेरस और आश्विन शुक्ल दसमी (दशहरा) को शिवरीनारायण के महंत इस गाधी चौरा में बैठकर पूजा-अर्चना करते हैं और प्रतीकात्मक रूप से यह प्रदर्शित करते हैं कि वैष्णव सम्प्रदाय तांत्रिकों के प्रभाव से बहुत उपर है। शिवरीनारायण के दक्षिणी द्वार के एक छोटे से मंदिर के भीतर तांत्रिकों के गुरू कनफड़ा बाबा की पगड़ीधारी मूर्ति है और बस्ती के बाहर एक ''नाथ गुफा'' के नाम से एक मंदिर है जिससे इस तथ्य की पुष्टि होती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5254860145225341450-8075948577009005037?l=shivarinarayan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://shivarinarayan.blogspot.com/2007/11/blog-post_3905.html</link><author>noreply@blogger.com (संजीव तिवारी)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-5254860145225341450.post-6194375082460420371</guid><pubDate>Fri, 30 Nov 2007 08:08:00 +0000</pubDate><atom:updated>2007-11-30T00:08:39.388-08:00</atom:updated><title>साहित्यिक तीर्थ</title><description>सर्व विदित है कि भारत का साहित्यिक तीर्थ सदा से का शी रहा है। क्योंकि यहां भारतेन्दु हरि चंद्र निवास करते थे। का शी उनकी साधना स्थली रही है। लेकिन सुप्रसिद्ध साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चंद्र के सहपाठी और विजयराघवगढ़ के राजकुमार ठाकुर जगमोहन सिंह सन् १८८० से १८८२ तक धमतरी और उसके बाद सन् १८८२ से १८८९ तक वे शिवरीनारायण में तहसीलदार रहे। यह उनकी कार्यस्थली भी रहा है। यहां उन्होंने लगभग आधा दर्जन से भी अधिक पुस्तकों का प्रणयन किया है। उन्होंने यहां काशी के ''भारतेन्दु मंडल'' की तर्ज पर ''जगन्मोहन मंडल'' के नाम से एक साहित्यिक संस्था बनाया था। इसके माध्यम से वे छत्‍तीसगढ़के बिखरे साहित्यकारों को एक सूत्र में पिरोने का सद्कार्य किया और उन्हें लेखन की एक दिशा दी। यहां हमेशा साहित्यिक समागम होता था और अन्यान्य साहित्यकार यहां आते थे। उस काल के रचनाकारों में पंडित हीराराम त्रिपाठी, पं. मालिकराम भोगहा, गोविंदसाव (सभी शिवरीनारायण), पंडित अनंतराम पांडेय (रायगढ़), पंडित पुरूषो&gt;शमप्रसाद पांडेय (मालगुजार बालपुर), पंडित मेदिनीप्रसाद पांडेय (परसापाली), वेदनाथ शर्मा (बलौदा), जगन्नाथप्रसाद भानु (बिलासपुर) आदि प्रमुख थे। पंडित शुकलाल पांडेय ''छत्‍तीसगढ़गौरव'' में लिखते हैं :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                  नारायण, गोपाल मिश्र, माखन, दलगंजन।&lt;br /&gt;                  बख्तावर, प्रहलाद दुबे,  रेवा, जगमोहन।&lt;br /&gt;                  हीरा, गोविंद, उमराव, विज्ञपति, भोरा रघुवर।&lt;br /&gt;                  विष्णुपुरी, दृगपाल, साव गोविंद, ब्रज गिरधर।&lt;br /&gt;                  विश्वनाथ, बिसाहू, उमर नृप लक्षमण छ&gt;शीस कोट कवि।&lt;br /&gt;                  हो चुके दिवंगत ये सभी प्रेम, मीर, मालिक सुकवि।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      बा